क्या चाहते हैं पूर्व कश्मीरी चरमपंथी?

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Image caption रहील शरीफ़ के बयान के समर्थन में मुजफ्फ़ाराबाद में रैली हुई.

हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख राहील शरीफ़ के उस बयान ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान और कश्मीर को अलग नहीं किया जा सकता है.

परमाणु हथियारों से संपन्न ये दोनों पड़ोसी देशों का कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों पर नियंत्रण है और वे पूरे कश्मीर पर दावा करते हैं.

लेकिन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी और विद्रोह के बेस कैंप मुज़फ़्फ़राबाद में माहौल असाधारण रूप से शांत है.

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Image caption इस लड़के के दादा भारत प्रशासित कश्मीर के चरमपंथी थे और 1990 के दशक में मारे गए थे.

भारत प्रशासित कश्मीर में जारी 15 सालों की दहशतगर्दी साल 2003 में ही काफी कुछ ख़त्म हो गई थी, जब पाकिस्तान अपनी ज़मीन से चरमपंथियों के आंदोलन पर काबू करने के लिए सहमत हो गया था.

लेकिन 2012 के अंत से फिर से आक्रामकता बढ़ गई है.

जनरल शरीफ़ के बयान ने दहशतगर्दी के फिर से उभार का डर पैदा कर दिया है.

लेकिन मुज़फ़्फ़राबाद में मौजूद वो लोग, जो भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में लगे रहे हैं, वो अब उतने आक्रामक नहीं दिखते.

शरणार्थी की ज़िंदगी

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Image caption मुजफ्फ़राबाद में पूर्व चरमपंथियो के बच्चों को रियायती दरों पर शिक्षा मिलती है.

मुज़फ़्फ़राबाद में एक कार गैरेज के पास छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले व्यक्ति ने कहा, “दिन भर में मैं अपनी रोजी रोटी भर का कमा लेता हूँ. यह बहुत बड़ी रक़म नहीं है लेकिन ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए काफ़ी है.”

वो भारत प्रशासित कश्मीर के हैं और पूर्व चरमपंथी रहे हैं. अब वो पाकिस्तान में एक शरणार्थी का जीवन गुज़ार रहे हैं.

वहां उन्हें नागरिक अधिकार हासिल नहीं है और सरहद पार अपने गांव में वापस लौटने की कोई सूरत भी नहीं है.

अपने को आज़ादी के लिए लड़ने वाला कहने वाले ये पूर्व चरमपंथी अब अपने बच्चों और पत्नी के साथ एक ऐसे शहर में हैं, जहां उनका कोई संबंध या संबंधी नहीं है.

हताशा

हाल ही में नियंत्रण रेखा के पास भारतीय चौकियों पर हमले हुए हैं, क्या वो अब फिर से उस चरमपंथी संगठन में शामिल होना चाहते हैं, जिसमें वो पहले रह चुके हैं?

इस सवाल पर वो थोड़ी देर चुप रह कर कहते हैं, “यहां कोई लामबंदी नहीं है, न ही ट्रेनिंग के लिए लाइन लगती है और न पुराने समय की तरह अब जिहादी संगठनों के दफ़्तरों में कोई भीड़ होती है.”

वो बताते हैं, “मैंने अपना घर छोड़ा क्योंकि मैं इस लड़ाई को जीतना चाहता था, लेकिन पाकिस्तानी केवल भारतीयों को सुई चुभोना चाहते थे. वो संघर्ष विराम पर सहमत हो गए और भारतीयों को नियंत्रण रेखा पर बाड़ लगाने की इजाज़त दे दी.”

“इसलिए मैं समझता हूँ कि कश्मीर को बलपूर्वक आज़ाद करने का समय अब गया.”

संघर्ष विराम

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उनके मुताबिक़, “इसके बावजूद, मैं अपने बच्चों को अफ़ाग़ानिस्तानी शरणार्थियों की तरह पाकिस्तान में कूड़े बीनकर ज़िंदगी बसर करते नहीं देखना चाहता.”

