ऐसे बना रहा है ब्रिटेन स्मार्ट सिटी

साभारः बर्मिंघम सिटी काउंसिल इमेज कॉपीरइट birmingham city council

भारत में मोदी सरकार ने भारत के सौ शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की जो घोषणा की है, उसने जनसाधारण के मन में एक कौतूहल पैदा किया है कि आख़िर एक शहर स्मार्ट बन जाएगा तो वहाँ क्या हो जाएगा.

स्मार्ट शहर क्या होता है इसका एक अंदाज़ा मिलता है ब्रिटेन से, जहाँ कई शहरों को स्मार्ट बनाने की कोशिश चल रही है.

इनमें राजधानी लंदन के अलावा बर्मिंघम, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, लीड्स, लेस्टर, लिवरपूल, ग्लास्गो और एडिनबरा जैसे शहर शामिल हैं.

यानी लंदन, जो कि दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिने जानेवाले देश ब्रिटेन की राजधानी है, वो भी स्मार्ट सिटी नहीं है. ऐसा कैसे?

वीडियोः ये स्मार्ट सिटी क्या होती है

ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट सुनंद प्रसाद कहते हैं, ”स्मार्टनेस देखने की चीज़ नहीं है, वो अंदरूनी चीज़ है. जैसे मुंबई के डब्बेवाले, वो स्मार्टनेस का एक उदाहरण है.

अगर आप उनके काम के तरीक़े को एक जटिल सिस्टम पर लागू कर दें, जैसे किसी शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम, और उसमें आप डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर उसे बहुत कारगर बना दें, तो वो स्मार्ट होगा.”

स्मार्ट बनाना

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किसी शहर को स्मार्ट बनाने के लिए क्या-क्या किया जाता है इसकी एक झलक मिलती है ब्रिटेन के दूसरे बड़े शहर बर्मिंघम से जहाँ में स्मार्ट सिटी को स्मार्ट बनाने की कोशिश शुरू हुई 2012 में.

पहले योजना का एलान हुआ और उसके बाद बर्मिंघम की नगरपालिका ने इस दिशा में काम शुरू किया. सबसे पहले उसने एक स्मार्ट सिटी कमीशन का गठन किया.

फिर तरह-तरह के अध्ययन और विशेषज्ञों से विचार-विमर्श हुए, और फिर शुरू हुआ बर्मिंघम को स्मार्ट बनाने का अभियान.

बर्मिंघम स्मार्ट सिटी कमीशन की अध्यक्ष काउंसलर लीसा ट्रिकेट ने बताया, ''हमने एक रोडमैप तैयार किया, उसमें 39 लक्ष्य चुने, जिनमें से अधिकतर को प्राप्त कर लिया गया है, जैसे सिटी सेंटर में, सरकारी दफ़्तरों में मुफ़्त वाइ-फ़ाइ उपलब्ध कराना, पार्किंग को बेहतर करना आदि.''

चुनौतियाँ

स्मार्ट सिटी योजना का सबसे बड़ा आधार थी – नई डिजिटल तकनीक.

बर्मिंघम स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तकनीकी पक्ष का ख़ाका खींचने वाले राज मैक कहते हैं कि स्मार्ट सिटी की परिकल्पना में उन नागरिकों का भी ध्यान रखा गया है जो स्मार्ट तकनीक से परिचित नहीं हैं, लेकिन फ़िलहाल चुनौती दूसरे तरह की है.

वे कहते हैं,”एक बड़ी चुनौती लोगों को जोड़ने की है. ऐसे लोग हैं, जिनके पास स्मार्ट फ़ोन है, और उन्हें लगता है कि वे डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल जानते हैं, क्योंकि वे फ़ेसबुक-ट्विटर आदि के बारे में जानते हैं, मगर डिजिटल तकनीक इससे कहीं ज़्यादा चीजें दे सकती है.”

राज इस बात पर बल देते हैं कि स्मार्टनेस का मतलब ये है कि लोग सुविधाओं का कैसे अलग तरीके से इस्तेमाल कर सकें, और अगर तकनीक इसमें मदद करती है, तो वो स्मार्ट होगा.

शहर की सूरत

स्मार्ट शहर कैसा दिखेगा – शायद इस सवाल का उत्तर ढूँढते मन में एक अति आधुनिक, चमकते-दमकते, साफ-सुथरे, सुविधाओं से लैस शहर की कल्पना जन्म लेती होगी.

तो क्या भारत में जो 100 स्मार्ट शहर होंगे वो भी ऐसे ही दिखने लगेंगे?

सुनंद प्रसाद कहते हैं कि अगर ऐसा किया गया तो ये बहुत बड़ी ग़लती होगी.

वे कहते हैं, ''हर शहर की एक अपनी आत्मा होती है, अगर आप वो देंगे तो उसे लौटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा, ऐसा लगने लगेगा कि आप किसी फ़ैक्ट्री में रह रहे हैं.''

सुनंद बताते हैं कि स्मार्ट सिटी की सोच में एक अच्छी बात ये है कि शहर के मूल चरित्र को नहीं बदलती, ये बिना दिखे शहर को स्मार्ट बनाती है.

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