'मेरी आँखों के सामने मेरी बेटी को गोली मारी'

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Image caption सबीन महमूद(दाएँ) अपनी माँ मेहनाज़ महमूद के साथ.

पाकिस्तान की सबीन महमूद अभिव्यक्ति की आज़ादी की पुरजोर समर्थक थीं. वो कराची में एक कैफ़े चलाती थीं जहाँ समाज और राजनीति से जुड़े तमाम मसलों पर खुलकर बहस हो सके.

क़रीब छह हफ़्ते पहले एक बंदूक़धारी ने उनकी उस वक़्त हत्या कर दी जब वो अपनी माँ के साथ कैफ़े से कार में घर वापस जा रहीं थीं.

जब सबीन को गोली मारी गई तो उनकी माँ मेहनाज़ बगल की सीट पर ही बैठी थीं. उनकी आँखों के सामने चंद पलों में उनकी बेटी मौत के आगोश में समा गई.

मेहनाज़ ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में उस दर्दनाक हादसे और अपनी बेटी सबीन की शख़्सियत के बारे में अपनी यादें साझा कीं.

पढ़ें मेहनाज़ की यादें

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मैं पिछले कुछ दिनों से कैफ़े नहीं जा रही थी लेकिन न जाने क्यों उस दिन मैं उसके साथ रहना चाहती थी.

उस दिन मुझमें एक अहसास तारी था कि 'मुझे आज वहां जाना है, आज मुझे उसके साथ रहना है ताकि मैं जता सकूँ कि मैं उसके साथ हूँ.'

वो मंजर दिन-रात मेरे ज़हन में छाया रहता है...वो घूरती हुई निगाहें और अचानक से बंदूक का सामने आना.

मैंने तब सबीन से कहा था, "जरा देखो तो, ये लोग आखिर चाहते क्या हैं?"

मुझे लगा कि ये लूटपाट करने वाले लोग हैं. मुझे लगा वो हमारे फ़ोन और हैंडबैग वगैरह छीनना चाहते हैं क्योंकि कराची में ऐसी घटनाएं बहुत आम हैं.

तभी मैंने अचानक गोली चलने की आवाज़ सुनी. कार का शीशा टूट चुका था, सबीन बेजान होकर गिर पड़ी और वो लोग देखते ही देखते गायब हो गए.

मुझे दो गोलियाँ लगीं. उनमें से एक गोली तो सबीन के बदन को छेदते हुए मुझे लगी थी क्योंकि उन्होंने उसे बहुत ही क़रीब से गोली मारी थी.

अचानक हमला

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उस वक़्त हम लोग रेड लाइट के कारण ट्रैफ़िक सिग्नल पर रुके हुए थे. हमारे चारों तरफ़ लोग मौजूद थे. उन्हीं के बीच से ये मोटरसाइकिल हमारी कार से बिल्कुल सटते हुए सबीन की साइड में आई.

उन्होंने आते ही उसपर गोली चला दी. एक गोली उसकी देह से होते हुए मेरी बाँह में लगी और उसे चीरते हुए बाहर निकल गई. उसे ऐसी पाँच गोलियां लगीं .

मुझे जो एक और गोली लगी पुलिस के मुताबिक वो कार के किसी हिस्से से टकराने के बाद मेरी पीठ में लगी थी. शायद मैं उसे देखने के लिए आगे की तरफ़ झुकी रही होऊँगी.

मैं उससे कह रही थी, "सबीन, सुन रही हो? कुछ बोलो, हम तुम्हें तुरंत अस्पताल लेकर चलेंगे."

हमारा अस्थाई ड्राइवर कार की पिछली सीट पर बैठा था. वो तुरंत आगे आया और गाड़ी को क़रीब के अस्पताल लेकर भागा.

अस्पताल में मेरा प्राथमिक इलाज किया गया. उसके बाद मुझे दूसरे अस्पताल भेज दिया गया. सबीन को कहीं और ले जाया गया.

दरअसल उसे मुर्दाघर ले जाया गया था और मुझे एक दूसरे बड़े अस्पताल में.

सोशल मीडिया पर समर्थन

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इस हादसे की ख़बर तुरंत ही टीवी चैनलों पर आ गई इसलिए काफ़ी लोग इकट्ठा हो गए थे. सोशल मीडिया पर भी जिसे ये ख़बर मिली उसने दूसरों के साथ इसे साझा किया.

