ये आइडिया की चोरी है या इंडस्ट्री का चलन

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मौजूदा कॉरपोरेट शैली में कंपनियां किसी भी काम के लिए वेंडरों को आमंत्रित करती हैं. कंपनी काम किसी एक वेंडर को ही देती हैं लेकिन इस बहाने वह दूसरे वेंडरों के प्रस्ताव को देखती हैं.

ऐसा भी होता है कि कंपनी इस दौरान दूसरे वेंडरों के अच्छे प्रस्तावों की सूची बनाती है और जिसे काम सौंपती है, उसे इन सुझावों-प्रस्तावों पर भी काम करने का निर्देश देती है.

आवेदन भरते समय वेंडर पूरी तैयारी के साथ इसे भरते हैं. काम मिलने या नहीं मिलने की अनिश्चितता के बावजूद, वे इसके लिए काफी मेहनत करते हैं. तो क्या यह नैतिक रूप से सही है कि कंपनियां उन वेंडरों के आइडिया को उठाकर, उक्त वेंडरों को काम दिए बिना, उन पर काम शुरु कर लें.

क्या ये आइडिया चुराने जैसा नहीं है?

ये इंडस्ट्री में आम बात है, लेकिन क्या आपको ये सही लगता है और आप ऐसा करेंगे?

बीबीसी कैपिटल में हर पखवाड़े कामकाजी जीवन में, कंपनी या दफ़्तर में, नैतिक मूल्यों या वर्क एथिक्स के मसले पर चर्चा होती है.

इस समस्या का हल खोजने की कोशिश की है शिकागो के दो विशेषज्ञों ने:

आम चलन

रूज़वेल्ट यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञानी किंबरले डेनेस विलियम्स के मुताबिक अगर वेंडर को ये मालूम है कि आप उसके आइडिया पर बाद में काम कर सकते हैं और काम का ज़िम्मा दूसरे को भी दे सकते हैं तो ये इथिकल यानी नैतिक भी है और लीगल भी.

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डेनेस विलियम्स के मुताबिक अगर वेंडर को ये मालूम है कि आप उसके आइडिया पर बाद में काम कर सकते हैं और काम का ज़िम्मा दूसरे को भी दे सकते हैं तो ये इथिकल यानी नैतिक भी है और लीगल भी.

डेनेस कहती हैं, "लेकिन अगर उन्हें ये मालूम नहीं है तो यह आइडिया चोरी का मामला है और अनइथिकल यानी अनैतिक भी है."

डेनेस विलियम्स ये भी सलाह देती है कि वेंडरों से कुछ छिपाना नहीं चाहिए.

बावजूद इसके क्या ऐसे चलन का बचाव नैतिक रूप से किया जा सकता है, भले ही सभी साझेदारों को इसके बारे में मालूम ही क्यों नहीं हो? इसके जवाब में डेनेस विलियम्स कहती हैं- 'नहीं.'

डेनेस विलियम्स के मुताबिक इस तरीके आपका वेंडर के साथ रिश्ता बेहतर नहीं होगा.

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डेनेस विलियम्स कहती हैं, "वेंडर की टीम ने कई घंटे लगाकर फ़ॉर्म भरा है, आप जानते हैं कि इसका उनको कोई फ़ायदा नहीं होने वाला, आपको फ़ायदा होने वाला है. आप उनको रिटर्न में कुछ नहीं देने वाले तो यह एक तरह सूदखोरी जैसा मामला है."

अनैतिक चलन

डेनेस विलियम्स के पति साइमन विलियम्स जो नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल में समाज विज्ञान के अस्सिटेंट प्रोफेसर इसे कई मायनों में अनैतिक मानते हैं.

साइमन विलियम्स के मुताबिक वेंडरों को काम मिलने की संभावना के बारे में अंधेरे में रखा गया हो तो ये एक तरह से लॉटरी टिकट खरीदने जैसा मामला है जिसमें आपके पास टिकट तो है लेकिन उसका नंबर ड्रॉ में शामिल ही नहीं है.

साइमन कहते हैं ये ना तो सही है और ना ही इथिकल यानी नैतिक.

साइमन इस प्रक्रिया को समझाते हुए कहते हैं, "ऐसी स्थिति में जाहिर तो यही होता है कि वेंडरों को आपकी कंपनी की ज्यादा जरूरत है, आपकी कंपनी को वेंडरों की कम जरूरत है. इस तरह से आप वेंडरों का शोषण करते हैं. "

हालांकि व्यवहारिक तौर पर आप किसी एक कंपनी के एक कर्मचारी होकर इंडस्ट्री के इस चलन को तुरंत नहीं बदल सकते.

लेकिन आप अपनी बात कंपनी के अधिकारियों और मैनेजरों के सामने रख सकते हैं और संभव हो तो बिडिंग प्रोसेस को पारदर्शी बनाने की कोशिश कर सकते हैं.

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डेनेस विलियम्स के मुताबिक अगर वेंडरों को ये मालूम होगा कि उन्हें काम मिलने की कितनी संभावना है तो ये ज्यादा बेहतर प्रक्रिया होगी.

आप ये भी कर सकते हैं कि जिन वेंडरों को काम नहीं मिला हो लेकिन आप उनके कुछ आइडिया को अपने यहां लागू कर रहे हों तो उनको कुछ वित्तीय भुगतान करें.

अगर आपकी कंपनी ने इस दिशा में ऐसा कदम उठाया तो उसकी चर्चा होगी. दूसरों तक बात पहुंचेगी तो इंडस्ट्री में भी बदलाव संभव है और वेंडर कहीं ज्यादा मोटिवेशन के साथ बिडिंग प्रोसेस में शामिल होंगे.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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