वो हादसे जिनसे आज का विमान डिज़ाइन बना

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एक दिन में 80 लाख लोगों से ज़्यादा हवाई सफ़र करते हैं. एक साल में विमानों पर तीन अरब से अधिक यात्री सफ़र करते हैं.

पहली कमर्शियल फ़्लाइट के 101 साल बाद, आज हम उस स्थिति में हैं जब हवाई सफ़र करने से पहले, ज़्यादातर लोग दो बार नहीं सोचते - 'क्या मेरा मैं सुरक्षित दूसरी जगह पहुँच जाऊँगा?'

लेकिन क्या आप जानते हैं उन विमान हादसों और जान पर खेलने वाले साहसिक टेस्ट पायलटों के बारे में, जिनकी बदौलत आज का प्लेन डिज़ाइन हुआ?

एक समय था जब गिने-चुने के लोग ही हवाई सफ़र करते थे. हाल के दिनों में विमान दुर्घटनाओं के बावजूद हवाई यात्रा को काफ़ी सुरक्षित माना जाता है.

ज़ाहिर है ये एक दिन में नहीं हुआ. नई-नई तकनीक के इस्तेमाल के अलावा, हवाई हादसों की वजह से भी विमान के डिज़ाइन में ख़ासे सुधार हुए जिन्होंने हवाई यात्रा को सुरक्षित बनाया.

सौ-डेढ़ सौ साल पहले, इंसान की पक्षियों जैसी उड़ान भरने की चाहत से शुरु हुआ ये सफ़र. हवाई जहाज़ के आने से पहले, कई लोग ऊंचे टावरों से, पहाड़ों से, दोनों हाथों में पंख लगाकर उड़ने की कोशिश में अपनी जान गंवा चुके थे.

जब इंजीनियर-डिज़ाइनर हादसों में मरे

एक पुराना हादसा तो कई साल तक ग्लाइडर बनाने और उड़ाने वाले वैज्ञानिक-इंजीनियर-डिज़ाइनर ओटो लिलिएंथल का है.

उड़ने के विज्ञान को भली-भांति समझने के बावजूद 19वीं शताब्दी में उन्होंने एक प्रयोग के दौरान हादसे में अपनी जान गंवा दी थी.

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खराब निर्माण और तकनीकी खामी के चलते कई हवाई जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हुए.

आज अगर किसी विमान इंजन पर रोल्स रॉयस का लोगो हो यानी उसकी मुहर हो तो उसे भरोसेमंद माना जाता है.

जबकि 32 साल के चार्ल्स रोल्स की खुद जुलाई, 1910 में बर्नमाउथ में तब मौत हुई जब उनका राइट फ्लाइर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. ये ब्रिटेन में होने वाली हवाई दुर्घटनाओं में पहली मौत थी.

रोल्स रायस के इंजिन को डिज़ाइन करने वाले रॉय चैडविक की 1947 में तब मौत हो गई थी, जबकि मैंटेनेंस की चूक के चलते उनका विमान क्रैश हो गया.

फास्ट जेट विमान की उड़ान के शुरुआती दौर में कोई टेस्ट पायलट हादसे के शिकार हुए.

जब हवा में टूटे तीन विमान

1950 के दशक में महज़ एक साल के अंदर तीन बड़े हादसे हुए जब एकदम नई डे हैवीलैंड कॉमेट कंपनी के विमान हवा में ही टूट गए थे.

इन हवाई जहाज़ों को ब्रितानी कंपनी बीओएसी (ब्रिटिश ओवरसीस एयरवेज़ कॉरपोरेशन) में 1952 में शामिल किया गया था. कॉमेट दुनिया का पहला जेट एयरलाइनर था. ये खूबसूरत विमान अंटलांटिक सागर को आसानी से पार कर लेते थे.

लेकिन इसके निर्माण में इस्तेमाल किए गए मेटल में खामी थी. इसका असर ये हुआ कि 1953 से 1954 के बीच तीन विमान हवा में ही टूट गए. इसमें दो विमान तो रोम के एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद भूमध्य सागर में दुर्घटनाग्रस्त हुए. तीसरा विमान सिंगापुर से लंदन की उड़ान के दौरान कोलकाता से दिल्ली के बीच दुर्घटनाग्रस्त हुआ.

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इसके बाद कॉमेट फ्लाइट बंद कर दी गईं और ब्रिटिश जेट के उत्पादन को बड़ा झटका लगा.

इसके बाद रॉयल एयरक्राफ्ट एस्टेबलिश्मेंट (आरएई) के निदेशक सर अरनॉल्ड हॉल की अगुवाई में इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की एक टीम ने मलबे के साथ प्रयोग करके ये पता लगाया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

इस जांच में ये पता लगा जिस मेटल से विमान बनाए गए थे, वो बहुत ज्यादा दबाव झेलने के लायक नहीं था और विमान खिड़की एवं दरवाजों के पास क्षतिग्रस्त हो जाते थे.

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बाद में निर्माण की तकनीक में सुधार किया गया. खिड़कियों को वर्गाकार (जिसके कारण वो टूट गई थीं) से बदलकर गोलाकार किया गया. इससे विमान सुरक्षित हुए. इसके बाद विकसित हुए विमान जून, 2011 तक इस्तेमाल किए गए, जब कॉमेट की पहली उड़ान लगभग 60 साल पहले, 1949 में भरी गई थी.

अमरीका के इंजीनियरों ने आरएई के नतीजों को अपने यहां इस्तेमाल किया और उसकी मदद से बोइंग और डगलस जैसे बेहद कामयाब विमान बनाए. इन विमानों ने लंबी दूरी की उड़ानों की दुनिया को ही बदल दिया.

