क्या तालिबान से समझौता मुमकिन है ?

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तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान सरकार के बीच पहले दौर की बातचीत, हाल के वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में शांति लाने का अपनी तरह का पहला प्रयास है.

पाकिस्तानी अधिकारी इसे शुरुआती दौर की बातचीत मान रहे हैं.

यह पहली बार है जब तालिबान अफ़ग़ान अधिकारियों के साथ वार्ता की मेज पर बैठने के लिए तैयार हुआ है. इससे पहले वो कहते थे कि वो केवल अमरीका से बात करेंगे, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में असली सत्ता उसी के पास है.

यह भी पहली बार है जब तालिबान उस बातचीत में शामिल हो रहा है, जिसे अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान ने सार्वजनिक तौर पर की स्वीकृति दी है.

बातचीत का भविष्य

इससे पहले हुई बातचीत या तो असफल रही थी या तालिबान इसको लेकर गोपनीयता बरतता रहा है या अक्सर इनकार करता रहा है.

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अमरीका ने 2012 में क़तर में तालिबान के साथ बातचीत का प्रयास किया था. लेकिन अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करजई ने तालिबान के दफ्तर पर उसका झंडा फहराने और इसे इस तरह दिखाने जैसे वो निर्वासित सरकार हो, आपत्ति जताई थी. इसके बाद वार्ता असफल हो गई थी. पाकिस्तान को लगा कि इस बातचीत के लिए उसे नज़रअंदाज किया गया.

हाल के महीनों में तालिबान ने इस बात से कई बार इनकार किया कि उसके अलग-अलग स्तर के अधिकारियों ने दुबई, चीन और नार्वे में अफ़ग़ान अधिकारियों के साथ बैठक की.

उनका कहना था कि अगर इस तरह की वार्ताएं हुई भी हैं तो इसके लिए तालिबान नेतृत्व से आधिकारिक मंज़ूरी नहीं ली गई.

महत्वपूर्ण बात यह है कि ताज़ा वार्ता पाकिस्तान में आयोजित की गईं, जिसके बारे में माना जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति की चाबी उसी के पास है.

शांति प्रक्रिया

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पाकिस्तान में हुई ताज़ा बैठक में अमरीका, चीन और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों की मौज़ूदगी से इस बात को बल मिला कि अफ़ग़ानिस्तान में कोई शांति प्रक्रिया आकार ले रही है.

लेकिन तमाम तरह की आशावादिता के बावजूद वहां कुछ जटिलताएं और भूराजनीतिक मामले भी हैं, जो अफ़ग़ान मामले को जटिल बनाते हैं. पाकिस्तान आशंका जताता रहा है कि भारत उसे अस्थिर करना चाहता है.

अफ़ग़ानिस्तान अकेला देश है, जिसने आज़ादी के बाद संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की सदस्यता का विरोध किया. पाकिस्तान को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान के जरिए भारत उसके खिलाफ़ षड्यंत्र करता है.

पाकिस्तानी सेना पर यह आरोप लगता रहा है कि वह पर्दे के पीछे से तालिबान का उपयोग अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण और वहां भारत के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए करता है.

फ़िलहाल अफ़ग़ानिस्तान में शांति का समर्थन करने के पीछे पाकिस्तान की मंशा अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिए चीनी पैसे को प्रोत्साहन देना है. लेकिन सेना अब भी प्रभावशाली है और क्षेत्रीय नीतियों में सेना के प्रभावशाली बने रहने की आशंका है.

विचारधाराओं की लड़ाई

अफ़ग़ानिस्तान सरकार में भी दो तरह की विचारधाराएं हैं, एक का नेतृत्व पश्तून राष्ट्रपति करते हैं और दूसरे का राष्ट्रवादी अफ़ग़ानों का एक गुट करता है, इसमें पश्तून और ग़ैर पश्तून दोनों शामिल हैं.

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राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी पाकिस्तान के साथ जाने को उत्सुक दिखते हैं, वहीं दूसरा गुट इससे असहमत है. उसका मानना है कि पिछले 13 साल से जारी युद्ध में तालिबान ने पूरे अफ़ग़ानिस्तान में असाधारण रूप से बढ़त हासिल की है.

यह आंतरिक कलह अफ़ग़ानिस्तान की सेना और पुलिस को मदद नहीं करने वाला है, जो कि नैटो सेनाओं के जाने के बाद फिर उठ खड़े हुए तालिबान से लड़ रहे हैं.

पाकिस्तान की ओर से शांति वार्ता को कितना बढ़ावा मिलेगा ये इस पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रपति ग़नी अपने पाकिस्तान समर्थक रुख पर कितना कायम रह पाते हैं.

पाकिस्तान को जब यह लगेगा कि राष्ट्रपति ग़नी का स्थिति कमज़ोर हो रही है तो, वह समझौते पर दवाब बढ़ाएगा. वह खलनायक के रूप में नहीं देखा जाना चाहता है. इससे पाकिस्तान अलग थलग पड़ सकता है.

आईएस का बढ़ता प्रभाव

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अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान विरोधी तत्वों को भी पाकिस्तान बेअसर करना चाहता है, भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो ताकि ये तत्व पाकिस्तानी तालिबान का हवाला देकर उसका इ्स्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ न कर पाएँ.

राष्ट्रपति गनी कितना दम दिखाते हैं ये देखकर तालिबान तय करेगा कि उसे अब गंभीर वार्ता करनी है.

इस्लामिक स्टेट (आईएस) जिस तरह से अफ़ग़ान लड़ाकों को आकर्षित कर रहा है और जिस तरह से इलाक़ों पर नियंत्रण हासिल कर रहा है, वह भी तालिबान की गणना का एक महत्वपूर्ण कारक है.

अगर आईएस का ख़तरा बढ़ता है तो तालिबान सुरक्षा कारणों और एक प्रतिद्वंदी चरमपंथी समूह को आगे बढ़ने से रोकने के लिए समझौता करने के लिए मज़बूर होगा.

इन विरोधाभासों के बीच यह अनुमान लगाना काफी कठिन है कि वार्ताकार ऐसे समझौते पर पहुंच सकें जिसे सब लोग मानें.

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