ब्रितानी चुनाव भारत से कितने अलग?

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7 मई को होने वाले ब्रितानी चुनाव में वोटर एक कागज़ पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम पर निशान लगाकर वोट डालेंगे. मगर भारत में तो ऐसा पिछली सदी में ही होता था.

2004 से भारत में मतपत्रों की जगह ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है. हालांकि बटन दबाकर मतदान करने वाले भारतीयों के लिए यह एक अजूबा-सा ही है.

ब्रिटेन में चुनावों में तकनीक के इस्तेमाल के हिमायती भी कहते हैं कि इसे बदलना टेढ़ी खीर ही है.

चुनाव तकनीक पर काम करने वाली कंपनी स्मार्टमेटिक वर्ल्डवाइड के चेयरमैन लॉर्ड मार्क मैलक ब्राउन का कहना था, ''भारत में 85 करोड़ मतदाता हज़ारों उम्मीदवारों को चुनते हैं. ऐसे में पुराने मतपत्रों और कागज़-क़लम की मदद लेना बड़ी चुनौती होगी.''

वह कहते हैं, ''भारत ने ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद को ढाल लिया है जो एक बड़े और जटिल लोकतंत्र के हिसाब से ज़रूरी भी था. जबकि यहां ब्रिटेन में उतनी बड़ी चुनौती नहीं है और सदियों पुराना एक संतोषभाव भी है कि चलो यही ठीक है.''

अंतर

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भारत और ब्रिटेन के चुनावों में दूसरा अहम फ़र्क शोर-शराबे का है. यहां इस बात अहसास ही नहीं होता चुनाव अभियान चल रहा है. बस हर पार्टी का एक मेनिफ़ेस्टो है जिस पर उनके वादे दर्ज हैं. न कोई महारैली, न थ्रीडी तकनीक से भाषण और न ही कोई लाउडस्पीकर.

ब्रिटेन की राजनीति पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ लॉर्ड भीखू पारेख का कहना था, ''यहां हर मतदाता क़रीब 70 फीसदी तक तय है कि वह किस पार्टी को कहां वोट देगा. इनके लिए आपको चिल्लाना नहीं पड़ता, वो ख़ुद चले आते हैं. हमारे यहां किसी पार्टी सदस्यता का सवाल ही नहीं है. इसीलिए आपको यहां बुलाना पड़ता है.''

लॉर्ड भीखू मानते हैं कि भारत में भी चुनावों की अपनी अहमियत है. वह कहते हैं, ‘‘हमारे यहां जो कलरफ़ुल इलेक्शन होती हैं उसका भी एक मज़ा है. धार्मिक संस्कृति की जो भाषा है उसे हम राजकीय क्षेत्र में लाते हैं. तो हमारे चुनावी रीति-रिवाज जो हैं वो धार्मिक रीतियों से मिलते-जुलते हैं. यहां तो बिल्कुल अलग बात है.’’

एक अहम सवाल है चुनाव खर्च का. भारत में चुनावों में होने वाले खर्च और उसके स्रोतों पर ख़ूब बहस-मुहाबिसे होते हैं. ये आम राय है कि भारत में चुनाव आयोग की तय की गई ख़र्चे की सीमा से अधिक पैसा बहाया जाता है.

सीमाएँ

ब्रिटेन में भी उम्मीदवार के लिए ऐसी ही सीमाएँ हैं. चुनावों की घोषणा के बाद से लंबा अभियान शुरू होता है जिसमें 29 लाख रुपए से ज़्यादा ख़र्च नहीं किया जा सकता. जबकि उम्मीदवार के नाम की घोषणा के बाद जो छोटा अभियान शुरू होता है उसमें 8700 पाउंड प्रति उम्मीदवार खर्च करने की छूट है.

लंदन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ अफ़्रीकन एंड एशियन स्टडीज़ में सीनियर लेक्चरर सुबीर सिन्हा ने बताया, ''यहां इलेक्टोरल कमीशन है. जो भी पार्टी या कैंडिडेट है उसका उत्तरदायित्व है कि वह खर्च की रसीद रखे और उसका ऑडिट होता है. इसका उल्लंघन करने पर उम्मीदवारी भी रद्द हो सकती है.''

कुल मिलाकर सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव उत्सव चाहे जितने जुदा हों, पर दोनों को मज़बूती देती है उनकी जनता.

यह ज़रूर है कि भारत में चुनावों के मेले में घूम चुके लोगों को यहां के चुनाव कुछ नीरस से लगेंगे.

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