आसमान में विमानों की टक्कर

कॉमेट के विमान लंबी दूरी की उड़ानों के लिए बोइंग और डगलस की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाए. ब्रिटेन की अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवा बीओएसी ने भी लंबी दूरी की उड़ानों के लिए बोइंग 707 का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

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अगर कॉमेट ने 1952 में सही शुरुआत की होती तो आज हम 800 सीटों वाले कॉमेट विमान ज़रूर देख पाते.

हवाई उड़ानों के लिए नई मुश्किलों का पता नए सिरे से जून, 1956 में तब लगा जब पहली बार एक व्यवसायिक उड़ान हादसे का शिकार हो गई.

टीडब्ल्यूए सुपर कांस्टेलेशन और यूनाइटेड एयरलाइंस डीसी-7 के टकराने से हुए हादसे में सौ से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद नए और बेहतर एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम की बात शुरू हुई.

इसके बाद 1958 में फेडरल एविएशन एजेंसी की शुरुआत हुई. इसे पूरी अमरीकी एयरस्पेस का अधिकार दे दिया गया. इसमें सैन्य विमान भी शामिल थे, ताकि सभी उड़ानों का नक्शा और चार्ट बनाया जा सके.

आधुनिक रडार और रेडियो टेक्नालॉजी की मदद से एयरस्पेस का कोई भी क्षेत्र खाली नहीं रहा. 1950 के दशक में रडार के बिना कई विमानों से अचानक संपर्क टूटने की घटनाएं भी सामने आई थीं.

जीपीएस की शुरुआत

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रेडियो ट्रांसपोडर्स ने जल्दी ही उड़ान भर रहे विमानों पर नज़र रखनी शुरू की. 1970 के आते आते जीपीएस की शुरुआत हुई. ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम के चलते हवाई उड़ानें और सुरक्षित हुईं. इसकी मदद से अमरीका में रोज़ाना 30 हज़ार विमान उड़ान भरते हैं लेकिन विमान टकराने की कोई घटना नहीं हुई.

इसका अलावा कुछ दूसरे हादसे भी हुए जिसके चलते कॉकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट में सुधार किया है. इसमें स्मोक डिटेक्टर्स, ऑटोमेटिक फायर एक्सीटिंग्यूर्स, विंड शियर डिटेक्टर्स, ट्रांसपोंडर्स और फ्लेम रेटडेंट मैटिरियल्स वैगरह का इस्तेमाल किया गया. इन सबके बावजूद हवा में उड़ान के खतरे तो हैं हीं.

अप्रैल 1988 में अलोहा 737 फ्लाइट हिलो से होनोलूलू की उड़ान पर थी. 24000 फीट की ऊंचाई पर जहाज़ का फ़्यूज़लेज यानी ढांचा टूट गया. एक फ्लाइट अटेडेंड सोया हुआ था, उसको छोड़कर बाकी सब इस हादसे में बच गए. यात्री सेफ्टी बेल्ट से बंधे हवा में उड़ते रहे.

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पता चला कि बोइंग विमान पर हवा का दबाव झेलने के लिए की जानी वाली री-प्रेशराइज़ेशन 89 हज़ार बार कर चुका है. जबकि कॉमेट विमान हादसे के शिकार हुए तब उनमें मात्र 900 से 3060 बार तक ऐसा हुआ था.

इस हादसे के बाद फेडरल एविएशन एजेंसी ने नेशनल एजिंग एयरक्राफ्ट रिसर्च प्रोग्राम की शुरुआत की. इससे हवाई जहाज़ की सुरक्षा संबंधी सारे टेस्ट किए जाते हैं.

ऐसे-ऐसे हादसे

अगस्त, 1985 में एक और हादसा हुआ. जापानी एयरलाइंस का बोइंग 747 विमान टोक्यो से ओसाका की उड़ान पर था. इसके सभी केबिन का प्रेशर खत्म हो गया. इसके बाद इस जहाज़ को लैंड करने की कोशिश हुई लेकिन विमान हादसे का शिकार हो गया. इसमें 520 लोगों की मौत हुई थी, केवल चार लोग बच पाए थे.

सितंबर, 1998 में एक हादसा स्विस एयर के विमान एमडी-11 के साथ हुआ था. न्यूयार्क से जिनेवा जा रहे इस विमान में आग लग गई. इसके बाद हुए विस्फोट में सवार सभी 229 लोगों की मौत हो गई. पता चला कि बचाव का कारण विमान का एंटरटेनमेंट सिस्टम है. इसके बाद आग से बचाव के लिए नए मैटिरियल का इस्तेमाल होने लगा.

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जुलाई 2000 में ऐसा हादसा हुआ जो किसी कल्पना से परे था. रनवे पर मेटल का कोई टुकड़े पर कांटिनेंटल एयरलाइंस डीसी-10 कॉनकॉर्ड का एक टायर आ गया. पेरिस के चार्ल्स डि गॉल एयरपोर्ट पर टेक ऑफ के लिए तैयार विमान में आग लग गई और ये एक होटल से जा टकराया.

इसमें सवार सभी 100 यात्रियों की मौत हो गई. विमान दल के 9 कर्मचारी और 4 होटल कर्मियों की भी मौत हुई. इसके बाद हवाई जहाज़ के फ्यूल टैंक और टायर को भी अपग्रेड किया गया.

आज हवाई उड़ान सुरक्षित हैं, तो इसकी वजह ये हादसे और उनसे मिली सीख ही है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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