जब वो मेरे प्यारे कुत्ते को पका कर खा गए

यूलिन डॉग मीट फ़ेस्टिवल इमेज कॉपीरइट REUTERS

बीते सप्ताह दक्षिण-पश्चिम चीन के यूलिन में हुए सालाना डॉग मीट फ़ेस्टिवल में क़रीब दस हज़ार कुत्तों की बलि दी गई.

बीबीसी की जूलियाना लीयू के लिए यह चीन के झांगशा शहर में बीते अपने बचपन के सबसे दर्दनाक दिन की याद दिलाने वाला था.

पढ़िए जूलियाना लीयू की कहानी

जब मैं तीन साल की थी महीनों तक गिड़गिड़ाने के बाद मेरे परिजन मुझे एक पिल्ला दिलाने के लिए राज़ी हुए थे.

जिस दिन ट्रक चलाने वाले मेरे चाचा दूर पहाड़ी इलाक़े में रहने वाली मेरी दादी के घर से एक पीला मोंग्रेल कुत्ता लेकर आए थे वो मेरी ज़िंदग़ी का सबसे ख़ुश दिन था.

मैंने उसका नाम डॉगी रखा और हम तुरंत पक्के दोस्त बन गए.

इमेज कॉपीरइट AP

अकेलेपन का साथी

मेरा जन्म 1979 में हुआ था. चीन की एक संतान नीति के कारण मैं अकेलापन महसूस करती थी और डॉगी मेरा सबसे अच्छा दोस्त था.

वो हमारे एक कमरे के अंदर-बाहर भागदौड़ करना सीख गया था. वो बचे हुए चावल खाता और आग से खुद को सेकता.

लेकिन ये अच्छे दिन ज़्यादा नहीं चले. एक ही सर्दियां बीतीं थीं कि मेरे परिजनों ने बता दिया कि डॉगी को जाना होगा.

1980 के दशक में चीन में कुत्ते पालना अवांछनीय और पूजिंपतियों जैसा व्यवहार माना जाता था. मेरे किसी भी पड़ोसी के पास कुत्ता नहीं था. ना ही कुत्ता पालना पूरी तरह क़ानूनी था.

उस समय जानवरों के टीकों या डॉक्टरों तक पहुँच आसान नहीं था ऐसे में पालतू जानवर दूसरे लोगों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरा हो सकते थे.

इमेज कॉपीरइट AFP

डिनर में डॉगी स्टू

एक दिन मेरी माँ ने कहा कि हम शॉपिंग करने जा रहे हैं. जब हम कुछ घंटे बाद लौटे तो डॉगी नहीं था. वो हमारे सामूदायिक आंगन में उल्टा लटका था. और जल्द ही वो जड़ी-बूटियों और उबले हुए अंडों के साथ स्टू बनने वाला था.

किसी ने मेरे आँसूओं पर ग़ौर नहीं किया. मैंने अपने पड़ोसियों को कहते सुना कि मैं जल्द ही उसे भूल जाउंगी.

मैं उदास थी और वो जश्न मना रहे थे. चीन के आर्थिक विकास से पहले के कुछ सालों में, जब कुछ खाद्य पदार्थ राशन में मिलते थे, एक पूरे जानवर का भोज एक दुर्लभ अवसर था.

मैंने स्टू खाने से इंकार कर दिया और अपने पूरे जीवन में कभी कुत्ते का गोश्त नहीं खाया है.

पुरानी परंपरा

चीन में कुत्तों को खाने की परंपरा लिखित इतिहास से भी पुरानी है.

इमेज कॉपीरइट AFP

सुअरों, बैलों, बकरों, घोड़ों और मुर्गों के साथ कुत्ते भी पाषाण युग में पाले गए छह जानवरों में शामिल हैं.

दूसरी और कुत्ते ऐसा भोजन नहीं है जिसे रोज खाया जाता हो. यह एक विशेष मांस होता है और माना जाता है कि यह खाने वालों को पौरूष, स्फ़ूर्ति और ताक़त देता है.

