मुल्ला उमर ज़िंदा हैं भी या नहीं?

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान हुक़ूमत के गठन के बाद 1996 में मुल्ला उमर को उनके समर्थकों ने अमीरुलमोमिनिन (ईमान वालों के नेता या मुसलमानों के नेता) का ख़िताब दिया था.

इसके बाद चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा समेत पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के चरमपंथी संगठनों और हथियारबंद गिरोहों ने उन्हें अपना नेता मान लिया था. ये सभी संगठन आज भी उन्हें ही अपना नेता मानते हैं.

मुल्ला उमर पिछले 14 सालों से गुमनामी की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं.

साल 2001 में अमरीका में अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के बाद से मुल्ला उमर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नज़र नहीं आए हैं. उन्हें किसी ने नहीं देखा है.

वो किसी को इंटरव्यू या अपनी तस्वीर देने से भी बचते रहे हैं.

यही वजह है कि पिछले कुछ अरसे से चरमपंथी संगठनों के बीच मुल्ला उमर के ज़िंदा होने या न होने को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं.

इस्लामिक स्टेट का उदय

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ख़ास तौर से इराक़ और सीरिया में चरमपंथी इस्लामिक स्टेट (आईएस) के सक्रिय होने और अबु बकर बग़दादी के ख़ुद को मुसलमानों का 'ख़लीफ़ा' घोषित करने के बाद ये सवाल और भी ज़ोर पकड़ने लगा है.

आईएस ने इस साल के शुरू में प्रतिबंधित संगठन तहरीक़े तालिबान पाकिस्तान से अलग हुए एक कमांडर हाफ़िज़ सईद ख़ान को अपने संगठन का पाकिस्तान प्रमुख बनाया था.

इसके बाद से कई तालिबान कमांडर इस्लामिक स्टेट में शामिल हो चुके हैं.

कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के बाजौड़ एजेंसी नामक जगह में टीटीपी के प्रमुख और प्रमुख कमांडर मौलाना अबु बकर ने अपने तमाम साथियों के साथ आईएस में शामिल होने की घोषणा की थी.

मौलाना अबु बकर के सहायक क़ारी ज़ायद ने बीबीसी से बातचीत में बताया था कि बाजौड़ में क़रीब एक हज़ार हथियारबंद लड़ाके आईएस में शामिल हुए हैं.

ज़ायद का कहना था, "मुल्ला उमर एक लंबे वक़्त से सामने नहीं आए हैं. और उनका प्रभाव भी अब सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान तक सीमित है. जबकि आईएस प्रमुख अबु बकर बगदादी पूरे इस्लामिक दुनिया के 'अमीर' माने जा रहे हैं."

जीवनी का प्रकाशन

अफ़ग़ानिस्तान में भी कई तालिबानी कमाडंरों ने आईएस में शामिल होने की घोषणा की है.

अफ़ग़ान तालिबान ने अभी हाल ही में मुल्ला उमर की एक जीवनी प्रकाशित की है. इसमें कहा गया है कि ये कोई नहीं जानता कि वो कहाँ हैं, लेकिन वो अफ़ग़ानिस्तान और दुनियाभर की रोज़ की घटनाओं पर नज़र बनाए हुए हैं.

अभी तक ये साफ़ नहीं है कि तालिबान हुक़ूमत के ख़ात्मे के कई साल गुज़र जाने के बाद उनकी जीवनी प्रकाशित करने की असल वजह क्या है.

हालांकि कुछ समीक्षकों का मानना है कि ये अफ़ग़ानिस्तान में आईएस के बढ़ते हुए असर को कम करने की कोशिश हो सकती है.

अफ़वाहें

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पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के सीमाई इलाक़े में मुल्ला उमर के बारे में कई अफ़वाहें हैं, लेकिन इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक सूचना नहीं है.

अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथी संगठनों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार समी यूसुफ़ज़ई का कहना है, "कोई ये नहीं कह सकता कि मुल्ला उमर मारे जा चुके हैं. लेकिन उनके ज़िंदा होने का भी कोई सुबूत नहीं पेश किया गया है."

यूसुफ़ज़ई के अनुसार, ऐसे हालात में दोनों में से कोई भी बात सही हो सकती है.

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