अंतरिक्ष यात्रियों पर भी होते हैं कई प्रयोग !

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शायद आपको लगता होगा कि अंतरिक्ष यात्री तो स्पेस में रहते हुए ग्रहों और उपग्रहों की जानकारियां एकत्र करते हैं, तस्वीरें भेजते हैं और कुछ प्रयोग ही करते हैं.

असलियत यह है कि अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस में भेजने का एक अहम मकसद होता है पृथ्वी से कई किलोमीटर दूर, अंतरिक्ष में रहते हुए मनुष्यों पर उन परिस्थितियों का असर देखना.

इसकी एक ख़ास वजह है. यदि मनुष्य को कभी स्पेस में, ग्रहों या उपग्रहों पर लंबे समय तक रहना है, तो ये पता होना ज़रूरी है कि अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने का इंसान पर असर क्या होता है.

लेकिन ख़ुद अंतरिक्ष यात्रियों पर क्या-क्या प्रयोग हो रहे हैं और उन पर हो रहे प्रयोगों के असर पर नज़र कौन रखता है?

अंतरिक्ष यात्रियों के हर पल की हरकत और उन पर हो रहे असर को जांचती है हज़ारों एक्सपर्ट्स की टीम जो नासा के कंट्रोल हब या फिर नासा पेयलोड ऑपरेशन्स इंटेगरेशन सेंटर के नाम से जानी जाती है.

सैन्य अड्डा है कंट्रोल हब

अमरीका के अलाबामा स्थित एक सैन्य अड्डे से संचालित इस कंट्रोल हब में एक समय में आठ पुरुष और महिलाएँ होती हैं. उनकी नज़रें कंप्यूटर मॉनिटर्स पर जमी होती हैं और चेहरों पर आंकड़ों का बोझ स्पष्ट नज़र आता है.

दीवारों पर लगी स्क्रीनों पर पृथ्वी, ग्राफ़, टाइमलाइन इत्यादि दिखते हैं. अलाबामा का ये सेंटर दरअसल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) के वैज्ञानिक प्रयोगों का कंट्रोल हब है जहाँ चौबीसों घंटे काम होता है.

पेलोड कम्यूनिकेशंस मैनेजर सैम शाइन कहती हैं, "हम वैज्ञानिकों और स्पेस स्टेशन के अंतरिक्ष यात्रियों के बीच इंटरफेस का काम करते हैं."

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शाइन उन लोगों में शामिल हैं जो आईएसएस के वैज्ञानिकों से सीधे बात करते रहते हैं.

शाइन कहती हैं, "यह काफी मुश्किल होता है. भाषाई अंतर होता है. टाइम ज़ोन का अंतर होता है. कई बार हमें इटली के अंतरिक्ष यात्री को कोई जानकारी देनी होती है, तो कई बार कोई जर्मन यात्री से जानकारी लेनी होती है."

2011 में 100 अरब डॉलर की लागत से तैयार हुए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में अमरीका, रूस, जापान और यूरोपीय प्रयोगशालाएँ हैं और इसमें काम करने वाले अंतरिक्ष यात्री अब छह महीने से एक साल तक का समय वहां बिताते हैं.

किस तरह के प्रयोग और असर?

शाइन कहती हैं, "आप विज्ञान की किसी भी शाखा का नाम लें, हम उसके किसी न किसी विषय पर ज़रूर रिसर्च कर रहे होंगे. हम यूनीक माइक्रोग्रेविटी रिसर्च लैब से लेकर पौधों के बढ़े होने तक और लिक्विड मेटल की गुणों की समझ तक के बारे में प्रयोग कर रहे हैं."

एक अहम अध्ययन इन परिस्थितियों में बोन और मसल्स वेस्टेज पर हो रहा है.

अंतरिक्ष यात्रियों पर पृथ्वी से बाहर धातु के बक्से में रहने, कृत्रिम भोजन खाने, रिसाइकिल किए मूत्र को पीने और महीनों तक केवल अंतरिक्ष यात्रियों के साथ रहने का असर भी देखा जाता है.

यो वो अहम अध्ययन हैं जिनके बाद तय होगा कि मनुष्य क्या स्पेस में, ग्रहों या उपग्रहों पर रह सकता है और कितनी देर तक?

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इतना ही नहीं, महीनों तक पृथ्वी से दूर रहने से संबंधित मनोवैज्ञानिक पहलुओं के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं.

कई बार इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अंतरिक्ष यात्री शिकायत करते हैं कि उन्हें अच्छा नहीं लग रहा है.

ऐसी सूरत में शाइन कहती हैं, "हम पता करते हैं कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, फिर हम उन्हें कम्फ़र्ट फूड देते हैं, कई बार यह चॉकलेट पुडिंग होती है, इसके बाद फिर उनकी स्थिति देखते हैं."

शाइन के मुताबिक 'कंट्रोल हब' के शोधकर्ताओं की कोशिश होती है कि वे वैज्ञानिकों को घर जैसा महसूस कराएं.

चार महीने में 'होमसिकनेस'

इतना ही नहीं, अंतरिक्ष यात्रियों में घर से दूर रहने का तनाव या होमसिकनेस जैसा भाव उत्पन्न होने लगता है.

शाइन कहती हैं, "मिशन के चौथे महीने में अंतरिक्ष यात्री घर लौटना चाहता हैं. वे स्पेस स्टेशन में रहकर थक जाते हैं और अपने परिवार वालों से मिलना चाहते हैं."

नासा के ज़्यादातर अभियान अब छह महीने से लेकर साल भर के होते हैं. नासा इसलिए अब ज़्यादा चाकलेट पुडिंग भेजने पर विचार कर रहा है.

इतना ही नहीं अलाबामा में बैठने वाली टीम को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अंतरिक्ष यात्रियों की इधर-उधर गुम हो चुकी चीज़ों पर भी नज़र रखनी होती है.

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शाइन कहती हैं, "यह स्पेस प्रोग्राम का सबसे मुश्किल काम होता है."

शाइन के मुताबिक अंतरिक्ष यात्री अपना सामान जब इधर-उधर रख बैठते हैं और भूल जाते हैं. मानिए एक ज़रूरी रेंच या प्लास इधर-अधर हो जाए, या फिर स्पेस शिप की चाभी ही इधर-उधर हो जाए?

शाइन कहती हैं, "ज़्यादातर समय हमें चीजें सुराखों में फंसी हुई मिलती हैं. लेकिन "

जाहिर है कि एक अंतरित्र यात्री के साथ में हज़ारों सपोर्ट स्टॉफ़ काम कर रहे होते हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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