गोल्ड फ़िश का बौद्ध धर्म और शराब से नाता

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हो सकता है कि ख़ूबसूरत गोल्ड फ़िश को आपने भी अपने घर के एक्वेरियम में रखा हो. सुंदर जलपरियों की भांति इन मछलियों को देखना आंखों को सुकून देता है.

हम आपको गोल्ड फ़िश के बारे में वो चार बातें बता रहे हैं जो शायद आप नहीं जानते होंगे.

गोल्ड फ़िश को लोग खाते थे

गोल्ड फ़िश को पालने की शुरुआत तो बहुत बाद में हुई, पहले तो लोग इसका इस्तेमाल डिनर के तौर पर करते थे. गोल्ड फ़िश दरअसल पूर्वी एशिया में मिलने वाली जंगली मछलियों का पालतू रूप है.

इनके पूर्वज सिल्वर-ग्रे रंग के होते थे और चाई के नाम से मशहूर थे. एक समय चीन में सबसे ज़्यादा खाने में इस्तेमाल होने वाली मछली थी चाई.

संभवत किसी जेनेटिक बदलाव के चलते इनमें से कुछ मछलियों का रंग चमकीले लाल, पीले और नारंगी में तब्दील होता था. इन मछलियों पर शिकारियों की नज़र जल्द पड़ने लगी.

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नौवीं शताब्दी में चीनी लोग, ख़ासकर बौद्ध पुजारियों ने चाई मछलियों को तालाबों में पालना शुरू किया, जहां वे शिकारियों से सुरक्षित रहें.

लीजेंड के मुताबिक, उस समय के गवर्नर थिंग ये-सान ने गोल्डन और पीले रंग की चाई को जियाजिंग के तालाब में पाया. तबसे ये 'दयालुता तालाब' के नाम से मशहूर हो गया.

धार्मिक उद्देश्य से रखा गया

बौद्ध परंपरा के मुताबिक दुलर्भ प्रजाति के जानवरों को मुक्त करना अच्छा माना जाता है. इसलिए चीन में ये आम चलन में आ गया कि लोग दुर्लभ किस्म की चाई को पकड़कर तलाब में डालने लगे.

975 ईस्वी में चीन के तालाब इन मछलियों से भर गए. लेकिन अगले 100 साल ये जंगली चाई जैसे ही रहीं. गोल्ड फ़िश के पूर्वज इंसानों से बचते थे और उन्हें जो कुछ भी खाने को दिया जाता, उसे नहीं खाते थे.

कनाडा के ओंटारियो में यूनिवर्सिटी ऑफ़ गूलप के ईके बालोन बताते हैं, "इन मछलियों को धार्मिक उद्देश्य के चलते पाला जाने लगा."

1240 ईस्वी तक गोल्ड फ़िश को लोगों ने पालना शुरू किया और ये अपने पूर्वजों से अलग नज़र आने लगीं.

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इन्हें पालना आसान हो गया था और इंसान जब इन्हें खाना देते तो ये उसे खाने लगीं थीं. दयालुता के तालाब में गोल्ड फ़िश चाई, कछुए और दूसरी मछलियों के साथ रहने लगीं थीं.

गोल्ड फ़िश की संख्या बढ़ने के कारण इन्हें पालने वालों के सामने ये विकल्प पैदा हुआ कि वे क्रासब्रीड करके विविधरंगी मछलियों को पैदा करें. बालोन के मुताबिक इसकी शुरुआत हैंगचाउ सिटी के ते शू पैलेस के गोल्ड फ़िश तालाब में 1163 में हुई.

250 किस्मों की हैं गोल्ड फ़िश

इसके बाद से 1500 ईस्वी तक गोल्ड फ़िश को कटोरियों या ग्लास या अन्य बर्तनों में रखा जाने लगा. इसके बाद गोल्ड फ़िश को पालना और भी आसान हो गया.

कृत्रिम प्रजनन के चलते इन दिनों 250 तरह की गोल्ड फ़िश उपलब्ध हैं. इन सभी का ज़िक्र 1969 में प्रकाशित परनेल एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ एनिमल लाइफ़ में किया गया.

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चाई मछलियां पूर्वी और मध्य एशिया की नदी और झीलों में पाई जाती थीं, जबकि गोल्ड फ़िश आज यूरोप, दक्षिण अफ्रीका, मैडागास्कर और अमरीका तक में पाई जाती हैं. ओसानिया और कैरिबियाई द्वीप समूहों में भी गोल्ड फ़िश पाई जाती है.

शराब का असर स्पष्ट

गोल्ड फ़िश की मांग आजकल प्रयोगशालाओं में बढ़ गई है. क्योंकि इन्हें प्रशिक्षित करना सहज है और ये आसानी से उपलब्ध भी हैं.

शराब का दिमाग और शरीर पर क्या असर होता है, इसे समझने के लिए गोल्ड फ़िश सबसे ज़्यादा उपयोगी है.

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के डोनाल्ड गुडविन ने अपने शोध दल के साथ 1971 में पाया, "उनके रक्त में अल्कोहल की मात्रा उतनी ही होती है जितनी शराब की मात्रा उस पानी में होती है जिसमें मछली पानी में तैर रही होती है."

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इससे आप ये पता लगा सकते हैं कि फ़िश बोल के पानी में जितनी शराब है, उतनी ही शराब मछली के शरीर में होगी.

1969 में बॉस्टन सिटी हॉस्पीटल के रालेप रेबैक ने दिखाया किस तरह अलग अलग शराब गोल्ड फ़िश के सीखने की क्षमता को प्रभावित करती है.

ये पता इस बात से चला कि गोल्ड फ़िश एक ख़ास तरह की व्हिस्की - बॉरबॉन में उस सहजता से नहीं तैर पाती है जिस तरह से वो वोदका में तैरती है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.

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