ओबामा क्यों डरे हुए हैं मोदी से

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भारत वालों को ख़ुश रखना बड़ा मुश्किल काम है.

दस साल तक इस बात का रोना था कि ऐसे प्रधानमंत्री मिले हैं जो बोलते ही नहीं, मनमोहन की जगह उनका नाम "मौन-मोहन" रख दिया था.

अब शिकायत ये है कि नए प्रधानमंत्री ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान जो बोलना शुरू किया, एक साल होने को आया अब तक बोले ही जा रहे हैं.

तोड़ देते ओबामा का रिकॉर्ड?

कहां तो खुश होना चाहिए था कि इतने सक्रिय प्रधानमंत्री हैं कि जब देखो दौरे पर रहते हैं. एक साल के अंदर 17 देशों का दौरा कर लिया.

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आठ-नौ देश और हो आते तो ओबामा के पहले साल के 25 विदेशी दौरों का रेकॉर्ड तोड़ देते.

लेकिन प्लेन में बैठे नहीं मोदीजी, कि जनता घिसे हुए रेकॉर्ड की तरह शुरू हो जाती है - घर कब आओगे, घर कब आओगे.

इन लोगों की चीख़ की वजह से बेचारे टीवी चैनल्स की एक अच्छी भली हेडलाइन मिस हो गई - मोदी ने ओबामा को पछाड़ा.

और अब जब मोदी की घरवापसी हुई है तो भाई लोग बैठ कर घर में आईपीएल देख रहे हैं.

साल पूरा होने पर मथुरा में रैली हो रही है और दो लाख लोग जुटाना मुश्किल हो रहा है.

सुना है छह हज़ार बीजेपी के मुलाज़िम भीड़ जुटाने में लगे हैं.

पुतिन को गले लगना

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आप कह रहे होंगे कि आप वाशिंगटन में बैठे-बैठे मथुरा की ख़बर क्यों ले रहे हैं?

भाई साहब, मामला ये है कि मोदी जी ने एक साल में ही ओबामा की नींद उड़ा रखी है.

ओबामा डरे-सहमे तो हैं ही चिढ़े भी हुए हैं.

उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इनसे डील कैसे करें.

चिढ़े हुए इस बात से हैं कि पहले तो रिपब्लिक डे पर बुलाया, बराक ये, बराक वो कहकर गलबंहियां डालीं, तीन घंटे तक की एक बोरिंग सी परेड दिखाई.

ओबामा ने सबकुछ हंसते-हंसते सहा, ये सोचकर कि इस बंदे को खिला-पिला कर मोटा करना है. चीन के ख़िलाफ़ ज़रूरत पड़ने पर पहलवानी करने के लिए.

लेकिन पहलवानी क्या ख़ाक करेंगे, ये साहब तो चीन जाकर हिंदी-चीनी का नारा लगाने लगे.

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एक तरफ़ पुतिन को गले लगाते हैं दूसरी तरफ़ अमरीका को अपना हमसफ़र बताते हैं.

रिटायरमेंट प्लान खतरे में

लेकिन ये सब तो दीन-दुनिया वाली बातें हैं, असली डर तो ओबामा को सता रहा है कि मोदी कहीं उनके रिटायरमेंट प्लान की न ऐसी-तैसी कर दें.

अब ओबामा की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि भाषण बड़ा अच्छा देते हैं.

उन्होंने भी सोचा था कि डेढ़ साल में जब रिटायर हो जाएंगे तो दुनिया भर में घूम-घूमकर भाषण देंगे और डॉलर कमाएंगे.

आख़िर बिल क्लिंटन और हिलेरी क्लिंटन ने करोड़ों डॉलर भाषण दे देकर कमा लिए हैं.

अगर बिल और हिलेरी को एक भाषण का तीन से पांच लाख डॉलर तक मिलता है तो ओबामा भी उतनी कमाई तो कर ही लेंगे.

साथ ही ये भी उम्मीद है कि हिलेरी राष्ट्रपति बन गईं तो मुक़ाबला सिर्फ़ बिल से रह जाएगा और बिल का दिल तो कई जगहों पर उलझा रहता है.

लिहाज़ा, ज़्यादातर भाषण के बुलावे ओबामा को ही आएंगे और फिर होगी डॉलरों की बरसात.

मिशेल जैसी ड्रेस चाहेंगी, वैसी ख़रीद देंगे.

जब से भारत से लौटी हैं हमेशा शिकायत करती हैं मोदी के कपड़े मेरे कपड़े से बेहतर कैसे!

मिशेल का स्टाइल

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दुनिया भर में पहले मिशेल के कपड़ों के स्टाइल की बात होती थी, अब सब मोदी के स्टाइल की बात करते हैं.

लेकिन ओबामा को डर सता रहा है, मोदी इन सब मंसूबों पर पानी न फेर दें.

दुनिया भर में भाषण दे-देकर अपनी ब्रांडिंग बढ़ा रहे हैं, अंग्रेज़ी भी बेहतर होती जा रही है.

दुनिया भर में इतने देसी भर गए हैं कि भीड़ भी अच्छी-खासी जुट जाती है.

ऐसे में, क्या पता कि जो बड़ी-बड़ी कंपनियां लाखों डॉलर देती हैं वो सोचेंगी आधी क़ीमत देकर मोदी से ही भाषण दिलवा लें.

बल्कि जब तक प्रधानमंत्री हैं तब तक तो पैसे भी नहीं लेंगे.

भाषण की आउटसोर्सिंग

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तो जैसे आउटसोर्सिंग कर कर के अमरीकी नौकरियां इन कंपनियों ने खत्म कीं, वैसे ही भाषण की आउटसोर्सिंग करने में कितना वक्त लगेगा.

लेकिन ये तो डेढ़ साल के बाद की चिंता है.

अभी तो ओबामा ये चिंता करें कि पिछली बार सितंबर में मोदी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए आए तो मैडिसन स्कवेयर गार्डन पर ऐसा रॉकस्टार वाला शो किया कि पूरी दुनिया में चर्चे हुए.

इस बार, क्या पता वाशिंगटन के नेशनल मॉल को पटना के गांधी मैदान में बदलने की तैयारी के साथ आ रहे हों.

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