अमरीका में आ गई 'गांजा क्रांति'!

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कुछ साल पहले की बात है. अमरीका में आर्थिक मंदी अपने चरम पर थी और हर रिपोर्टर की तरह मैं भी विद्वानों के दरवाज़े खटखटा रहा था क्या, क्यों, कैसे, कहां, कब जैसे सवालों के साथ.

उनमें से एक साहब ने कहा था कि अमरीका को इंटरनेट क्रांति जैसी किसी क्रांति की ज़रूरत पड़ेगी इस मंदी से उबरने के लिए.

पता नहीं क्यों लेकिन मुझे लग रहा है कि वो क्रांति आ गई है. हरे-हरे डॉलरों के एक के ऊपर एक चढ़े हुए बंडलों की तस्वीरें, टीवी चैनलों पर कभी कोई डॉक्यूमेंट्री तो अख़बारों में किसी नए रिसर्च की दास्तान, आई- फ़ोन और ऐंड्रायड दोनों ही के लिए इस चीज़ से जुड़े कम से कम पंद्रह-बीस ऐप, और तो और एक ख़ास दिन भी मनाया जा रहा है इस चीज़ के लिए यानि गांजा दिवस.

गांजा क्रांति

गांजे का बिज़नेस ऐसा चल रहा है कि मुझे कोई शक नहीं है कि अमरीका में गांजा क्रांति आ चुकी है.

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इंटरनेट की तरह आम लोगों की जि़ंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है गांजा. एक छोटी सी मिसाल देता हूं आपको.

आमतौर पर आपने देखा होगा, अख़बारों में एक मोहतरमा होती हैं जिनके पास दुनिया के सभी सवालों का जवाब होता है. दिल्ली से ट्रेन निकलते ही गंदी-बदबूदार दीवारों पर जिन चीजों के शर्तिया इलाज़ की गारंटी का इश्तहार लगा होता है उनके साथ-साथ नौकरी, सास-बहू के रिश्ते, प्यार में धोखा, बदतमीज़ बॉस जैसे हर सवाल का इनके पास जवाब होता है.

तो ऐसे ही एक कॉलम में एक साहब ने अपनी परेशानी लिखी जो उन्हीं के शब्दों में बयान करता हूं: "मेरा बेटा कुछ ही महीनों में कॉलेज शुरू करने वाला है. ज़ाहिर है वहां पार्टियां होंगी, शराब भी होगी, गांजा भी होगा. अगर मुझसे पूछता है तो क्या मैं कहूं कि अगर पीना ही है तो शराब नहीं गांजा पिए?"

जवाब का निचोड़ तो यही था कि सभी रिसर्च यही कह रहे हैं कि गांजा शराब के मुक़ाबले कम नुकसानदेह है. लेकिन गौर करनेवाली बात ये है कि अब गांजा नीची नज़र से नहीं देखा जा रहा, उसे शराब के बराबर का दर्जा मिल चुका है और कुछ ही दिनों में शायद उससे ऊपर चला जाए.

गांजे का बिज़नेस

एमबीए और कंप्यूटर इंस्टीट्यूट्स की तरह गांजा करियर इंस्टीट्यूट की शुरूआत भी हो चुकी है. इसमें बताया जाता है कि गांजे का बिज़नेस कैसे करें, उसकी ब्रांडिंग कैसे हो, ग्राहक आपके पास बार-बार लौटे इसके लिए क्या करें, सोशल मीडिया का इस्तेमाल कैसे करें वगैरह-वगैरह.

आपको ये तो नहीं लग रहा न कि मैंने भी कश लगा लिया है और हांके जा रहा हूं. यकीन न हो तो बस cannabiscareerinstitute.com पर क्लिक करके देख लें. न्यूयॉर्क में तो बाकायदा एक गांजा वर्ल्ड कांग्रेस हो रहा है जिसका नारा है Cannabis Means Business यानि गांजे का मतलब व्यापार. जब इंटरनेट की शुरूआत हुई थी तो आपको याद होगा ऐसे कांफ्रेंस अक्सर ही होते थे और आज तक जारी हैं.

एक टीवी चैनल पर एक डॉक्टर साहब जो जाने-माने पत्रकार भी हैं उन्होंने गांजे के हक में पूरी मुहिम छेड़ रखी है. गांजे के लिए जिन ऐप्स की बात मैं कर रहा था, उनमें घर की बॉल्कनी में गांजा उगाने, उससे जुड़े क़ानून, चिलम के अलग-अलग स्टाइल सबकी जानकारी है.

गांजे से जुड़े पकवानों की लिस्ट बढ़ती जा रही है. क्या पता कुछ दिनों में ड्यूटी फ़्री दुकानों में भी मिलने लगे.

शौक

वाशिंगटन डीसी में शौक के लिए गांजा बेचना ग़ैरक़ानूनी है मगर आप अपने इस्तेमाल के लिए दो-चार पौधे उगा सकते हैं. लेकिन गांजा-प्रेमी अगर उतना इंतज़ार करेगा तो फिर भला प्रेमी कैसा? अब तो बस अपने फ़ोन पर एक टेक्स्ट कीजिए और गांजे का पैकेट आपके घर डिलीवर हो जाएगा.

ताज्जुब तो मुझे इस बात का है कि इस क्रांति को यहां आने में इतना वक्त क्यों लगा. कहते हैं कि जॉर्ज वाशिंगटन जिन्होंने इस देश की नींव रखी वो भी इसका शौक रखते थे और राष्ट्रपति ओबामा अपने "चूम गैंग" (हवाई, जहां वो पले-बढ़े, वहां की स्थानीय भाषा में गांजा पीनेवालों का गैंग) का ज़िक्र अपनी किताब में भी कर चुके हैं,.

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जॉन एफ़ केनेडी और जॉर्ज डब्लयू बुश भी इसके शौकीन थे. हां, बिल क्लिंटन ने बस इतना कहा था कि "मैंने कश ज़रूर लिया था, लेकिन 'इनहेल' नहीं किया यानि धुंआ अंदर नहीं ले गया." अब क्लिंटन साहब की बात निराली होती है ये तो आप जानते ही हैं. शब्दों के साथ कैसे खेलना है वो तो हम मोनिका लेविंस्की प्रकरण के दौरान देख ही चुके हैं.

जब अमरीका में इंटरनेट क्रांति आई तो, भारत को काफ़ी फ़ायदा हुआ था. गली-गली में कंप्यूटर क्लासेज़ खुल गए, मोदीजी के राज में शायद गांवों में भी खुल जाएं.

वैसे इन दिनों मेक इन इंडिया का बोलबाला है य़ानि भारत में बनाओ विदेश में बेचो. इस नई गांजा क्रांति का फ़ायदा कैसे उठाना है, ये मैं आप पर छोड़ देता हूं!

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