क्यों जर्मनी भाग रहे हैं अमरीकी विद्यार्थी

ग्राफ़, जर्मनी में अमरीकी विद्यार्थी इमेज कॉपीरइट

अमरीका में जहां कॉलेज की पढ़ाई रिकॉर्ड महंगी है वहीं जर्मनी में जर्मन और विदेशी छात्रों सबके लिए ट्यूशन फ़ीस ख़त्म की जा चुकी है.

बड़ी संख्या में अमरीकी छात्र इसका फ़ायदा उठा रहे हैं और डिग्री हासिल करने में लाखों रुपए बचा रहे हैं.

जर्मन विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले अमरीकी छात्रों की संख्या पिछले तीन साल के मुकाबले 20% बढ़कर 4,600 हो गई है. दूसरी तरफ़ अमरीका में कुल शिक्षा ऋण बढ़कर 543.74 खरब रुपए से ज़्यादा हो गया है.

जर्मनी-अमरीका में फ़र्क

यूरोप के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक म्यूनिख टेक्निकल यूनिवर्सिटी में भौतिकी स्नातक पढ़ रहे एक अमरीकी छात्र को हर सत्र के लिए सिर्फ़ करीब 7,966 रुपए देने पड़ते हैं.

इसमें सार्वजनिक परिवहन का टिकट भी शामिल है जिससे वह पूरे म्यूनिख में यात्रा कर सकता है.

इमेज कॉपीरइट Getty

जर्मनी में एक विद्यार्थी का स्वास्थ्य बीमा करीब 8,741 रुपए प्रति माह पड़ता है जो अमरीका के मुकाबले बेहद सस्ता है.

पढ़ाई के साथ ही अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा, किराया और अन्य ज़रूरतें मिलाकर जर्मनी में रहने का खर्च करीब 3.83 लाख से 4.47 लाख रुपए सालाना आता है.

अमरीका में साउथ कैरोलाइना विश्वविद्यालय में इतने पैसे से ट्यूशन फ़ीस भी नहीं दी जा सकती. स्कॉलरशिप के साथ ही यह 6.39 लाख रुपए से ज़्यादा पड़ेगी.

'विद्यार्थी संघ के लिए फ़ीस'

अमरीका से पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई करने के लिए जर्मनी आने वाले एक विद्यार्थी को कॉटबस शहर में रहने, परिवहन और स्वास्थ्य पर सिर्फ़ करीब 36,456 रुपए प्रतिमाह ख़र्च करने पड़ते हैं.

अगर दाद (डीएएडी- जर्मन अकैडमिक एक्सचेंज काउंसिल) की स्कॉलरशिप, जो 52,122 रुपए से ज़्यादा है, मिल जाए तो सारे खर्च उसी में आराम से पूरे हो जाते हैं.

साल 2014-15 के शैक्षिक सत्र में अमरीका के निजी विश्वविद्यालयों ने हर विद्यार्थी से औसतन 19.82 लाख रुपए से ज़्यादा पैसा ट्यूशन और फ़ीस के रूप में लिया. ज़्यादातर स्कूल तो 31.97 लाख रुपए से भी ज़्यादा ले रहे थे.

कॉलेज बोर्ड के अनुसार सरकारी विश्वविद्यालय अमरीकी विद्यार्थियों से 5.75 लाख रुपए से ज़्यादा और विदेशी विद्यार्थियों से 14.70 लाख रुपए से ज़्यादा लेते हैं.

जर्मनी में पिछले दशक में करीब 35,904 रुपए से 71,802 रुपए ट्यूशन फ़ीस ली जाती थी. लेकिन लोअर सेक्सोनी वह आखिरी राज्य था जहां 2014 तक इसे धीरे-धीरे ख़त्म कर दिया गया.

विद्यार्थी हर सत्र में विश्वविद्यालय को एक फ़ीस, जिसे 'सेमेस्टर फ़ीस' कहा जाता है देते हैं, जिसका इस्तेमाल विद्यार्थी संघ और अन्य गतिविधियों में किया जाता है.

अक्सर इसमें सार्वजनिक परिवहन का टिकट भी शामिल होता है और यह बमुश्किल ही 10,771 रुपए से ज़्यादा होती है.

'बोलोग्ना संधि'

कॉटबस में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में 50 से ज़्यादा देशों के विद्यार्थी हैं लेकिन इसमें पढ़ाई पूरी तरह अंग्रेज़ी में होती है. दरअसल जर्मन विश्वविद्यालयों में कई विषयों में 1,150 कोर्स पूरी तरह अंग्रेज़ी में पढ़ाने लगे हैं.

साल 1999 में यूरोपीय यूनियन के सदस्यों ने बोलोग्ना संधि पर हस्ताक्षर किए थे जिसके हिसाब से पूरे यूरोप में एकसमान स्नातक/परास्नातक डिग्री का तंत्र स्थापित किया जाना था.

अब पुर्तगाल से स्वीडन तक के हज़ारों विद्यार्थी आसानी से विदेश जाते हैं, पढ़ते हैं, डिग्रियां हासिल करते हैं और इन सबके लिए अंग्रेज़ी एक आम भाषा बन रही है.

