सऊदी में फँसे भारतीय मज़दूरों की व्यथा

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"न हमें एम्बैसी भारत भेज रही है, न सऊदी सरकार भेज रही है. हालात बेहद ख़राब हैं, हम मर जाएँगे."

कंपकपाती आवाज़ में व्हाट्सएप पर ये संदेश सऊदी अरब में फँसे 24 भारतीय मज़दूरों में से एक, अरुण कुमार सिंह ने भेजा है.

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अरुण और उनके साथियों के साथ भी वही हुआ जो खाड़ी के देशों में मज़दूरी के लिए जाने वालों के साथ अक्सर होता है; दलाल का झाँसा, वादे से कम तनख्वाह, मालिक के कब्ज़े में पासपोर्ट, कुछ वक़्त बाद नौकरी और वीज़ा दोनों ख़त्म, न काम कर पाते हैं और न ही वतन लौट पाते हैं.

लंबी अदालती कार्रवाई

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Image caption मज़दूरों का कहना है कि निर्माण कार्य करने वाली कंपनी ने शुरू में तो सैलरी दी लेकिन फिर रोक दी.

सऊदी अरब में फँसे उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के इन लोगों का मुकदमा सऊदी श्रम अदालत में फ़रवरी से चल रहा है.

अरुण कहते हैं, "कई बार तारीख़ पर जा चुके हैं. अदालत भी सऊदी मालिक की ही सुनती है. हाँ, भारतीय दूतावास के कर्मचारी ज़रूर कुछ मदद कर रहे हैं."

बिहार से शादी के फ़ौरन बाद सऊदी अरब आए 26 वर्षीय मोहम्मद अली अंसारी कहते हैं, "हम घरवालों से अपनी परेशानी बयान तक नहीं कर सकते, वे और ज़्यादा परेशान हो जाएंगे. सिर्फ़ ख़ुदा ही हमारे दिलों का हाल जानता है."

मदद की गुहार

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Image caption भारत में श्रमिकों के परिजनों ने नेताओं से भी हस्तक्षेप की ग़ुहार लगाई है.

एक और कामगार मोहम्मद आरिफ़ अंसारी का पैर गिरने की वजह से टूट गया है और कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है.

जबकि रोजिद मियां को दिल का दौरा तक पड़ चुका है.

रियाद में भारतीय दूतावास के श्रमिक मामलों से जुड़े अधिकारी राजेंद्रन ने बीबीसी को बताया, "भारत सरकार सऊदी सरकार से बात करके उन्हें वापस भिजवाने के प्रयास कर रही है. हमारे सामने ऐसे मामले बड़ी संख्या में आते हैं."

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Image caption समाजसेवी प्रेम भंडारी कहते हैं कि मध्य-पूर्व में बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

न्यूयॉर्क में रहने वाले समाजसेवी प्रेम भंडारी इन मज़दूरों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "ग़रीब तबके के लोग क़बूतरबाज़ों के झांसे में आ जाते हैं. मध्य-पूर्व में उन्हें बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है."

भारतीय दूतावास के ज़रिए इन लोगों की मदद कर रहे भंडारी कहते हैं, "मैं कोशिश करता हूँ कि हर रोज़ उनसे बात करूँ, बुरी तरह फँसे होने के कारण ये श्रमिक अवसाद में हैं और उन्हें संबल की ज़रूरत है. हमारा भरोसा उनकी उम्मीद ज़िंदा रखता है."

इन श्रमिकों के मामले की अगली सुनवाई अब छह जून को है. लेकिन उन्हें राहत की उम्मीद कम ही है.

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Image caption इन मज़दूरों का कहना है कि वे अमानवीय हालात में रहने के लिए मजबूर हैं.

अली कहते हैं, "तारीख़ पर तारीख़ पड़ती रहेगी, कुछ नहीं होगा. बस जैसे भी हो हमें घर बुला लीजिए. सरकार से कहिए हमारी मदद करे."

सऊदी अरब और खाड़ी के दूसरे देशों में इसी तरह की स्थिति में बड़ी संख्या में मज़दूर फँसे हुए हैं लेकिन हर साल दीनार-दिरहम कमाने के सपनों के साथ हज़ारों लोगों का जाना भी जारी है.

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