भारत में धार्मिक आज़ादी की कमी: अमरीकी आयोग

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भारत ने अमरीका के एक आयोग की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता के बारे में टिप्पणी की गई है.

अमरीका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने 2015 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की है. इसमें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ़ हिंसा की आलोचना की गई है और धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को चिंताजनक बताया गया है.

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यह आयोग हर साल दुनिया भर के उन देशों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट जारी करता है जहां कथित तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता की कमी या उल्लंघन और धार्मिक तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ भेदभाव होता है.

रिपोर्ट खारिज

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने रिपोर्ट के बारे में कहा, "इस रिपोर्ट में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, उससे लगता है कि यह रिपोर्ट भारत, उसके संविधान और समाज के बारे में बहुत सीमित समझ के आधार पर तैयार की गई है."

यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजीयस फ़्रीडम या अमरीकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत को टीयर -2 सूची में रखा है. साल 2009 से भारत को इसी सूची में रखा जा रहा है.

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इस सूची में उन देशों को रखा जाता है जहां धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन में कथित तौर पर सरकारें या तो खुद लिप्त होती हैं या ऐसे उल्लंघन को बर्दाश्त करती हैं.

'जबरन धर्म परिवर्तन पर ज़ोर'

रिपोर्ट में कहा गया है कि धर्म से प्रेरित दंगों के मामलों में पिछले तीन वर्षों में तेज़ी आई है. आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में सबसे अधिक सांप्रदायिक हिंसा हुई है.

इस रिपोर्ट में भारत में धर्म से प्रेरित हिंसा में 1984 के सिख-विरोधी दंगे, 2002 के गुजरात दंगे, उत्तर प्रदेश में 2013 के दंगों और उड़ीसा में ईसाइयों के खिलाफ़ हमलों की भी चर्चा की गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले आम चुनावों के बाद से ही धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को सत्ताधारी भाजपा से जुड़े नेताओं ने अपमानजनक शब्दों का निशाना बनाया.

रिपोर्ट के मुताबिक आरएसएस और विहिप जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने अल्पसंख्यकों को कई हिंसक हमलों और जबरन धर्म परिवर्तन के लिए निशाना बनाया.

नरेंद्र मोदी का वादा

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लेकिन रिपोर्ट में इस बात पर इत्मिनान जताया गया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने एक बयान में धार्मिक स्वतंत्रता को हर हाल में बचाए रखने पर कटिबद्धता जताई है.

इसी आयोग ने गुजरात दंगों के सिलसिले में अमरीकी सरकार से नरेंद्र मोदी पर वर्ष 2005 से अमरीका प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने को कहा था.

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2014 में हिंदू गुटों ने 'घरवापसी' कार्यक्रम के तहत क्रिसमस के मौके पर 4000 इसाई परिवारों और 1000 मुस्लिम परिवारों को जबरन हिंदू धर्म में परिवर्तन करने की योजना की घोषणा की थी.

आयोग ने कहा है कि कई हिंदू संगठनों ने ईसाइयों और मुसलमानों को हिंदू धर्म में लाने के लिए कई हिंदुओं को धन भी दिया. इस सिलसिले में पिछले साल दिसंबर में आगरा में सैकड़ों मुसलमानों के जबरन हिंदू धर्म अपनाने का वाकया भी शामिल किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार धार्मिक उन्माद फैलाने वाले नेताओं की सार्वजनिक रूप से निंदा करे.

भारत सरकार से यह अपील भी की गई है कि वह राज्यों में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप धर्मान्तरण निरोधक कानून बनाने और उनको लागू करने के लिए दबाव भी डाले.

'घरवापसी में क्या ग़लत है'

लेकिन अमरीका में रहने वाले भाजपा और नरेंद्र मोदी के समर्थकों को अमरीका का इस तरह भारत के अंदरूनी मामलों पर टिप्पणी करना पसंद नहीं है.

न्यूयॉर्क में रहने वाले शेर बहादुर सिंह अमरीकी आयोग की रिपोर्ट पर कहते हैं, "अमरीका का भारत के बारे में बोलने का कोई हक़ नहीं है. बालटीमोर में क्या हो रहा है यह नहीं दिखता है अमरीका को? अगर ऐसा ही था तो अमरीका यह भी रिपोर्ट दे कि अमरीका से जाकर भारत में लोग हिंदुओं को इसाई क्यों बना रहे हैं? इन्होंने रिपोर्ट में घरवापसी के बारे में लिखा है पर उसमें गलत क्या है, अगर कोई धर्म बदल रहा है तो उसमें क्या हुआ."

अमरीकी आयोग की रिपोर्ट में पाकिस्तान समेत 8 देशों को विशेष चिंता वाले देशों की सूची में शामिल किया गया है.

पाकिस्तान भी निशाने पर

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रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में सरकार खुद भी धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघन में लिप्त रही और उन्हें होने दिया.

रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी सरकार तालिबान के ख़िलाफ़ कार्रवाई तो कर रही है लेकिन अल्पसंख्यकों खासकर शिया, ईसाई, हिंदू और अहमदी लोगों के खिलाफ़ हिंसा जारी रही.

आयोग ने कहा कि पाकिस्तान में ईशनिंदा का कानून भी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है.

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