मदरसों पर कार्रवाई से रुकेगी हिंसा?

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पेशावर के एक स्कूल पर बीते साल तालिबान के हमले में 140 लोगों के मारे जाने के कुछ दिन बाद ही पाकिस्तानी अधिकारियों ने एक सुरक्षा योजना का ऐलान किया था.

इस योजना में चरमपंथ के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाने की कसमें खाई गईं थीं.

इनमें से एक था मदरसों की कड़ी निगरानी करना, जिन पर छात्रोें में अतिवादी विचार भरने और जातीय हिंसा को बढ़ावा देने के आरोप लगते हैं.

उदाहरण के लिए इसी साल जून में सरकार ने 48 मदरसों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का वादा किया. ये सिंध प्रांत के चरमपंथी समूहों से जुड़े हुए थे.

लेकिन बहुत से विश्लेषकों को लगता है कि मदरसों के ख़िलाफ़ पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई. वे कहते हैं कि जातीय हिंसा ख़त्म करने के लिए देश की शिक्षा प्रणाली पर नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है.

'इस्लामिक लोकतंत्र'

पाकिस्तान में मदरसे बमुश्किल ही अंग्रेज़ी और विज्ञान जैसे सामान्य विषय पढ़ाते हैं. इसके बजाय उनके पाठ्यक्रम में मजहबी विषयों पर ज़ोर रहता है. आलोचकों का कहना है कि यह भेदभाव पैदा करता है और हिंसा भड़काता है.

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कराची के जामिया इस्लामिया मदरसे के सदस्य मोहम्मद अकबर कहते हैं कि क़ुरान याद कर रहे छात्रों को टीवी से बचने की सलाह दी जाती है. अख़बार पढ़ने को भी ध्यान भटकाने वाला माना जा सकता है.

एक छात्र ने जनवरी, 2015 में डॉन अख़बार से कहा, "हमारे शिक्षक एक ऐसे लोकतंत्र के हक़ में हैं जो कुरान और सुन्नाह (पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाएं) के अनुरूप हो और एक मुस्लिम शासक हो."

डॉन के अनुसार, मार्च 2014 में पाकिस्तानी संसद में रखे गए सुरक्षा पुलिस के एक दस्तावेज़ में कहा गया था, "बड़ी संख्या में चरमपंथी या तो मदरसों के छात्र हैं या रहे हैं. उनके दिमाग़ में राज्य के ख़िलाफ़ हथियार उठाना भर दिया गया है."

पाठ्यक्रम का इस्लामीकरण

पाकिस्तान के सरकारी पब्लिक स्कूलों में भी अतिवादी विचारों की गुंजाइश रखने का आरोप है.

पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में धर्म पर बहुत ज़ोर दिया जाता है. इसे पूर्व सैन्य शासक जनरल ज़िया उल हक़ ने शुरू करवाया था, जिन पर देश के इस्लामीकरण का आरोप है.

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विश्लेषक परवेज़ हूदभॉय मानते हैं कि ज़िया का पाठ्यक्रम पढ़ने और समझने, रचनात्मक लेखन, विज्ञान और गणित के लिए पूरा मौका नहीं देता है.

उन्होंने पाकिस्तान में शिक्षा सुधारों पर एक शोधपत्र में लिखा "इसका बहुत गहरा असर हुआ. कॉलेज और यूनिवर्सिटी परिसरों में जंगी जिहाद जल्द ही संस्कृति का हिस्सा बन गया."

दिसबंर, 2014 में डॉन अख़बार ने ख़बर दी कि शिक्षा के लिए काम करने वाली मलाला यूसुफ़ज़ई के गृह प्रांत ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में सरकार का लक्ष्य स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इस्लामिक तत्व बढ़ाना है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह ऐसा क़दम है जिससे हिंसक जिहाद को बढ़ावा मिलता है.

प्रांत की सरकार में शामिल जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में शुरू इस अभियान में विज्ञान की किताबों में क़ुरान की उन आयतों को फिर से शामिल करने की मांग की जा रही है जो जिहाद से संबंधित हैं, ख़ास कर उन हिस्सों को जो 'विश्व के दैवीय निर्माण' की बात करते हैं.