म्यूनिख की टेक्निकल यूनिवर्सिटी में 20 फ़ीसदी विद्यार्थी गैर-जर्मन हैं. विश्वविद्यालय के प्रेज़ीडेंट, वोल्फ़गैंग हेरमैन, 2020 तक हर स्नातक पाठ्यक्रम को अंग्रेज़ी में शुरू करना चाहते हैं.

राजधानी बर्लिन में एक विद्यार्थी पर खर्च प्रतिवर्ष औसतन 9.55 लाख रुपए से ज़्यादा पड़ता है. यह संख्या विषय के अनुसार बदल जाती है.

ट्यूशन फ़ीस न होने के चलते इस खर्च को संबंधित राज्य वहन करता है जो अंततः करदाताओं पर पड़ता है.

बर्लिन के 1,70,000 विद्यार्थियों में से 25,000 गैर-जर्मन हैं. सीधा सा गणित है कि बर्लिन हर साल 23.88 अरब रुपए से ज़्यादा विदेशी विद्यार्थियों पर ख़र्च करता है. सवाल है क्यों?

'आदर्श स्थिति'

बर्लिन के विज्ञान सचिव, स्टीफ़ेन रैख, कहते हैं, "हमें यह विचार बुरा नहीं लगता कि दूसरे देशों से ज्ञान और समझ हमारे पास आए. जब इन छात्रों को कोई बिज़नेस आइडिया आता है और वह बर्लिन में रुककर अपना स्टार्ट-अप शुरू करते हैं तो नौकरियों भी मिलती हैं."

वह कहते हैं कि जर्मन विद्यार्थियों को भी डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों में शहर ने अपने विश्वविद्यालयों की क्षमता बहुत बढ़ा ली है और कैंपस में सबके लिए पर्याप्त जगह है.

दाद के सेबेस्टियन फ़ोरबेक़ कहते हैं कि अध्ययन से यह भी पता चला है कि यह सिस्टम काम कर रहा है और 50 फ़ीसदी विदेशी विद्यार्थी जर्मनी में ही रह जाते हैं.

"अगर लोग ट्यूशन फ़ीस नहीं भी देते और सिर्फ़ 40% ही पांच साल के लिए रुक जाते हैं और टैक्स देते हैं तो हम ट्यूशन और शिक्षा स्थलों की लागत वसूल कर लेते हैं और इस तरह यह ठीक चल रहा है."

एक ऐसे समाज में जिसमें रिटायर्ड लोगों की संख्या बढ़ रही है और कुछ ही युवा कॉलेज और कार्यस्थलों में जाते हैं, पढ़े-लिखे प्रवासी समस्या के हल के रूप में देखे जाते हैं.

फ़ोरबेक़ कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों का होना, जो इस देश में ही पढ़े हैं, अप्रवासन की आदर्श स्थिति है. उनके पास ज़रूरी सर्टिफ़िकेट होते हैं, उन्हें भाषा की दिक्कत नहीं होती और वह हमारी संस्कृति को जानते हैं."

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह हमेशा चल सकता है?

'नहीं बचेंगे विश्वविद्यालय'

म्यूनिख के टेक्निकल विश्वविद्यालय के वोल्फ़गैंग हेरमैन, कहते हैं, "अगर हम इस सवाल की उपेक्षा कर दें कि जर्मनी के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों के लिए भविष्य में पैसा कहां से आएगा तो जर्मनी में उत्कृष्ट विश्वविद्यालय रहेंगे ही नहीं."

"शिक्षा, शिक्षण और शोध बहुत नज़दीकी रूप से पैसे से जुड़े हुए हैं. यह वैश्विक नियम है और हम इससे बच नहीं सकते."

डॉक्टर हेरमैन कहते हैं कि करीब 3.58 लाख से 7.17 लाख रुपए की राशि ठीक रहेगी. वह यह भी मानते हैं कि इस फ़ीस से अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को सुविधाओं में भी वृद्धि होगी.

लेकिन विद्यार्थी और शिक्षक दोनों चेतावनी देते हैं कि फ़ीस में थोड़ी सी भी वृद्धि विश्व के कुछ हिस्सों से जर्मनी में प्रतिभा के आगमन को रोक सकती है.

अमरीका की स्नातकोत्तर छात्रा कैथरीन कहती हैं, "मुझे लगता है कि अमरीकी विद्यार्थियों के लिए कुछ फ़ीस यकीनन ठीक रहेगी. लेकिन उन्हें विकासशील देशों से आने वाले विद्यार्थियों का भी ध्यान रखना होगा जो यह पैसा नहीं दे सकते."

अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के सबसे लोकप्रिय स्थल राजधानी बर्लिन में राज्य सरकार कहती है कि निकट भविष्य में उसका फ़ीस लगाने का कोई इरादा नहीं है.

विज्ञान सचिव रैख कहते हैं, "हम अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए ट्यूशन फ़ीस शुरू नहीं करेंगे."

"हम नहीं चाहते कि कॉलेज में प्रवेश आपकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर हो और न ही हम चाहते हैं कि विभिन्न देशों के बीच आदान प्रदान सिर्फ़ पैसे के आधार पर ही हो."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार