फ़लस्तीनी ननों को संत का दर्जा

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कैथोलिक ईसाईयों के सबसे बड़े धर्म गुरू पोप फ्रांसिस ने 19वीं सदी की दो फ़लस्तीनी ननों को संत घोषित किया है.

उस समय वे मुस्लिम ऑटोमन साम्राज्य में रहती थीं.

मेरी अलफ़ोनसीन घट्टास और मरियम बवारडी के साथ दो और लोगों के संत होने की घोषणा रोम के सेंट पीर्ट्स स्कावयर में की गई.

पहली बार अरब ईसाई संत

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इस समारोह में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के अलावा क्षेत्र के 2000 से अधिक ईसाईयों ने हिस्सा लिया.

ये पहली बार है जब अरबी मूल के किसी ईसाई के संत होने का एलान किया गया है.

इस क़दम को वैटिकन के मध्य पूर्व में रहने वाले ईसाईयों तक पहुंचने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

पोप ने शनिवार को अब्बास से मुलाक़ात की थी और उन्हें ‘शांति का फरिश्ता’ बुलाया था.

'फ़लस्तीनी क्षेत्र को दी मान्यता'

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अब्बास के दौरे के पहले वैटिकन ने फ़लस्तीनी इलाक़े को मान्यता देने की संधि की है.

संधि के तहत इसराइल-फ़लस्तीनी विवाद का हल दो मुल्कों की स्थापना पर आधारित है.

वैटिकन को ये अधिकार भी मिला है कि वो अब्बास के शासन वाले क्षेत्र में रोमन कैथोलिक इसाईयो की स्थितियों पर नज़र रख सके.

इसराइल ने उस संधि पर जिसमें ‘फ़लस्तीनी मुल्क’ का इस्तेमाल किया गया है निराशा जताई है.

अरब क्षेत्र के ईसाई

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संत का दर्जा पाने वाली मेरी अलफ़ोनसीन घट्टास का जन्म येरूश्लम के एक फ़लस्तीनी परिवार में हुआ था. उन्होंने बाद में रोज़रि सिस्टर्स नाम का समूह की स्थापना की जो बच्चों के स्कूल चलाता है.

मरियम बवारडी का जन्म गैलिलि में हुआ था. उनके माता पिता का तालुक्क़ ग्रीक कैथोलिक चर्च से था. और वो मिस्र और लेबनान के रहने वाले थे.

येरूश्लम में मौजूद बीबीसी संवाददाता योलांद नेल का कहना है कि इन दोनों औरतों को संत का दर्जा देकर चर्च उनके अच्छे कामों की सराहना तो कर ही रहा है. लेकिन साथ ही वो इसाईयत के जन्मस्थली में रहने वाले ईसाई समुदाय का समर्थन भी कर रहा है.

इसराइल और फ़लस्तीनी क्षेत्र में ईसाईयों की तादाद कुल जनसंख्या घटकर दो प्रतिशत तक गिर गई है.

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक ये मुसलमानों और यहूदियों की बढ़ती संख्या की वजह से तो है ही. लेकिन साथ ही संघर्ष के हालात और विदेशों में बेहतर अवसर की मौजूदगी भी इसकी एक बड़ी वजह है.

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