साल 1989 में शुरू हुई हिंसा के बाद पाकिस्तान में ट्रेनिंग और हथियारों के लिए आए क़रीब तीन से चार हज़ार पूर्व चरमपंथी मुज़फ़्फ़राबाद में हैं.

इनमें से अधिकांश भारतीय सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए वापस चले गए. इनमें कई मारे गए जबकि कुछ लोग चुपचाप अपने पुराने घरों को लौट गए.

अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान और भारत में साल 2003 में हुए संघर्ष विराम के बाद, पाकिस्तान में ही रह गए इनमें से अधिकांश लोग अपने रहमों करम पर छोड़ दिए गए.

इनमें से अधिकांश अधेड़ हो चुके हैं और अब अपने परिवारों की देखभाल कर रहे हैं.

युद्ध कोष, जो कभी इन्हें मिलता था, अब ख़त्म हो रहा है.

पाकिस्तान ने 2006 में भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथियों को ज़मीनी कार्रवाईयों के लिए धन देना बंद कर दिया.

साल 2012 में पाकिस्तान ने जिहादी संगठनों को दफ़्तर चलाने के लिए दिए जाने वाले प्रशासनिक खर्चों को आधा कर दिया, जिससे बहुत से दफ़्तर बंद हो गए.

आर्थिक मदद

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पिछले साल इन खर्चों को और कम कर दिया गया.

नतीजन पूर्व चरमपंथी अब रोज़ीरोटी के लिए सड़क किनारे दुकान करके, कार गैराजों में काम करके या इमारत बनाने या रेस्टोरेंट में काम करके गुज़ारा करने पर मजबूर हैं.

सरकार हर पूर्व चरमपंथी को हर महीने 7,000 पाकिस्तानी रुपए और उसके हर पारिवारिक सदस्य को 1,500 पाकिस्तानी रुपए का भत्ता देती है.

इस तरह के हज़ारों लोग नियंत्रण रेखा के दोनों ओर हैं और कम से कम 150 लोग पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में पंजीकृत हैं.

हलीमा बीबी भारत प्रशासित कश्मीर के उरी सेक्टर की रहने वाली हैं.

मुज़फ़्फ़राबाद के दक्षिणी छोर पर एक शरणार्थी कैम्प अम्बोर में अपने दो बच्चों के साथ वो रहती हैं.

एक विधवा की कहानी...

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साल 1995 में जब वो 20 साल से भी कम उम्र की थीं, उनकी शादी एक ऐसे चरमपंथी से कर दी गई जो 1990 से ही भारतीय फ़ौजों के ख़िलाफ़ लड़ रहा था और संदिग्ध डबल एजेंट था.

वो आत्मसमर्पण के बाद उरी में क़ैदखाने से तुरंत ही रिहा हुआ था.

शादी के एक साल बाद वो फिर पाकिस्तान की ओर सरहद पार चला गया लेकिन गिरफ़्तार हो गया. इस बार उसे पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने गिरफ़्तार किया.

इसके बाद उसे फिर सात आठ महीने जेल में बिताने पड़े.

साल 1997 में वो उरी में फिर वापस आ गया और हलीमा को नियंत्रण रेखा के पार चलने को कहा.

हलिमा याद करती हैं, “पाकिस्तानी कश्मीर में पहुंचने के लिए हम दो दिन चलते रहे.”

इसके तीन साल बाद ही उरी सेक्टर में चरमपंथियों के समूह का नेतृत्व करते हुए उनके पति की मौत हो गई . हलीमा अपने दो बच्चों के साथ एक अनजान शहर में अकेली रह गईं.

पाकिस्तान की मंशा

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Image caption राशिदा शाफ़ी के पिता 2002 में मारे गए, अब वो मुजफ्फ़राबाद में ही डॉक्टर बनाना चाहती हैं.

