कूटनीति के पक्के खिलाड़ी हैं मोदी, जिनपिंग

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चौसठ वर्षीय नरेंद्र मोदी पिछले साल 26 मई को प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद अब तक कम से कम 18 देशों की यात्रा कर चुके हैं.

एक तरह से देखा जाए तो सातों में से कोई महाद्वीप उनसे अछूता नहीं रहा.

चीन के राष्ट्रपति 61 वर्षीय शी जिनपिंग मार्च 2013 में राष्ट्रपति बने और वो भी हर महाद्वीपों का दौरा कर आए हैं. कुल 18 से ज़्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं वो.

चीनी राष्ट्रपति ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए रूस को चुना था.

इसका मक़सद अमरीका को एक प्रतीकात्मक संदेश देना था, जिसके यूरोपीय-एशियाई देशों से संबंध कुछ ख़राब चल रहे हैं.

लेकिन चीन के लिए प्राकृतिक गैस और तेल भंडारों से समृद्ध रूस वैश्विक स्तर पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है.

मोदी, जिनपिंग और ब्रिक्स

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उधर, भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान को चुना.

मक़सद था, यह संदेश देना कि उनकी सरकार के लिए पड़ोसी बहुत अहम हैं.

जुलाई 2014 में मोदी ब्राज़ील में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका के नेताओं से मिले.

चीनी राष्ट्रपति ने तंज़ानिया और कॉन्गो गणतंत्र का भी दौरा किया जो इस बात का स्पष्ट संकेत था कि चीन खनिज पदार्थों में समृद्ध अफ़्रीका से भी संबंध सुधारने में दिलचस्पी रखता है .

चीनी राष्ट्रपति का अफ़्रीका दौरा एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था ताकि खनिज संसाधनों और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जा सके.

वहीं मार्च में मोदी की मॉरीशस और सेेशेल्स यात्रा का मक़सद हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव के बरक्स इन देशों की महत्ता पर ज़ोर देना था.

अमरीका से रिश्ते

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इस साल भारत के गणतंत्र दिवस के मौक़े पर मुख्य अतिथि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत नज़दीकी साफ़ ज़ाहिर हुई.

पिछले साल नवंबर में राष्ट्रपति जिनपिंग ने राष्ट्रपति ओबामा की मेज़बानी की जब वे एपेक (एशिया पेसेफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन) में हिस्सा लेने के लिए आए थे.

दोनों नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण मुद्दों और पर्यावरण पर भी चर्चा की.

मोदी, जिनपिंग और यूरोप

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मार्च 2014 में चीनी राष्ट्रपति पश्चिमी यूरोप गए और नीदरलैंड्स में परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में भाग लिया.

उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम का भी दौरा किया. इस तरह उन्होंने वैश्विक स्तर पर चीन के बढ़ते क़द और आर्थिक ताक़त का भी प्रदर्शन किया.

पिछले महीने मोदी भी जर्मनी, फ्रांस और कनाडा की द्विपक्षीय यात्रा पर गए. यात्रा का मक़सद विदेशी निवेश को आकर्षित करना और अपने 'मेक इन इंडिया' मिशन को बढ़ावा देना था.

दोनों की विदेश नीति के लक्ष्य

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शी जिनपिंग की विदेश नीति का लक्ष्य है चीन को वैश्विक शक्ति के रूप में संगठित और प्रोत्साहित करना.

जबकि भारत के प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएं या तो विदेशी निवेश को आकर्षित करके आर्थिक प्रगति को तेज़ करने पर केंद्रित थीं या फिर बीजिंग के भारत विरोधी क़दमों के जबाब के तौर पर रहीं.

पिछले साल सितंबर में मोदी की जापान यात्रा या फिर भूटान, नेपाल और श्रीलंका यात्रा से यह बिल्कुल स्पष्ट था.

पाकिस्तान से संबंध दोनों देशों की विदेश नीति में काफ़ी अहमियत रखते हैं.

अलग तरीक़े

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जहां जिनपिंग बड़ी आर्थिक मदद देकर इस्लामाबाद का पुरज़ोर समर्थन कर रहे हैं, वहीं मोदी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने में नाकाम रहे हैं.

दोनों नेता अपेक्षाकृत कम उम्र के हैं और दोनों की विदेश नीति की शैली और तरीक़े में बहुत सारी समानताएं हैं.

हालांकि दोनों के राष्ट्रीय उद्देश्य अलग हैं और दोनों उन तक पहुंचने के अलग तरीक़े अपना रहे हैं.

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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