समाज की भलाई के साथ संभव है कारोबार

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नार्वे की एक केमिकल कंपनी है यारा इंटरनेशनल. कंपनी तंजानिया के बाज़ार में अपना कारोबार नहीं बढ़ा पा रही थी, क्योंकि वहां के किसान खाद-उवर्रक नहीं खरीदते.

2007 में कंपनी इसकी वजहों को जानने की कोशिश की तो पाया तंजानिया के किसानों के पास सड़क नहीं हैं. सड़क नहीं होने के चलते वे खाद का इस्तेमाल नहीं करते थे. खाद के इस्तेमाल से पैदावार ज्यादा होने पर किसानों को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होता.

ऐसे में यारा कंपनी के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट और स्ट्रेटजी एवं बिज़नेस डेवलपमेंट मामलों के प्रमुख तेरजी मोर्टन की अगुवाई में कंपनी ने एक योजना बनाई.

इस योजना के तहत कंपनी ने सरकार के साथ साझेदारी कर और गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर तंजानिया में आधारभूत ढांचे के विकास पर जोर दिया. 2010 में इस योजना की शुरुआत हुई और उम्मीद की जा रही है कि 2030 तक इसमें 3 अरब डॉलर का निवेश हो जाएगा.

तीन गुना बिक्री बढ़ी

तब तक यारा ने वहां वेयर हाउस बना दिए हैं ताकि किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकें.

इस योजना का फायदा ये हुआ कि यारा ने अपने देश में खाद की बिक्री को तीन गुणा तक बढ़ा लिया है. मोर्टन ने इससे दूसरी कंपनियों के लिए भी सीख मानते हैं.

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मोर्टन के मुताबिक कंपनिया अगर पॉजिटिव बदलाव के साथ मुनाफा कमाती हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. हालांकि आधारभूत ढांचे के विकास से समुदाय को बड़े पैमाने पर फायदा हुआ है.

इसे एक तरह से सामूहिक बदलाव माना जाता है. कलेक्टिव इंपैक्ट नामक शब्द पहली बार 2011 में हार्वड बिज़नेस रिव्यू के आर्टिकल में किया गया. इस लेख के लेखक वेंचर कैपटलिस्ट मार्क क्रेमर हैं.

इस लेखक का मूल आइडिया यही था कि कि कंपनियां सामाजिक विकास के कामों में हिस्सेदारी करके अपने उत्पाद और सेवा की बिक्री बढ़ा सकती है.

वैसे ये भी सही है कि कंपनियों इस तरह की मुहिम शुरू करने पर आलोचना भी झेलनी होगी, कि वे केवल मुनाफा कमाने के लिए ऐसा कर रहे हैं.

समाज में बदलाव

लेकिन इस मुहिम के समर्थकों की राय में इस मुहिम का अंतिम परिणाम समाज में बेहतर बदलाव है.

मार्क क्रेमर कहते हैं, "सामाजिक बदलाव लाने वाली कंपनियों को मुनाफा कमाने की इजाजत होनी चाहिए. सबसे पहले ये करने की जरूरत है तब जाकर कलेक्टिव इंपैक्ट का आइडिया लोगों को समझ में आएगा."

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यारा के तंजानिया के अनुभव ने कंपनियों के काम करने की योजना को प्रभावित करना शुरू किया है, अब कई दूसरी कंपनियों के मिड-लेवल मेजर सामाजिक बदलाव वाले आइडिया को मैनेजमेंट के सामने रख रहे हैं.

क्रेमर कहते हैं, "अगर आप बदलाव चाहते हैं तो फिर आपको उच्च स्तर पर एंबैसडर तलाशना होगा जो आपके आइडिया के बारे में बात प्रभावी ढंग से हो सकता है. परंपरागत तौर पर लोग कहेंगे कि हमें इससे क्या हासिल होगा."

हालांकि इसमें विचार को बेहद सामान्य रखना होगा- कि आपकी कंपनी किस तरह लोगों के लिए अच्छा करते हुए पैसा कमाना है.

क्रेमर के मुताबिक मिड-लेवल मैनेजर को अच्छे आइडिया को सोशल प्रोजेक्ट के साथ साथ सेल्स प्रोजेक्ट के साथ भी पेश करना होगा. ये भी ध्यान रखना होगा कि आइडिया कितना भी अच्छा क्यों नहीं हो कंपनी तभी उसे मंजूर करेगी जब तक कि उसमें उसको शुद्ध मुनाफा नहीं दिखेगा.

अमरीका के ओहियो स्थित ग्रेटर सिनसिनाटी फाउंडेशन के कम्यूनिटी इंवेस्टमेंट के वाइस प्रेसीडेंट शिलोह टर्नर कंपनियों को क्लेक्टिव इंपैक्ट के बारे में योजना बनाने में मदद करती हैं.

बदल रही है लोगों की जिंदगी

उदाहरण के लिए टर्नर की संस्था ने ये देखा कि 2010 में स्थानीय इलाके में प्रशिक्षण के अभाव मे बड़े पैमाने पर लग बेरोजगार हैं. इलाके में तकनीकी, स्वास्थ्य सेवा, कुशल निर्माण मजूदरों की जरूरत थी लेकिन इसके लिए प्रशिक्षित लोग ही नहीं हैं, ऐसे में कंपनियां बाहर के प्रशिक्षित लोग को नौकरी देते थे.

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इसके बाद सिनसिनाटी फाउंडेशन ने कंपीटीटिव वर्कफोर्स के साथ साझेदारी करके स्थानीय छात्रों और बेरोजगारों को प्रशिक्षित करना शुरू किया. इसमें हाई स्कूल के शिक्षकों और कॉलेज के शिक्षकों से भी मदद ली जाती है ताकि लड़कों को प्रशिक्षण और नौकरियां मिल सकें.

टर्नर के मुताबिक इससे स्थानीय कंपनियों को भी फ़ायदा हुआ है और उन्हें नए लोगों को ट्रेनिंग देने के लिए कोई खर्च नहीं करना होगा. हालांकि क्लेक्टिव इंपैक्ट के बारे में टर्नर बताती हैं कि इस आइडिया से दुनिया बदलने वाली नहीं है, लेकिन इन छोटी छोटी चीजों से समुदाय में बदलाव हो सकता है और कंपनी का फायदा भी बढ़ना चाहिए.

टर्नर कहती हैं, "प्राइवेट सेक्टर को अपने निवेश का अच्छा रिटर्न मिल रहा है. उन्होंने अपने काम के लिए तैयार और प्रशिक्षित लोग मिलेंगे."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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