जिन्हें 'सरकार का सुनना' भी नहीं मंज़ूर

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पूरी दुनिया में लोग तरसते हैं कि सरकार उनकी सुने लेकिन कोई सुनने वाला नहीं होता.

यहां अमरीका में सरकार पिछले चौदह साल से जनता को सुन रही थी, बेहद क़रीब से, उनकी इश्कबाज़ी से लेकर रोटी, कपड़ा, मकान की जद्दोजहद सबके बारे में सुन रही थी.

लेकिन ये जो कुछ नाशुक्रे लिबरल टाइप के लोग हैं, उनसे जनता की ये ख़ुशी देखी नहीं गई.

दो सालों से, जब से एनएसए के कांट्रैक्टर एडवर्ड स्नोडेन ने पूरी दुनिया को ये बात बता दी कि अमरीकी सरकार अपने लोगों की सुनती है, तब से ओबामा के पीछे पड़े हुए थे कि सुनने-पढ़ने की आदत छोड़ दो.

बहकावे में ओबामा

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बेचारे ओबामा भी बहकावे में आ गए. लेकिन वो कुछ करते उससे पहले ही कांग्रेस ने पिछले रविवार को बरसों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने से इंकार कर दिया.

ज़रा सोचिए क्या गुज़री होगी अमरीकी जनता पर, बिल्कुल बेसहारा महसूस कर रही थी और उनसे भी बुरा हाल था बेचारे एनएसए के मुलाज़िमों का जो दिन रात कभी लोगों के फ़ोन तो कभी ईमेल पर नज़र रख रहे होते थे.

एक साहब से इन लोगों की मायूसी देखी नहीं गई तो उन्होंने सलाह दी कि लोगों के फ़ोन और ईमेल पर नज़र नहीं रख पाते तो वक़्त गुज़ारने के लिए उनके फ़ेसबुक अपडेट्स देखने शुरू कर दो, कुछ तो राहत मिलेगी.

वो तो भला हो कांग्रेस का कि उन्होंने एक नई परंपरा शुरू करने की मंज़ूरी दे दी.

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इसमें काफ़ी कुछ पहले ही जैसा है सिर्फ़ जनता और एनएसए के बीच एक दीवार खड़ी कर दी गई और जब भी एनएसए को जनता की ज़िंदगी सुनने-पढ़ने का दिल करेगा वो इस दीवार को लांघ कर कर ऐसा कर सकती है. यानि अब सारे फ़ोन और ईमेल रेकार्डस टेलीफ़ोन कंपनियों के पास रहेंगे और एनएसए अदालत की मंज़ूरी लेकर उन्हें सुन-पढ़ सकेगी.

साकार ऑर्वेल की दुनिया

जनता की जान में जान आई है. एक सर्वे में 60 प्रतिशत से ज़्यादा अमरीकियों ने कहा है कि उन्हें इस बात से कोई एतराज़ नहीं है कि सरकार उनकी ज़िंदगी के इतने क़रीब रहती है.

उनका कहना है कि अब जब इस्लामिक स्टेट का ख़तरा इस कदर मंडरा रहा है तो ऐसे में कांग्रेस को एनएसए और जनता के बीच दूरी नहीं बढ़ानी चाहिए थी. जनता हो तो ऐसी हो!

आप लोगों ने जॉर्ज आरवेल की किताब 1984 अगर नहीं पढ़ी हो तो समय निकालकर ज़रूर पढ़िएगा. उन्होंने पचास-पचपन साल पहले एक ऐसे ही समाज की कल्पना की थी और उसे सच होता देख उन्हें कितनी ख़ुशी होती.

उन्होंने आपसी बातचीत में कम से कम शब्दों के इस्तेमाल की बात की थी, लोग अब सिर्फ़ 140 कैरेक्टर्स में अपनी बात कहने की आदत डाल चुके हैं.

ऑफ़िस का देवदास वहां काम करनवाली पारो को हर रात फ़ोन करता है, मियां चटोरे गर्मियों की छुट्टियों में आम खाने पाकिस्तान जा रहे हैं, या फिर मोटू पहलवान कितनी देर टीवी के सामने गुज़ारता है और कौन-कौन से चैनल देखता है -- ऑर्वेल की किताब में ये सब बातें सरकार को पता होती थीं और आज अमरीका भी अपनी तरक्की की बदौलत उस मुक़ाम पर पहुंच गया है.

अच्छे दिन

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वैसे भी सरकार आपकी भलाई के लिए आपकी बात सुनती है. अब देखिए पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ने ताल ठोक कर कहा है कि पिछले महीने उन्होंने तकरीबन सात हज़ार लोगों के टेलीफ़ोन टैप किए.

वैसे सतरह-अठारह करोड़ की आबादी वाले मुल्क में सिर्फ़ सात हज़ार की सुनी उन्होंने? यही वजह है मुल्क की तरक्की वैसी नहीं हो पा रही है जैसी होनी चाहिए. अभी और मेहनत करने की ज़रूरत है.

वैसे भी भारत और पाकिस्तान में लोगों के पास नौकरी हो या ना हो, इन दिनों मोबाइल फ़ोन ज़रूर होता है. बस सरकार को सुनने की आदत डालने की ज़रूरत है, सबके अच्छे दिन आ जाएंगे.

थोड़ी ट्रेनिंग की ज़रूरत हो तो मंत्रियों और मुलाज़िमों को अमरीका भेज दें. वैसे भी बेचारे इस मौसम में किसी न किसी बहाने अमरीका आने के जुगाड़ में लगे ही रहते हैं!

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