वो अब युद्ध में मारे गए लड़ाकों की विधवाओं के लिए मिलने वाले भत्ते पर गुजर बसर कर रही हैं. इसके अलवा वो नजदीक के एक स्कूल में चपरासी का काम करती हैं.

वो कहती हैं, “इस लड़ाई ने हमें कुछ नहीं दिया. इसने केवल आदमियों की बलि ली.”

लेकिन हाल ही में भारतीय चौकियों पर हमले करने वाले लोग कौन थे?

एक बड़े कश्मीरी जिहादी समूह के एक सदस्य के मुताबिक़, यह काम लश्कर ए तैयबा समूह का था, जिसमें कश्मीरी लड़ाकों के बजाय पाकिस्तानी लड़ाके हैं.

मुज़फ़्फ़राबाद के कश्मीरी मामलों के जानकार आरिफ़ बहार कहते हैं, “इस तरह के संकेत हैं कि पाकिस्तान तनाव को बढ़ाना चाहता है, लेकिन ग़ैर कश्मीरी समूहों का इस्तेमाल करते हुए, बहुत नियंत्रित तरीक़े से.”

आज़ादी की ख्वाहिश

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Image caption कश्मीरी मामलों को जानकारों काहना है कि पाकिस्तान फिर तनाव बढ़ाना चाहता है.

इस वजह से बेघर हुए कश्मीरी लड़ाके बहुत हताशा में हैं.

कश्मीर में फिर से ज़िहाद शुरू करने का अभियान चलाने वाले पूर्व चरमपंथी उज़ैर ग़ज़ाली कहते हैं, “हमें और हमारी लड़ाई का समर्थन करना पाकिस्तान की नैतिक और क़ानूनी ज़िम्मेदारी है, ताक़ि हम आज़ादी और सम्मान के साथ अपने घरों को लौट सकें.”

लेकिन उनके बच्चे मुज़फ़्फ़राबाद में अपने नए भविष्य की ओर देख रहे हैं.

और उन्हें अच्छे भविष्य का सपना देखने में यहां के अच्छे स्कूल मदद कर रहे हैं. वो स्थानीय संपन्न लोगों के बच्चों से भारी फ़ीस वसूलते हैं ताकि ऐसे बच्चों की मुफ़्त शिक्षा हो सके जो अपने एक या दोनों अभिभावकों को युद्ध या प्राकृतिक आपदा में खो चुके हैं.

प्रतिष्ठित इंग्लिश मीडियम सवेरा मॉडल स्कूल मुज़फ़्फ़राबाद के पास शौक़त लाइंस में स्थित है.

19 साल के असद मीर यहां 10वीं में पढ़ते हैं. इसी स्कूल में उनकी बहन भी पढ़ती हैं. जबकि उनके बड़े भाई एक जनरल स्टोर में सेल्समैन का काम करते हैं.

नई उम्मीद

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Image caption असद मीर पढ़ लिख कर इंजीनियर बनना चाहते हैं.

उनके परिवार को मामूली सरकारी भत्ते का आसरा है, लेकिन वो बहुत साफ़ सुथरे और आत्मविश्वास से भरे नज़र आते हैं.

स्कूल ने उनके और उनकी बहन शिक्षा और स्कूल तक बस की मुफ़्त व्यवस्था की है.

वो कहते हैं, “मुझे गणित अच्छी लगती है और मैं इंजीनियर बनना चाहता हूँ.”

उनके पिता बारामूला के थे और इस इलाके में एक चरमपंथी अभियान के दौरान मारे गए थे.

असद कहते हैं कि लड़ाई में अब उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है. इसलिए नहीं कि इसने उनके पिता को उनसे दूर कर दिया बल्कि इसलिए भी कि वो अब सरहद पार अपने पिता के घर नहीं जाना चाहते.

उनका कहना है, “मैं बारामूला में किसी को नहीं जानता. मां कहती हैं कि मुज़फ़्फ़राबाद ही अब हमारा घर है. मैं समझता हूं वो सही हैं.”

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