चीन में हर साल क़रीब 71 करोड़ सूअर और 4.8 करोड़ पशु खाने के लिए मारे दिए जाते हैं जबकि कुत्तों की संख्या इस तुलना में बहुत कम है. पशु अधिकार समूहों के मुताबिक सालाना क़रीब एक करोड़ कुत्ते खाए जाते हैं.

कुत्तों की चोरी

लेकिन ये कुत्ते आते कहां से हैं? कुछ शौधों के मुताबिक ज़्यादातर डॉगी जैसे पालतू होते हैं जिनमें अधिकतर को चुराया जाता है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

इस साल जब सालाना महोत्सव के लिए कुत्ते यूलिन लाए जा रहे थे तब ह्यूमेन सोसायटी इंटरनेशनल से जुड़े पीटर ली ने ऐसा कोई प्रमाण पत्र नहीं पाया जिससे पता चलता हो कि मांस खाने के लिए लाए जा रहे इन कुत्तों को किसी फ़ार्म में पाला गया हो.

वे कहते हैं, "ये सभी शहरी इलाक़ों से चुराए गए पालतू कुत्ते, ग्रामीण इलाक़ों के आवारा कुत्ते या सुरक्षा में लगाए जाने वाले कुत्ते भी हो सकते हैं"

चार साल की जाँच के बाद एनिमल एशिया भी इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि चीन में खाए जाने वाले ज़्यादातर कुत्ते चुराए जाते हैं.

इसी महीने प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में कहा गया है, "पूरी जाँच के दौरान हमें बड़े पैमानों पर कुत्तों को पाले जाने के कोई फ़ार्म नहीं मिले जहाँ सौ से ज़्यादा कुत्तों को पाला जा रहा हो. "

इमेज कॉपीरइट Reuters

रिपोर्ट में कहा गया, "कुत्तों को बड़े पैमाने पर पालने की मुश्किलें और फ़ायदे के लालच के कारण पालतू कुत्तों की चोरी और छीनने की घटनाएं बढ़ रही हैं."

लेकिन ली कहते हैं कि चीनी अधिकारियों पर पालतू कुत्तों की चोरी के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने का दबाव है और चीनी लोगों में भी कुत्ते खाने का विरोध बढ़ रहा है.

वे कहते हैं कि 2014 के मुक़ाबले इस साल यूलिन महोत्सव में कुत्तों और बिल्लियों के मांस की काफ़ी कम दुकानें थीं.

वे कहते हैं कि पिछले साल पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने कुत्ते ले जा रहीं 18 लारियों को पकड़ा था और कुल आठ हज़ार कुत्ते बचाए गए थे.

बदलती तस्वीर

मई में शंघाई यात्रा के दौरान एक दृश्य ने मेरा दिल ख़ुश कर दिया.

बांध पर घूमते हुए मुझे एक युवा सैलानी यांग यांग मिली थी जो अपने छोटे से लोमड़ी जैसे कुत्ते को ठीक वैसे ही अपने सीने से चिपकाए घूम रहीं थीं जैसे मैं अपने बच्चे को लेकर घूमती हूँ.

उन्होंने बताया, "इस तरह मैं उसे रेस्त्रां या विमान में ले जा सकती हूं. अलबत्ता जहां भी मैं जाती हूँ वहाँ उसे जाने नहीं दिया जाएगा."

इमेज कॉपीरइट

हम तीनों ने शंघाई की प्रसिद्ध गगनचुंभी इमारतों के सामने तस्वीर खिंचवाई.

मैं सोचती हूँ कि तीन दशक पहले ही लोगों का नज़रिया ऐसा हो गया होता.

मेरे परिजन, जो अब मेरे प्यारे कुत्ते को पकाकर खाने के लिए शर्मिंदा हैं, इस विषय पर बात ही करना पसंद नहीं करते हैं.

लेकिन जब मैं पाँच साल की थी, मेरे पिता पढ़ाई के लिए विदेश चले गए थे.

जो पहला तोहफ़ा उन्होंने मुझे भेजा था वो एक पीला भरवां पिल्ला ही था.

इमेज कॉपीरइट

मैंने उसका नाम भी डॉगी ही रखा.

आज तक वो मेरे पास है और जहाँ मैं जाती हूँ मेरे साथ जाता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार