ईरान की परमाणु गुत्थी 6 सवालों में..

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ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता को लेकर दो तरह के बयान आ रहे हैं.

कुछ ऐसे जिनसे लगता है कि समझौता हो जाएगा और दूसरे ऐसे जो इसके उलट नतीजों की ओर संकेत करते हैं.

ईरान और वार्ता में शामिल पी 5 + 1 देशों (सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य और जर्मनी), दोनों की ही ओर से ऐसे बयान आ रहे हैं.

दरअसल, अगर दोनों पक्षों में समझौता नहीं होता तो दोनों तरफ़ की प्रोपागैंडा मशीन दूसरे पक्ष पर ज़िम्मेदारी डालने की तैयारी में भी है.

इस पूरी वार्ता के पहलुओं को समझा रहे हैं अमरीका की डेलावेयर यूनिर्वसिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर मुक़्तदर ख़ान.

बात कहाँ अटकी है?

अभी तक बात हथियारों की ख़रीद के प्रतिबंध पर आकर अटकी हुई है.

ईरान के परंपरागत हथियार ख़रीदने पर प्रतिबंध है. यानी वो किसी दूसरे देश से गोला-बारूद या बंदूकें भी नहीं ख़रीद सकता है. ना ही कोई देश उसे हथियार बेच सकता है.

ईरान का कहना है कि जो प्रतिबंध हटाए जाएंगे उनमें हथियार ख़रीद पर लगे प्रतिबंध भी शामिल होने चाहिए.

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इरान की परमाणु क्षमता का क्या होगा?

जहां तक परमाणु समझौते का सवाल है उसके तहत ईरान ने यूरेनियम जैसे जो भी परमाणु पदार्थ जमा किए हैं वो वापस रूस को चले जाएंगे और उनकी निगरानी की जाएगी.

यूरेनियम या रेडियोधर्मी पदार्थों की शुद्धता बेहद कम रखी जाएगी, लगभग तीन या साढ़े तीन प्रतिशत ही. ये शुद्धता केवल इतनी होगी कि ईरान उससे बिजली पैदा कर सके या उसे चिकित्सा शोध में इस्तेमाल कर सके.

यानी इस समझौते से ईरान की तकनीकी दक्षता 10 साल पीछे चली जाएगी. इसका मतलब ये नहीं है कि ईरान कभी भी परमाणु बम नहीं बना सकेगा. दस साल में शायद वो फिर से ये सब चीज़ें हासिल कर ले.

क्या चाहता है अमरीका?

अमरीका में भी ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि ईरान के साथ अमरीका के संबंध बेहतर हों.

ये लोग मानते हैं कि पिछले कुछ दशकों में ईरान-अमरीका संबंध अच्छे न होनें के बावजूद, ईरानी लोग अमरीका को पसंद करते हैं.

उधर जो देश अमरीका के सबसे क़रीबी हैं जैसे पाकिस्तान और सऊदी अरब, वहां अमरीका विरोधी भावना सबसे ज़्यादा है.

सऊदी अरब के साथ बेहतर संबंध एक अहम कारण है कि अमरीका के ईरान के संबंध नकारात्मक तरीके से प्रभावित हुए हैं.

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इसराइल कहाँ खड़ा है?

जहाँ तक इस पूरे मामले में ईरान के परमाणु बम बनाने में सक्षम होने के इसराइल के दावों की बात है, तो वो ज़्यादा विश्वसनीय नहीं है.

इसराइली नेता पिछले बीस सालों से कहते रहे हैं कि ईरान तुरंत परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है.

अमरीका-ईरान में सहयोग?

इराक़ और सीरिया में सक्रिय कट्टरपंथी संगठन इस्लामी इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में ईरान और अमरीका दोनों ही किसी न किसी तरह से शामिल हैं.

अमरीका हवाई हमले कर रहा है और ईरान इस्लामिक स्टेट से लड़ रहे समूहों को ज़मीनी मदद मुहैया करा रहा है.

ऐसे में भले ही दोनों देश खुले तौर पर स्वीकार न करते हों लेकिन उनके बीच रणनीतिक सहयोग तो है ही.

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मध्यपूर्व की राजनीति पर असर?

ईरान के साथ अगर पी 5 +1 का परमाणु समझौता होता है तो इसका असर मध्यपूर्व की राजनीति पर भी पड़ेगा.

ज़्यादातर अरब देशों में इस समय संकट चल रहा है. मिस्र जैसे देश जो स्थिर हुआ करते थे वो अब ख़ुद संकट का सामना कर रहे हैं.

अभी सिर्फ़ ग़ैर अरब देश ही स्थिर हैं. ये हैं तुर्की और ईरान. नेटो के ज़रिए अमरीका के तुर्की से पहले से ही समझौते हैं.

अगर अमरीका ईरान के साथ भी समझौता कर लेता है तो अमरीका अपनी विदेश नीति पर अरब देशों के प्रभाव के बिना ही क्षेत्र में स्थिरता ला सकता है.

तब तुर्की, ईरान और इसराइल जैसे ताक़तवर देश इस्लामी चरमपंथ के ख़िलाफ़ उसके साथ आ जाएंगे.

सऊदी अरब या तो इन देशों के साथ आएगा या सहयोग नहीं करेगा.

अगर वो सहयोग नहीं करेगा तो उसके लिए ही ख़तरे बढ़ जाएंगे और अगर सहयोग करेगा तो इस क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी.

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