पेरिस में बसा नन्हा भारत

Image caption पेरिस के बिल्कुल मुख्य इलाक़े में स्थित है लिटिल इंडिया

पिछले दिनों जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पेरिस पहुँचे तो फ़्रांस सरकार ने उनका भव्य स्वागत किया.

लेकिन फ्रांस में भारतीयों ने मोदी का वैसा भव्य स्वागत नहीं किया जैसा कि उनके अमरीका-ऑस्ट्रेलिया-कनाडा के दौरों में हुआ था. पर इसका मतलब ये नहीं कि फ़्रांस में भारतीय नहीं बसे हुए हैं.

वहाँ न केवल भारत से आए प्रवासी बसे हैं बल्कि उन्होंने अपनी एक अलग पहचान भी बनाई है. इसी में से एक है- लिटिल इंडिया.

पेरिस के मुख्य स्टेशन गैर दू नॉर के पास स्थित ला शेपेल इलाक़े को यहाँ के लोग 'लिटिल इंडिया' के नाम से भी जानते हैं.

इंडियन गुजराती

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यहाँ तीन-चार सड़कें हैं, जहाँ की दुकानों में आम ज़रूरत की वो सब चीज़ें मिलती हैं जो भारत के किसी भी बाज़ार में मिला करती हैं.

पेरिस में इंडियन गुजराती कल्चरल एसोसिएशन के पदाधिकारी नीलेश मैसुरिया बताते हैं कि इस इलाक़े में भारतीयों ने 1975 से कारोबार शुरू किया.

वे कहते हैं, "बहुत कम समय में भारतीयों ने यहाँ पकड़ बना ली. आज शायद ही कोई दुकान होगी यहाँ, जो भारतीयों की ना हो."

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Image caption लिटिल इंडिया में जगह-जगह पुराने उपनिवेशों के नाम दिखते हैं

फ्रांस से भारतीयों के जुड़ाव का अतीत उपनिवेशकाल से शुरू होता है.

17वीं और 18वीं शताब्दी में फ़्रांस ने दक्षिण भारत में पांडिचेरी, करिकाल, यनम और माहे के अलावा कोलकाता के पास चंद्रनगर जैसी जगहों पर व्यापार के लिए बस्तियाँ बसाईं थीं.

पेरिस में भारत के राजदूत रह चुके भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी रमेश मुले बताते हैं, "पांडिचेरी जब आज़ाद हुआ तो वहाँ के लोगों से पूछा गया कि अगर वो भारत में रहना चाहते हैं तो वहीं रह सकते हैं या नहीं तो वो फ़्रांस के नागरिक बन सकते हैं. तो सबसे पहले वो लोग आए. बाद में अलग-अलग दौर में भारत के दूसरे हिस्सों से भी लोग आए."

भारतीय खाना

Image caption भारत में मिलनेवाले सारे सामान मिलते हैं लिटिल इंडिया के बाज़ार में

60-70 के दशक में मेडागास्कर, मॉरिशस और सेशल्स जैसे फ़्रेंच उपनिवेशों की आज़ादी के बाद वहाँ बसे भारतीयों ने भी फ्रांस को घर बनाया.

इधर हाल के समय में ख़ासतौर पर भारत में उदारीकरण के बाद यानी 90 के दशक से भारत से आईटी इंजीनियरों और दूसरे प्रोफ़ेशनल भारतीयों ने फ़्रांस की ओर आना आना शुरू किया है.

पिछले 22 सालों से पेरिस में रह रही श्रीवल्ली दासारी ने हाल ही में वेबसाइट के ज़रिए भारतीय खाने का कारोबार शुरू किया है.

वो कहती हैं, "जब मैं आई थी तब यहाँ मुश्किल से पाँच-छह दुकानें थीं, पिछले 22 साल में बहुत कुछ बदल गया, अब ज़्यादा भारतीय आ रहे हैं."

इस बाज़ार में वैसे बहुत सारी दुकानें श्रीलंका से आए लोगों की हैं लेकिन उन्हें भी इस इलाक़े में भारतीय दुकानें ही समझा जाता है.

संख्या

Image caption बहुत कम समय में भारतीयों ने इस इलाक़े के कारोबार में पकड़ बना ली

वैसे फ्रांस में बसे भारतीयों की निश्चित संख्या की जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि वहाँ जनगणना में जातीय मूल नहीं पूछा जाता.

लेकिन समझा जाता है कि ये संख्या 65 हज़ार से एक लाख के बीच हो सकती है– जो फ़्रांस की साढ़े छह करोड़ से ज़्यादा की आबादी का बहुत ही छोटा हिस्सा है, मात्र शून्य दशमलव एक प्रतिशत.

पेरिस में बरसों से बसी भारतीय पत्रकार वैजू नरावने बताती हैं कि अभी फ़्रांस में भारतीयों की पहचान वैसी नहीं बन पाई है जैसा कि अमरीका-ब्रिटेन-ऑस्ट्रेलिया-कनाडा जैसे देशों में बनी है.

वो कहती हैं, "यहाँ पर 60-70 के दशक तक बहुत कम भारतीय थे. भारतीय यहाँ तब आने लगे जब ब्रिटेन, अमरीका औऱ कनाडा ने बाहर से लोगों के आने पर पाबंदियाँ लगानी शुरू कीं. तो वो लोग जो पश्चिम आना चाहते थे, उन्होंने जर्मनी, स्पेन और फ़्रांस में आना शुरू किया."

राजनीतिक रसूख

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फ़्रांस के समाज और वहाँ की राजनीति में भारतीयों को वो रसूख़ हासिल नहीं हो पाया है जो अमरीका-ब्रिटेन-ऑस्ट्रेलिया-कनाडा जैसे अंग्रेज़ी भाषी देशों में हुआ है.

पूर्व राजनयिक रमेश मुले को इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता.

वे कहते हैं, "एक तो भारतीयों की तादाद यहाँ बहुत है नहीं, फिर जो आते हैं वो अपने काम में व्यस्त रहते हैं तो उनके लिए राजनीति और दूसरे सामाजिक आयोजनों के लिए समय नहीं रहता. फिर यहाँ अधिकतर काम के लिए फ़्रेंच ज़रूरी है. अगर आपकी फ़्रेंच पर पकड़ नहीं तो संभावनाएँ भी तो कम हो जाएँगी. पर धीरे-धीरे ये भी हो जाएगा."

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