एक सुंदर देश पर 'इस्लामिक स्टेट' का साया

इस्तांबुल में सुल्तान अहमद मस्ज़िद. इमेज कॉपीरइट AP
Image caption इस्तांबुल में सुल्तान अहमद मस्ज़िद

तुर्की का वीज़ा मिलना बहुत आसान है. मुझे भी वीज़ा तीन मिनट में ऑनलाइन घर बैठे ईमेल पर मिल गया.

न दूतावास जाने का झंझट मोल लेना पड़ा और न लाइन लगानी पड़ी.

बिल्कुल उसी अंदाज़ में, जैसा तुर्की का पर्यटन विभाग प्रचार करता है- "घर बैठे तीन मिनट में वीज़ा पाइए, तुर्की आइए."

लेकिन इस सुविधा का दूसरा पहलू भी है. असल में इसका फ़ायदा ख़ुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले लड़ाके भी उठा रहे हैं.

जब मैं तुर्की के बड़े शहर इस्तांबुल पहुंचा तो मेरे दिमाग में उन लोगों का ख़्याल आया जो सीमा पार कर इस्लामिक स्टेट के कब्ज़े वाले इलाक़े में चले गए.

मैंने अपने होटल की रिसेप्शनिस्ट से पूछा, "क्या जो जाता है, वो वापस नहीं आएगा?”

फ़ाहमी कहती हैं, “मैं सूफ़ी इस्लाम पर विश्वास करती हूँ, जैसा तुर्की में बहुत लोग करते हैं. पर अब लोगों में डर है कि जो लोग यहाँ से सीमा पार कर सीरिया और इराक़ जा रहे हैं, वे लोग क्या एक दिन वापस नहीं आएँगे?”

धर्मनिरपेक्ष

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Image caption पिछले महीने इस्तांबुल में हुए गे प्राइड परेड का नज़ारा

इस्तांबुल में बुर्का पहने महिलाएं इक्का-दुक्का ही दिखती हैं. अधिकतर महिलाएं पश्चिमी परिधान में दिखती हैं और देर रात तक बेफ़िक्र सड़कों पर अकेली घूमती नज़र आती हैं.

मुझे होटल की रिसेप्शनिस्ट ने तुर्की का प्रसिद्ध सूफ़ी दरवेश नृत्य देखने में भी मदद की.

असल में तुर्की दुनिया के मुस्लिम बहुल धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों में से एक है.

यह ख़ूबसूरत देश दुनिया का ऐसा एकमात्र देश भी है जो यूरोप और एशिया दोनों महाद्वीपों में बसा है.

आप बस एक पुल पार कर एशिया से यूरोप और यूरोप से एशिया का सफ़र तय कर सकते हैं, जो यहां आने वाला हर सैलानी करता है.

युवा तुर्क

होटल के एक वेटर इस्माइल ने मुझे इस्तांबुल के तक़सीम स्क्वेेयर का पता बताया.

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Image caption तकसीम चौक पर सूरज डूबने के बाद इफ़्तारी करते लोग

तक़सीम स्क्वेयर में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मूर्तियां हैं और मुझे बताया गया कि इस चौक ने तुर्की के लोकतांत्रिक इतिहास के संघर्षों का काफी कुछ हिस्सा देखा है.

इस देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए बड़े बड़े आंदोलन हुए हैं और अधिकतर इस चौक से ही शुरू हुए.

इन आंदोलनों के कारण ही भारत में भी जांबाज़ और जुझारू लोगों को युवा तुर्क कहा जाता है.

एक ज़माने में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर युवा तुर्क की तरह जाने जाते थे.

तक़सीम चौक की चहल पहल

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Image caption इस्तांबुल की नीली मस्ज़िद के पास पार्क में रोज़ेदारों की लंबी लंबी क़तारें देखी जा सकती हैं

शाम को तक़सीम चौक में हज़ारों की तादाद में लोग सूरज डूबने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि वे रोज़ा खोल सकें.

पास में ही एक बैंड धार्मिक संगीत गा रहा है. लोग परिवार और मित्रों के साथ संगीत का आनंद उठा रहे हैं.

मेरे पाकिस्तानी मित्र अज़हर हुसैन बताते हैं, “हम भी पाकिस्तान में रोज़ा खोलने से पहले क़व्वाली का आयोजन किया करते थे, पर जब से तालिबान और वहाबी कट्टरपंथी इस्लाम की ताक़त बढ़ी है, संगीत ग़ैर इस्लामिक हो गया है. अब देखना है इस्तांबुल जैसे शहर कब तक इन हमलों से बचे रह पाते हैं?”

मुझे भी यहां का माहौल देख, बरबस 80 के दशक के काबुल की याद आ गई, जहाँ सोवियत समर्थक सरकार के दिनों में लड़कियां पश्चिमी परिधान में पार्टियों और विश्वविद्यालयों में जाती नज़र आती थीं, लेकिन कट्टरपंथी इस्लामी राजनीति ने सब कुछ बदल दिया.

मैं रात 12 बजे के बाद थककर अपने होटल वापस लौटने लगा तो देखा कि हज़ारों की तादाद में युवक और युवतियों का तकसीम चौक पहुँचना जारी था.

मुझे बताया गया कि पार्टी सुबह तक चलेगी. इस्तांबुल का वह एक सामान्य दिन था.

चरमपंथ

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Image caption हाल ही में तुर्की की सीमा के पास सीरिया के कोबानी शहर में आईएस लड़ाकों का हमला हुआ था

तुर्की में चाय पर आजकल यह चर्चा का प्रमुख विषय है कि क्या इस्तांबुल भी काबुल बनने से बच पाएगा?

आईएस के कब्ज़े वाले इलाकों में आज जो रहा है उसकी तुर्की में बैठकर कल्पना करना भी मुश्किल है.

लेकिन लोगों को यह भी अहसास है कि इन दोनों तरह की दुनिया के बीच ज़मीनी दूरी अधिक नहीं है.

अब तक हज़ारों युवा तुर्की के रास्ते आईएस के क़ब्ज़े वाले इराक़ और सीरिया के हिस्से में सीमापार कर जा चुके हैं.

क्या बरसों की कड़ी मेहनत से बनाया गया धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र कट्टरपंथी आंधी में ढह जाएगा?

तुर्की दक्षिण एशियाई लोगों के लिए एक रोचक जगह है. जैसे भारत में मध्य एशिया से मुग़ल आए. वही लोग ओटोमन के नाम से तुर्की आए और 1923 तक 500 साल से अधिक राज करते रहे.

भारत और तुर्की

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यहाँ के मक़बरे भारत के मुग़लकालीन मक़बरों की याद दिलाते हैं, हालांकि यहाँ स्थानीय पत्थर लाल की बजाय नीले हैं और यहाँ के मकबरे नीली मस्जिद के नाम से जाने जाते हैं. मीनारें और गुम्बद भी थोड़े अलग हैं.

यहाँ की भाषा में भी कुछ शब्द बिलकुल हमसे मिलते जुलते हैं. सावधान को यहाँ दिक़्क़त कहते हैं, ज़मीन को ज़मीन और चाय को चाय.

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में सहिष्णु इस्लाम मुश्किल में नज़र आता है.

लेकिन यह तो इतिहास ही बताएगा कि क्या वह तुर्की में वह ज़मीन पकड़कर रख पाएगा?

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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