'ब्रजेश उपाध्याय की जगह ब्रजेश ख़ान कहें'

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गुरूवार की सुबह व्हाइट हाउस की तरफ़ से जब बयान आया कि ''अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि पाकिस्तान में अल क़ायदा के ख़िलाफ़ एक अमरीकी कार्रवाई के दौरान दो बेगुनाह बंधकों की मौत हो गई है और उनमें से एक अमरीकी है,'' तो मेरे ज़ेहन में सबसे पहले वारेन वाइंस्टीन का ही ख़याल आया.

और अगली लाइन में साफ़ हो गया कि मेरा शक सही था.

उनका घर वाशिंगटन से कुछ ही दूर मैरीलैंड में है और मैं फ़ौरन वहां पहुंचा. कई बार घंटी बजाने के बाद भी किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला. घर में शायद कोई नहीं था.

बाहर एक पेड़ पर तीन पीले फ़ीते बंधे हुए थे जो अमरीका में किसी अपने के इंतज़ार में बांधे जाते हैं. इस अगस्त में उनको अगवा हुए चार साल हो जाते और उस पेड़ पर एक और फ़ीता बंध जाता लेकिन अब उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

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पाकिस्तान से थी उम्मीद

लगभग दो साल पहले मैंने इसी घर में वाइंस्टीन की पत्नी इलेन और उनकी बेटियों से बात की थी.

कैमरे पर वो बेहद संभल कर बात कर रही थीं, पाकिस्तानी और अमरीकी हुकूमत दोनों ही से गुज़ारिश कर रहे थीं मदद की, अल क़ायदा से अपील कर रही थीं कि एक 72-साल के बुज़ुर्ग जिन्होंने हमेशा से पाकिस्तान की बेहतरी के लिए काम किया है उन्हें रिहा कर दें.

कैमरा जब ऑफ़ हुआ तो वो और खुलीं और कहा कि अमरीका और पाकिस्तान दोनों ही की तरफ़ से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है.

वो अक्सर पाकिस्तान में अपने दोस्तों को फ़ोन करती थीं कि कहीं किसी ने शायद कुछ सुना हो और उस मुश्किल घड़ी में भी पाकिस्तान के लोगों के लिए उनके पास सिर्फ़ तारीफ़ के शब्द थे.

वो कह रही थीं, “वारेन तो पाकिस्तानी बन चुके थे, उन्हीं के जैसी शलवार-कमीज़ पहनते थे, कुछ हद तक उर्दू बोल लेते थे और हमेशा आम पाकिस्तानियों की मदद और बेहतरी के लिए काम करते रहते थे. कोई पाकिस्तानी उनका बुरा कैसे चाहेगा?”

वो ख़ुद भी पाकिस्तान जा चुकी थीं. कई दोस्त बनाए थे उन्होंने वहां.

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'कोई उनकी बात नहीं करना चाहता था'

उन्हें उम्मीद थी कि बीबीसी की उर्दू सर्विस के ज़रिए उनकी बात आम पाकिस्तानियों तक पहुंचेगी और शायद कहीं से कोई सुराग मिले.

बीबीसी उर्दू के इस्लामाबाद ब्यूरो के मेरे साथियों ने वहां की पुलिस से भी बात की और जवाब वही मिला जो आमतौर पर दुनिया भर की पुलिस देती है—“तहक़ीकात चल रही है, कुछ प्रगति हुई है लेकिन उससे ज़्यादा हम कुछ और नहीं बता सकते.”

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अमरीकी विदेश विभाग से जब मैने पूछा तो उनका भी यही कहना था: “हम अपनी तरफ़ से हर कोशिश कर रहे हैं”.

पता नहीं क्यों लेकिन लगता था कि कोई उनकी बात नहीं करना चाहता.

निराशा

गुरूवार को इलेन वाइंस्टीन ने जो बयान जारी किया उसमें वो ग़ुस्सा साफ़ नज़र आया जो दो साल पहले वो कैमरे पर ज़ाहिर नहीं कर सकी थीं.

उन्होंने लिखा: “वारेन ने पाकिस्तान के लिए जितना काम किया था उससे हमें उम्मीद थी कि वहां की सरकार उन्हें छुड़ाने की हर मुमकिन कोशिश करेगी. लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत और फ़ौज दोनों ही ने हमें निराश किया. मैं उम्मीद करती हूं कि आनेवाले दिनों में जब हम पाकिस्तान के साथ रिश्तों को देखें तो इस तरह की बातों पर भी ग़ौर करें”

अमरीका के बारे में भी उन्होंने लिखा कि “हम उम्मीद करते हैं कि आनवाले दिनों में अमरीकी हुकूमत अपनी ज़िम्मेदारियों को सही तरह से निभाएगी.”

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'क्या आपका मुसलमान नाम है'?

दो साल पहले उनके घर पर जब इंटरव्यू खत्म हुआ था तो उन्होंने मुझसे एक सवाल किया था.

“क्या आपका नाम एक मुसलमान नाम है?”

मैं थोड़ा चौंका और कहा—जी नहीं, क्यों?

उन्होंने कहा,”क्या ये मुमकिन है कि इस रिपोर्ट में आप अपना नाम ब्रजेश उपाध्याय की जगह ब्रजेश ख़ान कहें. उसका शायद ज़्यादा असर पडेगा.”

मैं कुछ कहता इससे पहले ही उनकी बेटी ने टोका—“ मां ये ग़लत होगा. हम ऐसा नहीं कर सकते.”

ऐसा नहीं है कि इलेन वाइंस्टीन ये समझती नहीं थीं लेकिन वो शायद एक हताश पत्नी की तरफ़ से मदद की गुहार थी, उस मदद की जो उन्हें शायद कहीं और से नहीं मिल पाई.

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