सबीन के मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर उसके समर्थन की बाढ़ आ गई. मुझे ठीक से नहीं पता, लेकिन लोग कह रहे थे उसके जनाजे में दो हज़ार से ज़्यादा लोग थे. न जाने कितने लोग उस दिन मुझसे गले लगे.

लोगों के इस व्यवहार से मैं अभिभूत हूँ. मेरी लिए यह अब भी कल्पना से परे है क्योंकि मेरे लिए वो एक सामाजिक व्यक्ति नहीं थी, वो मेरा एक हिस्सा थी, मेरा परिवार थी.

वो मेरी तो बेटी थी लेकिन उसके लिए मातम बना रहे इतने सारे लोग कौन हैं? ये विस्मित कर देने वाला अनुभव है, इसका अनुभव बयान से परे है, मैं इसका तसव्वुर भी नहीं कर सकती.

सबीन का अंतिम संस्कार

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सबीन के बड़े होने के बाद मैं अकेली माँ के रूप में उसके साथ थी. सुनने में ये अजीब लगेगा, लेकिन जब वो क़रीब 19 साल की थी तब उसने ख़ुद मेरे तलाक की पहल की थी.

उस समय वो लाहौर में कॉलेज में पढ़ती थी. एक बार जब वो घर आई तो उसने कहा, "देखो, अगर तुम मेरे लिए इस शादी को सह रही हो तो प्लीज ऐसा मत करो."

फिर वो ख़ुद वकील के पास गई और तलाक की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली. उसके बाद हम क़ानूनी सलाहकार से मिले और इसके बारे में बात की.

उसके बाद उसने सारी काग़ज़ी कार्रवाई पूरी करवाई और उसे लेकर अपने अब्बा के पास गई और उनसे उनपर दस्तखत करवाए.

वो सबसे अलहदा थी

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आज लोग उसे 'मानवाधिकार कार्यकर्ता' और 'कला संरक्षक' कहते हैं. जब मैं ये सब सुनती हूँ तो मुझे लगता है, नहीं वो उन मायनों में एक्टिविस्ट नहीं थी, वो तो बस निष्पक्षता और न्याय की बड़ी पैरोकार भर थी.

पिछले कई साल में मैंने उससे कई बार कहा था, "सबीन, एक दिन तुम्हें गोली खानी पड़ेगी. लेकिन परेशानी की कोई बात नहीं, जो तुम करना चाहती हो इसे उसकी राह में रोड़ा मत बनने दो. जो भी हो मुझे उसका सामना करना होगा."

और अब यही हो रहा है, जो हो रहा है मुझे उसका सामना करना पड़ रहा है.

'गरिमामय मौत'

सबीन को पहले भी चेतावनियाँ और धमकियाँ मिली थीं. उसे पता था कि वो जो कार्यक्रम 'अनसाइलेंसिंग बलूचिस्तान'(जिसके बाद उसे गोली मारी गई) कर रही है उसके ख़तरनाक नतीजे हो सकते हैं. बलूचिस्तान में कई एक्टिविस्ट लंबे समय से लापता हैं और उनके परिवार बिखर चुके हैं और इस बारे में कोई बात नहीं कर रहा है.

प्रगतिशील समझे जाने वाले लाहौर विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट स्टडी विभाग में इसपर परिचर्चा होने वाली थी, लेकिन उसे आख़िरी वक़्त में रद्द कर दिया गया.

किसी ने उसे फ़ोन किया और पूछा कि क्या ये परिचर्चा उसके कैफ़े में हो सकती है. वो मान गई. उसे लगा, "ये कहना ही होगा कि ये सही नहीं है."

शुक्र है कि उस दिन मैं उसके साथ थी. उसकी ड्राइवर की सीट के ठीक बगल वाली सीट पर. उसकी बस कुछ ही पलों में मौत हो गई. पुलिस का कहना है कि चंद सेकंडों में उसकी जान चली गई, चुपचाप, बग़ैर किसी हिचकी, चीख, कराह या आह के...

उसे तड़पना नहीं पड़ा. उसके चेहरे पर ख़ौफ़ का कोई निशान नहीं था. वो बहुत शांत लग रही थी. उसकी मृत्यु भी बहुत गरिमामय थी. वो अंत तक गिरी नहीं, बस उसका सिर जरा सा झुक गया और बस...

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