ये भूकंप किसके गुनाहों की सज़ा है..

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आपको शायद याद हो कि 10 साल पहले 8 अक्तूबर, 2005 को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में कैसा भयानक भूकंप आया था जिसमें क़रीब 90 हज़ार लोग मारे गए और बीसियों गाँव मिट गए.

मैं जब तबाही के बाद बालाकोट पहुँचा तो देखा कि पूरा शहर ईंट-पत्थर का ढेर है. हर परिवार में इतने लोग मरे कि ज़िंदा रह गए अपना रोना ही भूल गए.

लोग कुदालों और हाथों की मदद से दबे हुए ज़ख़्मी लोगों और लाशों को निकालने में लगे हुए थे कि तभी एक वैगन आई जिस पर भोंपू फिट था.

इस वैगन में बहुत से सफ़ेद कपड़ों और रंगीन पगड़ियों वाले लोग सवार थे.

उनमें से एक मौलाना साहब वैगन की छत पर खड़े होकर कहने लगे, "ऐ मुसलमानो ये भूकंप तुम्हारे ग़ुनाहों का नतीजा है. अपने रब से गिड़गिड़ाकर माफ़ी माँगो, दाढ़ी मुड़वाना छोड़ दो, बेहयाई के काम बंद कर दो, अपनी औरतों को बेपर्दा करने से बाज आ जाओ वरना इससे भी बड़ा अज़ाब आएगा."

'ज़िंदा लाशों की पथराई आँखें'

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कुछ ज़िंदा लाशों ने इन मौलाना साहब की तरफ़ पथराई आँखों से देखा और फिर अपने प्यारों की तलाश में जुट गए. इस पवित्र वैगन में से कोई भी मुसीबत के मारों की मदद के लिए नहीं उतरा और फिर वो वैगन दूसरे गाँव के लोगों को डराने के लिए धुँआ छोड़ते हुए आगे बढ़ गई.

इसी तरह जब अमरीका के पूर्वी तट पर अक्तूबर, 2012 में सैंडी नामक साइक्लोन से तबाही मची तो पकिस्तान में कई धार्मिक नेताओं ने बयान दिया कि अमरीका ने पूरे विश्व में जो बदमाशी फैला रखी है ये तबाही उसी का नतीजा है.

मुझे वो तस्वीर भी नहीं भूलेगी जब 2010 में आई बाढ़ में 20 प्रतिशत पाकिस्तान डूब गया और एक जगह एक टीवी चैनल की रिपोर्टर बारिश में कँपकँपाते बच्चे के मुँह में माइक ठूँसते हुए पूछ रही थी कि "बेटा तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं?" और बच्चा कह रहा था, "मुझे कपड़े दे दो."

रिपोर्टर ने पूछा, "तुम्हारा घर कहाँ है?" बच्चा कह रहा था, "बा जी मुझे सर्दी लग रही है."

'बुरा न मानिएगा'

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Image caption भाजपा सांसद साक्षी महाराज

प्लीज बुरा न मानिएगा, वीएचपी की प्रचारक साध्वी प्राची की इस बात का, कि भूकंप का कारण राहुल गांधी की केदारनाथ यात्रा थी. या लोकसभा सदस्य साक्षी महाराज की बात का कि राहुल गांधी बीफ़ खाकर पाक साफ हुए बगैर जहाँ भी जाएंगे मुसीबत ही लाएंगे.

या फिर वेबसाइट इंडियाफ़ैक्ट्स के एडीटर संदीप बालाकृष्णन के इस ट्वीट का कि नेपाल का भूकंप ईसाई मिशनरियों की तरफ़ से धर्म बदलवाने की कोशिशों का नतीजा है.

और बुरा न मानिएगा उस जोशीले टीवी चैनल रिपोर्टर की बात का जो भूकंप से निढाल नेपाली परिवार से पूछ रहा था, "इस समय आप कैसा महसूस कर रहे हैं."

माफ़ कर दें इन सब प्रोफ़ेशनल्स को क्योंकि ये ऐसे ही हैं, ऐसे ही रहेंगे. ओछे के हाथ में तीतर, बाहर रखूँ कि भीतर!

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