मोदी के लिए बांग्लादेश क्यों 'सबसे अहम पड़ोसी'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ढाका दौरे से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बांग्लादेश को भारत का ‘सबसे अहम पड़ोसी’ बताया है.

लगता है डोभाल ने पाँच साल पहले भारत के दो वरिष्ठ राजनयिक दंपति राजीव और वीना सिकरी के दिए गए ऐसे ही बयान का अनुसरण किया है.

भारत की ‘पूर्व की ओर देखो’ नीति के लिए बांग्लादेश बेहद अहम है और मोदी के एजेंडे में ये नीति शामिल है.

लेकिन बांग्लादेश के नज़दीक आने से पहले भारत को अपने दूरदराज के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ना होगा.

रिश्तों में गर्मजोशी

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बांग्लादेश में मोदी का ज़ोरदार स्वागत हुआ, उन्हें 19 तोपों की सलामी दी गई. इस दौरे में बांग्लादेश से सड़क संपर्क बढ़ाने के कई समझौतों पर मुहर लगेगी और कई समझौते तुरंत प्रभाव से लागू हो जाएंगे.

मोदी ढाका से कोलकाता के बीच चलने वाली बस सेवा को हरी झंडी दिखाएंगे. साथ ही दोनों देशों के बीच रेल और जल मार्ग संपर्क बढ़ाने के कई प्रस्तावों पर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से बातचीत भी करेंगे.

ढाका होते हुए कोलकाता-अगरतला के अलावा दूसरी बस सेवा शिलॉन्ग होते हुए ढाका-गुवाहाटी के लिए है.

अखुरा-अगरतला रेल लिंक पर भी बातचीत होगी और जो बांग्लादेश के ज़रिए कोलकाता को पूर्वोत्तर से जोड़ेगा.

समुद्री मार्ग के लिए क़रार लगभग तैयार है इससे द्विपक्षीय व्यापार में आने वाले ख़र्च में भारी कमी आएगी.

संपर्क बढ़ेगा

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मोटर वाहन समझौता अमल में आने के बाद मोदी पूर्वी दक्षिण एशिया में मुक्त आवागमन की अपनी महत्वाकांक्षी योजना बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल (बीबीआईएन) पर आगे बढ़ सकते हैं.

मोदी के लिए ये योजना इसलिए भी अहम है क्योंकि पश्चिम में पाकिस्तान ने इस राह में रोड़ा अड़ाया हुआ है.

हसीना का ज़ोर भारत की सुरक्षा और संपर्क चिंताओं को दूर करना रहा है, इसलिए बांग्लादेश सीमा से सटे पूर्वोत्तर के सात राज्यों को जोड़ने वाले 21 किलोमीटर के इस क्षेत्र से चिंतामुक्त होने का भारत के पास पहला मौक़ा है.

लेकिन भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर नज़र रखने वाले जानकारों ने कहना शुरू कर दिया है कि हसीना ने जो कुछ किया, भारत के पास उसे चुकाने का ये मौक़ा है.

ढाका में भारत के उच्चायुक्त पंकज सरन ने दो महीने पहले मोदी से आग्रह किया था, “सर, खाली हाथ मत आना.”

इनक्लेव की अदला-बदली के समझौते से प्रधानमंत्री मोदी, बांग्लादेश में इंदिरा गांधी के बाद भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री बन जाएंगे.

इंदिरा गांधी और मुजीबुर्रहमान के बीच 1974 में समझौता तो हुआ था, लेकिन घरेलू राजनीतिक घमासान के चलते इसे लागू नहीं किया जा सका था और इस बार इसे लागू किया जा रहा है.

नदी जल बंटवारा

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तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में उनके दौरे की उपलब्धियों पर असर पड़ेगा.

भारत की कई नदियां बांग्लादेश में जाती हैं और बांग्लादेश मुख्य रूप से अब भी खेती पर निर्भर है जहाँ किसान नदियों के पानी या बारिश पर निर्भर हैं.

इसलिए ऐसी नदियों पर बांग्लादेश का अपने हिस्से का पानी मांगना वैध है और भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता.

क्या होगा अगर भविष्य में चीन ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोक दे- कई लोगों को आशंका है कि अपने जल संसाधन ख़त्म होने की स्थिति में चीन ऐसा कर सकता है.

इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अपनी चिंताएं हो सकती हैं, लेकिन मोदी को उन्हें सिंचाई के कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स और सिक्किम से तीस्ता का पानी देने जैसे रास्ते अपनाकर मनाना चाहिए.

भारत को तीस्ता और 53 अन्य साझी नदियों पर सहमति बनानी ही चाहिए वरना वह शेख हसीना जैसी भरोसेमंद सहयोगी को खो देगा. वैसे भी घरेलू राजनीति में शेख हसीना पर ‘भारत का पुतला’ होने जैसे आरोप लगते रहे हैं.

भारत बांग्लादेश के साथ समुद्री सीमा के विवाद पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के फ़ैसले को मंज़ूर कर चुका है. ये फ़ैसला बांग्लादेश के हक में गया था. इसके बाद इस विशेष आर्थिक क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट्स शुरू करने की भारत की संभावनाओं को गति मिली है.

मोदी करेंगे मदद का ऐलान!

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मोदी अगर इस दौरे में बांग्लादेश को कुछ कर्ज़ देने की घोषणा करते हैं तो वहां के बुनियादी ढांचे के विकास में भारत की मौजूदगी की कमी की भरपाई कर लेंगे.

भारत पदमा नदी पर 6.15 किलोमीटर लंबे रेल पुल के लिए या सोनादिया समुद्र पोर्ट के लिए सहयोग की घोषणा कर सकता है.

दूसरी ओर, बांग्लादेश को भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में स्थिरता और शांति की गारंटी देनी होगी.

कई लोगों को शायद ये अहसास नहीं है कि 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करने के लिए भारतीय सेना के दखल की एक अहम वजह ये भी थी.

हसीना देंगी सुरक्षा की गारंटी?

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रातों-रात पूर्वी पाकिस्तान में स्थित पूर्वोत्तर राज्यों के विद्रोहियों के शिविर बर्बाद हो गए. लेकिन सेना के तख्तापलट के बाद हालात एक बार फिर बदल गए और बांग्लादेश की सैन्य सरकार ने पूर्वोत्तर के विद्रोहियों को फिर से मदद देनी शुरू कर दी.

लेकिन अब शेख मुजीब की बेटी शेख हसीना सत्ता में हैं और बांग्लादेश से संचालित सभी चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़े हुए हैं.

2004 के चटगांव हथियार मामले में बांग्लादेश के पूर्व खुफिया प्रमुख और डीजीएफ़आई को मौत की सजा दी गई. इसके उलट 2008 मुंबई हमलों की कथित साजिश रचने वाले पाकिस्तान में नायकों की तरह सीना फुलाए घूम रहे हैं.

व्यापार पर फोकस

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भारत ने बांग्लादेश से व्यापार बढ़ाने के कई उपाय किए हैं, लेकिन द्विपक्षीय व्यापार का अंतर काफ़ी अधिक है. अगर भारत चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार में भारी फासले की शिकायत करता है तो उसे बांग्लादेश के लिए भी यही फार्मूला अपनाना चाहिए.

हाल के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 में भारत का बांग्लादेश को निर्यात 4.7 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि बांग्लादेश से भारत को निर्यात में 8.2 प्रतिशत की गिरावट आई है.

इसके अलावा बांग्लादेश में भारत के प्रत्यक्ष निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता है.

भारत की निजी कंपनियों को बांग्लादेश के प्रति अपने व्यवहार में भी बदलाव लाना चाहिए. टाटा ने बांग्लादेश में अपना प्रोजेक्ट लगाने के लिए 20 साल तक प्राकृतिक गैस की क़ीमतें नहीं बढ़ाने की गारंटी मांगी थी, ऐसा नहीं होने पर प्रोजेक्ट वहाँ से हटा लिया.

इसके जवाब में बांग्लादेश निवेश बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने टाटा के एक अधिकारी से कहा था, “श्रीमान, क्या आप दो साल तक अपने उत्पाद की कीमतें नहीं बढ़ाने की गारंटी दे सकते हैं.”

भारत और बांग्लादेश का इतिहास साझा रहा है, लेकिन सिर्फ इतिहास से ही रिश्ते मज़बूत नहीं हो सकते. दोनों देशों को द्विपक्षीय मामलों पर एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझना होगा.

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