ग्रीस पर बातचीत सोमवार के बाद ही

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एक ओर प्रधानमंत्री एलेक्सिस त्सिप्रास के तेवर आक्रामक बने हुए हैं. वहीं दूसरी ओर यूरोज़ोन के वित्त मंत्रियों ने तय किया है कि ग्रीस के साथ तब तक कोई बात नहीं करेंगे जब तक वहां होनेवाले जनमत संग्रह का फ़ैसला नहीं आ जाता.

बुधवार शाम ऐसे क़यास लगाए जा रहे थे कि ग्रीस के प्रधानमंत्री एलेक्सिस त्सिप्रास कुछ नरम पड़ रहे हैं. ऐसा इसलिए सोचा गया कि ग्रीस ने यूरोज़ोन के क़र्ज़दाताओं को कहा कि वो उनकी तमाम शर्तों को मानने के लिए तैयार है. ग्रीस बस अपनी लिए कुछ रियायतें चाहता है. लेकिन बात बनी नहीं.

यूरोज़ोन की तरफ़ से ख़बर आई कि वो अब तभी कुछ सोचेंगे जब जनमत संग्रह का परिणाम आ जाएगा.

कड़े शब्दों का प्रयोग

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यूरोज़़ोन के अध्यक्ष यरून डाइसब्लूम ने कहा, ''अब जब तक जनमत संग्रह के परिणाम नहीं आ जाते यूरोग्रुप के अंदर या ग्रीस और यूरोग्रुप के बीच तब तक कोई बातचीत नहीं होगी. मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि जो भी हालात बने उसके लिए हमें दुख है. और वो दुख इसलिए है क्योंकि ग्रीसवासी यूरोप का हिस्सा बने रहना चाहते हैं.

इस ख़बरों पर लोग सोच ही रहे थे कि ग्रीस के प्रधानमंत्री एलेक्सिस त्सिप्रास टीवी पर आग उगलते हुए दिखाई दिए. त्सिप्रास ने अपने देश के लोगों से पुरज़ोर तरीके से आहवान किया कि यूरोज़ोन के प्रस्तावों को नकार दें.

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उन्होंने कहा कि ग्रीस की जनता यूरोग्रुप के प्रस्तावों को नकार दे तो वो ज़्यादा ताक़त के साथ बातचीत कर पाएंगे. उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि उनकी पेंशन और बैंकों में जमा मेहनत की कमाई सुरक्षित हैं.

ग्रीस के वित्त मंत्री यानिस वारूफाक़िस ने कहा अगले सोमवार तक सब साफ़ हो जाएगा.

सोमवार को सबकुछ साफ़

वारूफाक़िस बोले, ''सोमवार को हम चाहते हैं कि जो भी समाधान हो, वो ऐसा हो की उसे चलाए रखा जा सके. ऐसा नहीं चल सकता कि समझौते से केवल समस्या का विस्तार हो और नए दौर की बातचीत शुरू हो जाए."

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उन्होंने कहा, "25 जून को उन्होंने हमें बहुत ही सख़्त शर्तों पर एक पैकेज देने की बात कही. पर हमें तो इसके लिए जनादेश मिला ही नहीं था. सोमवार को दोनों - क़र्ज़ लेने वालों और क़र्ज़ देनेवालों के लिए सब लिए सब कुछ साफ़ हो जाएगा. जनमत संग्रह से पता लगेगा कि ग्रीस के लोग किस बात के लिए तैयार हैं. हम ऐसा कोई समझौता नहीं मानेंगे जिससे लगे समाधान हो गया पर हुआ समस्या का विस्तार हो.''

अब तक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का पैसा ना चुका पाने वाले देशों में सूडान, सोमालिया और ज़िम्बाब्वे ही थे. एक विकसित देश ग्रीस से अलग ये तीनों तीसरी दुनिया के देश हैं.

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