15 साल की नाबालिग उम्र में सज़ा, फांसी अब

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पाकिस्तान ने उस व्यक्ति को फांसी की सज़ा दे दी है जिसे 15 साल की नाबालिग उम्र में फांसी की सज़ा सुनाई गई थी.

अफ़ताब बहादुर नाम के इस शख़्स को लाहौर की एक जेल में तड़के 10 जून को फांसी दे दी गई.

अफ़ताब बहादुर को साल 1992 में दोहरे हत्याकांड के आरोप में दोषी पाया गया था.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने फांसी की निंदा की है. उन्होंने इसे 'शर्मनाक' बताया है.

मानवाधिकार मामलों से जुड़ी संस्था रिप्रीव के मुताबिक आफ़ताब को जिन लोगों की गवाही के आधार पर दोषी ठहराया गया था जिन्होंने बाद में अपने बयान वापस ले लिए थे.

15 साल की उम्र में सुनाई थी सज़ा

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जिस समय आफ़ताब को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी उस समय 15 साल की उम्र में फांसी की सज़ा दी जा सकती थी.

लेकिन बाद में साल 2000 में यह उम्र सीमा बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई थी.

ज़िंदगी और मौत के बीच

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Image caption आफ़ताब बहादुर ने अपनी बनाई पेंटिंग में जेल में बिताए दिनों को दर्शाया है.

मौत से पहले रिप्रीव संस्था के लिए एक लेख में आफ़ताब ने लिखा था, "मुझे अभी अभी ब्लैक वारंट मिला है. इसके मुताबिक मुझे 10 जून को फाँसी की सज़ा दी जाएगी. मैं बेकसूर हूँ. पर मुझे नहीं पता कि इससे कोई फ़र्क पड़ेगा. इससे ज़्यादा खौफ़नाक और क्या हो सकता है कि आपको बताया जाए कि आप मरने वाले हो और फिर जेल में उस पल का इंतज़ार करते बैठे रहो."

उन्होंने लिखा था, "जब से मैं 15 साल का था तब से मैं ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहा हूँ. मैं उम्मीद करता हूँ कि मैं बुधवार को मरूँगा नहीं. मेरे पास पैसे नहीं है. मुझे सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा है और वकीलों पर. मैने उम्मीद नहीं छोड़ी है हालांकि अंधेरा बहुत गहरा है."

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