वे प्राथमिक कक्षाओं की उन पाठ्यपुस्तकों पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं जिनमें लड़कियों को बिना हिजाब के दिखाया गया है.

पाकिस्तान के कुछ प्रमुख विश्वविद्यालय भी अतिवादी विचारों को बढ़ावा देने के आरोपों से मुक्त नहीं हैं.

इस्लामाबाद में सऊदी अरब की आर्थिक मदद से चलने वाले अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालय की छात्रा आमना शफ़ाक़त कहती हैं कि कुछ शिक्षक तब तक कक्षा में प्रवेश नहीं करते जब तक सब लड़कियां अपने सिर न ढँक लें.

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'पाक टी हाउस' ब्लॉग में एक लेख में उन्होंने लिखा, "सामाजिक अध्ययन में कक्षा में बहस हमेशा ही पाकिस्तान में इस्लामिक राज्य और पर्दे की ओर मुड़ जाती है".

मुश्किल काम

पाकिस्तान में मदरसों का नियमन अधिकारियों को नामुमिकन लगता है. उन्होंने कई बार शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लागू करने की कोशिश की, लेकिन बहुत कम कामयाबी मिली.

9/11 के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के भारी दबाव के बाद पूर्व राष्ट्रपति जनरल (रिटायर्ड) परवेज़ मुशर्रफ़ ने स्कूल पाठ्यपुस्तकों में कुछ नियम लागू करने की कोशिश की.

साल 2004 में जब विदेश मंत्री ज़ुबैदा जलाल ने जिहाद पर क़ुरान की आयतों को किताबों से हटाने की कोशिश की तो उनका भारी विरोध हुआ और अंततः उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

मुशर्रफ़ ने भी एक परियोजना शुरू की थी, जिसमें मदरसों को तभी आर्थिक मदद दी जानी थी जब वह सामान्य विषयों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करते. यह योजना भी नाकाम हो गई क्योंकि मदरसों ने पैसा तो ले लिया लेकिन निगरानी से इनकार कर दिया.

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इस समय पाकिस्तान में 35,000 से ज़्यादा पंजीकृत मदरसे हैं और 8,000 से ज़्यादा के पास उचित दस्तावेज़ नहीं हैं.

मार्च, 2014 में तत्कालीन गृह मंत्री ने एक सुरक्षा पुलिस का प्रस्ताव दिया था, जिसने सभी मदरसों को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के तहत लाने की कोशिश की.

मदरसों में सुधार लाने में पाकिस्तान की नाकामी की वजह ताकतवर मौलवियों के विरोध के साथ ही विदेशों से आने वाले पैसा भी है. पैसे देने वाले इस्लाम की अपनी व्याख्या को बढ़ावा देते हैं और दूसरों को दुश्मन बताते हैं.

विदेशी पैसा

पाकिस्तानी अधिकारी मदरसों को विदेशों, ख़ासकर ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, से मिलने वाले पैसे को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन इस दिशा में बहुत कम सफलता मिल पाई है.

जनवरी में एक केंद्रीय मंत्री ने सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब सरकार पर मदरसों को वित्तीय सहायता के ज़रिए पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने देश के सबसे नज़दीकी सहयोगी के ख़िलाफ़ टिप्पणियों के लिए सफ़ाई मांगी तो अंतर-प्रांतीय समन्वय मंत्री रियाज़ हुसैन पीरज़ादा ने यह कहते हुए माफ़ी मांग ली कि उनकी बातों का ग़लत अर्थ निकाला गया.

ज़्यादातर पाकिस्तानी मदरसे विदेशी धन पर ही ज़िंदा हैं. वे ज़्यादा छात्रों को इसीलिए आकर्षित कर पाते हैं क्योंकि वे मुफ़्त शिक्षा के साथ ही मुफ़्त खाना और आवास भी देते हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि इस वजह से बिना किसी उचित विकल्प के मदरसों में छात्रों के आने को कम नहीं किया जा सकता.

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