'तालिबान हमले में घायल बच्ची से मिलने आए थे अक्षय'

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इस्लामिक रिपब्लकि ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान.... भारत की सीमा को छूता नहीं है ये देश लेकिन भारत के अहम पड़ोसी देशों में से एक है. अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ घनी के हाल के दौरे के कारण दोनों देशों के रिश्ते फिर से चर्चा में हैं.

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बात दो साल पुरानी है जब लद्दाख में मेरी मुलाकात भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत शाइदा मोहम्मद अबदाली से हुई थी. तब उन्होंने ये दिलचस्प किस्सा सुनाया था.

“मैं ये अकसर सबको बताता हूँ. तालिबान के हमले में ज़ख्मी एक बच्ची का इलाज भारत में हो रहा था. जब उससे पूछा गया कि तुम्हारी क्या इच्छा है जिससे तुम खुश हो जाओ तो उसने कहा मुझे एक बार अक्षय कुमार से मिलना है. तब अक्षय मुंबई से आए और उससे मिले. अमिताभ बच्चन जब 30-32 साल पहले अफ़गानिस्तान आए थे तो उन्हें देखने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा था. ये दिखाता है दोनों मुल्कों के लोगों का प्यार.

मसालेदार है, पर अच्छा है खाना

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भारत से अफ़ग़ान लोगों का ख़ास लगाव रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के कई लोगों ने भारत में अपनी दुनिया बसा ली है.

दिल्ली के लाजपत नगर जैसे इलाक़ों में अफ़ग़ान पकवानों की ख़ूशबू आपको मोह लेगी. कई अफग़ान युवक-युवतियाँ भारत पढ़ने भी आते हैं. जामिया में पढ़ने वाले बुनियाद अली बताते हैं, "यहाँ मैं बहुत सहज महसूस करता हूँ, लोग मेहरबान हैं. हिंदी भी समझ लेता हूँ. बस भारतीय खाना ज़रा मसालेदार ज़्यादा होता है, क्या है न हम अफ़गान लोग मीठा खाते हैं."

हँसते हुए वे कहते हैं, "वैसे मसालेदार ख़ाना मुझे अच्छा लगता है. हाँ जब कभी मन करता है अफ़गान खाना खाने का तो दिल्ली में कई अफ़ग़ान रेस्तरां हैं,"

सोवियत हमला

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भारत और अफ़ग़ानिस्तान के रिश्ते सदियों पुराने हैं. लेकिन अगर पिछले कुछ दशकों की बात करें तो 70 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में पूर्व सोवियंत संघ की सेना और फिर मुजाहीद्दिन के बनने से वहाँ के हालात तेज़ी से बदले हैं.

अमरीका और सोवियत संघ में शीत युद्ध की बिसात पर अफ़ग़ानिस्तान मोहरा बनता नज़र आया. भारत के लिए ये फ़ैसले की घड़ी थी.

अफग़ानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत आईपी खोसला कहते हैं, "ये बात ग़लत है कि भारत ने सोवियत संघ का साथ दिया था. इंदिरा गांधी ने उस समय सोवियत संघ से कहा था कि आपके लिए बेहतर होगा कि आप अफ़ग़ानिस्तान से फ़ौज हटा लीजिए. इससे पूरी दुनिया को दिक्कत होगी. हाँ भारत ने चिल्ला चिल्ला कर ये नहीं कहा था कि सोवियत संघ गलत है लेकिन हमने उन्हें समझाने की कोशिश ज़रूर की थी."

तालिबान का साया

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सोवियत सेना के हटने के बाद 90 के दशक में अफ़़गानिस्तान में गृह युद्ध चला और तालिबान की सरकार भी बनी. तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले केवल तीन देशो में एक था पाकिस्तान.

2001 में अमरीका के नेतृत्व में अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में हमले शुरु किए और वहाँ नई सरकार बनी. नैटो की तरह भारत अफ़़गानिस्तान में किसी सैन्य कारर्वाई में हिस्सा लेने से हमेशा दूर रहा लेकिन हामिद करज़ई के कार्यकाल में उसने अफग़ानिस्तान में आधारभूत ढाँचा विकसित करने, अस्पताल और स्कूल बनाने और दूसरे कई मानवीय कार्यों में अहम योगदान दिया.

लंबी और जटिल प्रकिया के बाद पिछले साल अशरफ़ गनी अफ़गानिस्तान के नए राष्ट्रपति बने. आम तौर पर भारत की तरफ़ झुकाव रखने आए अफ़ग़ानिस्तान राष्ट्रपति इस बार पाकिस्तान और चीन की ओर झुकते नज़र आए.

भारत के लिए अहम अफ़ग़ानिस्तान

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अफ़ग़ानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत राकेश सूद बताते हैं कि क्यों अफ़ग़ानिस्तान भारत के लिए अहम बना रहेगा और पाकिस्तान की ओर झुकाव पर भारत को चिंतित नहीं होना चाहिए.

वे कहते हैं, आपको याद होगा कि जब अफ़ग़ानिस्तान में 1993-94 में तालिबान का दौर था तो भारत में कश्मीर में हिंसा चरम पर थी. दरअसल वहाँ के मुजाहिद्दीन गुट भारत में सक्रिय हो गए. इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति रहे, इसका असर भारत पर पड़ेगा. रही बात पाकिस्तान की ओर झुकाव की तो एक गीत है- जाइए आप कहाँ जाएँगे, ये नज़र लौटके फिर आएगी.

काबुलीवाला की दुनिया

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बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच दोनों पक्ष सहमत नज़र आते हैं कि भारत और अफ़ग़ानिस्तान को मिलकर चलना होगा. फिर चाहे भारत अफगानिस्तान को हेलिकॉप्टर मुहैया कराए, वहाँ अस्पताल और स्कूल बनाए. या अफ़ग़ान क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए भारत में मैदान देने की सोचे.

क्या पता आने वाले सालों में आईपीएल में अफ़ग़ान खिलाडी खेलें ?

आख़िर भारत टैगौर से जुड़ी वही जगह है जहाँ काबुलीवाला रची गई थी. ..अफ़ग़ानिस्तान से भारत आए एक पठान की कहानी जो सूखे मेवे बेचता था, कभी अपने मुल्क लौटने की इच्छा रखता था. . इसी हार्ड और सॉफ्ट पावर का मेल भारत और अफ़गान रिश्तों को बाकियों से अलग बनाता है.

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