...तो मेरा क्या होगा कालिया?

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लगभग दो महीने पहले जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने ये कहा कि तालिबान को आईएसआई ने इसलिए प्रमोट किया ताकि उनसे कश्मीर में काम लिया जा सके, तभी से मैंने ये सोचकर अपनी सीट की बेल्ट कसकर बांध ली कि भइया आगे न जाने कितने झटके आने वाले हैं.

फिर नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का ये लेक्चर सोशल मीडिया पर किसी ने फोड़ दिया कि पाकिस्तान की ओर से अगर एक और मुंबई हुआ तो फिर बलूचिस्तान भी नहीं संभल पाएगा.

इस पर पाकिस्तान में हहाकार मच गया कि देखा हम न कहते थे कि बलूचिस्तान क्यों जल रहा है!

फिर भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने ये झटका दिया कि हम अपने फौजी ख़ामख़ा क्यों मरवाएँ, चरमपंथ का इलाज चरमपंथ ही है, जैसे कांटे से कांटा निकाला जाता है.

ख़ुफ़िया एजेंसियों की मदद

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पिछले हफ़्ते बीबीसी ने ये मिसाइल छोड़ा कि अल्ताफ़ हुसैन के मुहाजिर क़ौमी मूवमेंट(एमक्यूएम) के ओहदेदारों ने स्कॉटलैंड यार्ड को बताया है कि एमक्यूएम को भारतीय एजेंसी रॉ से पैसे और उनके सदस्यों को हथियारों से ट्रेनिंग मिलती है.

अभी मैं इन्हीं ख़बरों से संभल रहा था कि रॉ के भूतपूर्व चीफ़ अमरजीत सिंह दुलत ने ये विस्फ़ोट कर दिया कि कश्मीर में हुर्रियत की लीडरशिप का ख़्याल आईएसआई के साथ रॉ भी रखती है. मसलन कभी होटल बुक करवा दिया, तो कभी हवाई जहाज़ का टिकट दिला दिया वगैरह वगैरह.

उन्होंने ये भी कहा कि हमने तो मुजफ़राबाद में बैठे हिज़बुल मुजाहिद्दीन के चीफ़ सलाउद्दीन के बेटे का मेडिकल कॉलेज में दाखिला कराने में मदद की थी.

उसके बाद राम जेठमलानी ने गोला दाग़ दिया कि अगर शरद पवार दाऊद इब्राहिम की ये फ़रमाइश मान लेते कि जब तक मुक़दमा चलेगा उन्हें जेल के बजाय घर में रखा जाएगा, तो आज दाऊद हमारे यहां होते.

ख़बरी गोले और ईमान

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ये सारे ख़बरी गोले, मिसाइल और बम एक के बाद एक इतनी तेज़ी से मुँह पर पड़े हैं कि मेरा तो दुनिया ही से ईमान उठता जा रहा है.

दिमाग़ इस कदर झुनझुना रहा है कि रात में कई बार हड़बड़ाकर बैठ जाता हूँ कि अगर कल किसी ने कह दिया कि नरेंद्र मोदी को आधी चुनावी फंडिंग चीन की सीक्रेट सर्विस से हुई थी, पुतिन सीआईए के पैरोल पर थे, ओबामा एमआई-सिक्स के पार्ट टाइमर थे, नवाज़ शरीफ़ को सऊदी अरब की ख़ुफ़िया एजेंसी वजीफ़ा दिया करती थी और परवेज़ मुशर्रफ़ रॉ के लिए, हसीना वाजेद आईएसआई के लिए, हमीद गुल ईरानी मुख़बरात के लिए और ममता बनर्जी फ्रेंच सीक्रेट सर्विस के लिए काम करती रहीं, तो मेरा क्या होगा कालिया!

उसके बाद ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही होगा न, कि कोई अमरजीत सिंह दुलत पोला सा मुँह बनाकर अपना चश्मा सीधे करते हुए कहेगा, तो क्या हुआ दुनियाभर में ऐसा ही होता है.

दुनिया की धुरी

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और फिर कोई परवेज़ मुशर्रफ़ प्रेम चोपड़ा स्टाइल में सिगार के धुँए का गोला हवा में उठाते हुए कंधे झटकते हुए बताएगा व्हाट अ बिग डील...प्रॉब्लम क्या है... ख़ुफ़िया एजेंसियों, राजनेताओं और अंडरवर्ल्ड के नेक्सस की धुरी पर ही ये दुनिया घूम रही है, अगर इनमें से एक भी आगे पीछे हो जाए तो संसार का संतुलन ही बिगड़ जाए...

आज से मेरी तौबा जो अब कभी अपने आदर्शवाद के घोंसले से मुंडी निकालकर किसी के भी बारे में कुछ भी शुभ शुभ सोचूँ...जरा कोई पानी तो दे दे...होंठों पर पपड़ी जम रही है...और हल्की हल्की सर्दी भी लग रही है....

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