मोदी की यात्रा पर चीन में 'आशा'

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुरुवार से शुरू हुई तीन दिवसीय चीन यात्रा को लेकर चीनी अख़बार और टप्पणीकार सावधानीपूर्वक टिप्पणी कर रहे हैं. लेकिन यात्रा को लेकर वो आशावान भी हैं.

चीनी अख़बारों ने 'आर्थिक संबंधों' को तरजीह देते हुए भारतीयों से 'लोकतंत्र' और 'क्षेत्रीय विवादों' को लेकर अपनी हठ छोड़ने को कहा है.

ज़्यादातर अख़बार इस बात को लेकर आश्वस्त नज़र आ रहे हैं कि भारत और चीन स्वभावविक सहयोगी हैं. उन्हें लगता है कि 21वीं सदी इन दो एशियाई देशों की है.

जब भी दोनों देशों के नेता आते-जाते हैं यह बात दोहराई जाती है.

वास्तविक समस्या

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Image caption नरेंद्र मोदी तीन दिन की यात्रा पर चीन पहुँचे हैं.

दोनों देशों के बीच 4057 किलोमीटर लंबी अस्पष्ट सीमा है, जिसे लेकर विवाद है. दोनों देश 1962 में युद्ध भी लड़ चुके हैं.

शंघाई के फुडान विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ शेन डिंगली ने 'हांगकांग कॉमर्शियल डेली' से कहा कि समस्याओं के एक यात्रा में नहीं सुलझाया जा सकता है.

उन्होंने भारत से अधिक दयालु और उदार होने और भारत के विवादित राज्य अरुणाचल प्रदेश को चीन की ओर से मान्यता न देने और उसे तिब्बत का हिस्सा मानने के रुख को सहन करने का अनुरोध किया है.

वे चीन से व्यावहारिक होने की सलाह देते हुए कहते हैं, भारत के पास परमाणु हथियार हैं, हम क्या कर सकते हैं.

नरेंद्र मोदी की जापान, अमरीका और यूरोपीय देशों के साथ अपनाई गई कूटनीति भी चीनी टिप्पणीकारों को हजम नहीं होती दिख रही है.

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पूर्वी एशिया में कूटनीति

भारतीय प्रधानमंत्री पूर्वी एशिया के उन देशों से भी कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते बेहतर बना रहे हैं जिन्हें चीनी विशेषज्ञ कूटनीतिक रूप से पिछड़ा मानते रहे हैं.

शंघाई अकादमी ऑफ़ सोशल साइंस के विशेषज्ञ हू झियांग कहते हैं कि मोदी इन देशों से संबंध बेहतर कर चीन को टक्कर देने की कोशिश कर रहे हैं.

झियांग ने 'ग्लोबल टाइम्स' में लिखा है,"लेकिन मोदी की ओर से पिछले साल उठाए कूटनीतिक क़दम बताते हैं कि वे दूरदर्शी नहीं बल्कि व्यावहारिक हैं."

झियांग लिखते हैं, "मोदी सीमा विवाद और सुरक्षा मुद्दों पर चालाकियां भी कर रहे हैं ताक़ि वे अपने देश में अपनी साख बढ़ा सकें और चीन के साथ वार्ता में लाभ उठा सकें."

शंघाई के एक और विशेषज्ञ वांद डेहुआ का कहना है कि अमरीका चीन से निपटने के लिए भारत का इस्तेमाल करना चाहता है.

ग्लोबल टाइम्स के एक लेख में कहा गया है कि चीन और भारत के संबंध सीमा विवाद जैसे नकारात्मक मुद्दों के कारण लगातार नज़रअंदाज़ किए जाते रहे हैं.

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Image caption बीते साल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे.

आर्थिक सहयोग तनाव पर भारी

हालांकि ये भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध सीमा विवाद पर टकराव पर भारी पड़ सकते हैं.

ज़्यादातर चीनी मीडिया ने दोनों देशों के बीच विवादों का उल्लेख तो किया है लेकिन केंद्र में आर्थिक संबंध ही हैं.

राष्ट्रवादी 'ह्वाक्यू डेली' ने मोदी की यात्रा पर एक पूरा पन्ना समर्पित करते हुए कहा है कि आर्थिक और व्यापार क्षेत्र में सहयोग ही यात्रा का मुख्य एजेंडा है.

'द पीपुल्स डेली' का अंतरराष्ट्रीय संस्करण को लगता है कि चीन से रिपोर्टिंग के समय भारतीय मीडिया संस्थान सकारात्मक रुख अपनाते हैं.

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अख़बार कहता है कि भारतीय अख़बार अभी भी चीन के तेज़ विकास को लेकर सावधान है. लेकिन वो चीन के विकास मॉडल से सीखना भी चाहते हैं.

वीबो डिप्लोमेसी

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Image caption भारत और चीन की 4057 किलोमीटर लंबी अस्पष्ट सीमा है.

मोदी का चीनी सोशल मीडिया वेबसाइट वाइबो पर खाता खोलने से भी चीन में उनकी यात्रा को लेकर ख़ासी चर्चा हुई.

पीपुल्स डेली ने चीनी लोगों तक पहुँचने के मोदी के इस प्रयास को 'वीबो डिप्लोमेसी' बताया है.

अख़बार के मुताबिक अधिकतर चीनी लोगों ने वीबो पर मोदी का स्वागत ही किया है.

हालांकि इंटरनेट पर सभी टिप्पणियाँ सकारात्मक नहीं हैं.एक यूज़र ने मोदी से कहा है कि वे ईमानदारी दिखाएं और दक्षिणी तिब्बत चीन को सौंप दें.

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