'फ़ूड कैप्सूल' खाने का झंझट ख़त्म कर देगा?

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आपने विज्ञान से जुड़ी ऐसी कहानियां जरूर सुनी होंगी कि एक दिन ऐसा आएगा जब लोग दिन भर में खाने की जगह एक कैप्सूल खाकर ही पेट भर लेंगे और काम चल जाएगा.

कैप्सूल जैसे ही जीभ पर रखेंगे, भूख तुरंत शांत हो जाएगी. यानी एक कैप्सूल से दिन के तीनों समय का भोजन मिल जाएगा.

1930 में साइंस फिक्शन म्यूज़िकल फ़िल्म जस्ट इमेजिन में ऐसी कल्पना दिखाई गई थी.

एक आदमी पचास साल कोमा में रहने के बाद 1980 में नींद से उठता है. जब वह न्यूयॉर्क शहर में बाहर निकलता है तो देखता है कि लोग एक दूसरे को केवल नंबर से पहचानते-पुकारते हैं.

उसके पुराने दोस्त उसे एक कैफे में ले जाते हैं जहां उसके लिए रोस्ट बीफ़, चकुंदर, एसपैरेगस, पाइ और कॉफ़ी मांगवाए जाते हैं.

लेकिन ये सब कुछ एक कैप्सूल की शक्ल में है, जिसे वह कुछ प्रोत्साहन के बाद खाता है और कहता है कि 'मांस कुछ कम भूना रह गया.' और वह पुराने दिनों के खानों की बातों में खो जाता है.

बहरहाल कैप्सूल के तौर पर भोजन का ज़िक्र विज्ञान के लेखकों की बातों में कम, उस समय की राजनीति में ज़्यादा मिलता है.

1893 से शुरु हुई चर्चा

इस विषय पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा 1893 में शुरु हुई और इसका संबंध महिलाओं के अधिकारों के आंदोलन से भी था.

शिकागो में 1893 में आयोजित वर्ल्ड फेयर में अमरीकी प्रेस एसोसिएशन ने लेखकों को जिस विषय पर निबंध लिखने को कहा, वो था- '1993 में दुनिया कैसी होगी.'

अमरीका में महिलाओं को मताधिकार देने के लिए आंदोलन करने वाली लेखक मेरी एलिजाबेथ लीज़ ने पूर्वानुमान लगाया कि 1993 तक लोग 'सिंथेटिक' यानी कृत्रिम भोजन ही ख़ाने लगे हैं और औरतें किचन में खाना नहीं बनाएंगी.

इस तरह किचन में जाने, खाना पकाने और कुक रखने की समस्या हल हो जाएगी.

1887 में प्रकाशित 'द रिपब्लिक ऑफ़ द फ़्यूचर' में रूढिवादी विचारों से प्रभावित अन्ना डॉड ने 2050 के न्यूयॉर्क की तस्वीर पेश करते हुए कैप्सूल के जरिए भोजन की बात की खिल्ली उड़ाई और उन महिलाओं की भी, जो किचन में ज़्यादा समय नहीं बिताना चाहती थीं.

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इस शताब्दी की शुरुआत में यह आशंका भी जताई जाने लगी कि जिस रफ्तार से आबादी बढ़ रही है उसे देखते हुए दुनिया भर के लोगों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होगा. 1920 और 1930 के बीच पापुलर मीडिया में इस तरह की कई ख़बरें छपीं और साथ ही 'फ़ूड पिल या कैप्सूल' ही एक मात्र विकल्प है, इसके बारे में भी ख़ूब लिखा गया.

1926 में एक अमरीकी अख़बार ने इसी कल्पना पर कार्टून सीरीज़ प्रकाशित की थी. एक कार्टून दिखाया गया कि एक मज़दूर ने 'फ़ूड पिल' के लिए जेब में हाथ डाला और पाया कि वो तो उसे घर में ही भूल गया है. इसी तरह से पार्टियों में, मित्रों के डिनर में 7-8 'फ़ूड पिल' खरीदते और परोसते हुए लोग दिखाए गए जिनमें आठ चिकन या अन्य खाद्य पदार्थ समाए हुए हों.

कार्टूनों में ही गृहणियों को उन दिनों को याद करते दिखाया गया जब गंदे बर्तन इकट्ठा हो जाते थे और उन्हें साफ़ करना होता था.

विज्ञान से उम्मीद

1933 में शिकागो वर्ल्ड फेयर का थीम था- 'विज्ञान खोज करता है, उद्योग आपूर्ति करेगा और मनुष्य उसके अनुरूप चलता है.'

ऐसा आम तौर पर माना जाने लगा कि एक दिन मनुष्य उस मुकाम तक पहुंचेगा जहां पर भोजन एक कैप्सूल से पूरा हो पाएगा.

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2006 में प्रकाशित किताब मील्स टु कम: ए हिस्टरी ऑफ़ द फ्यूचर ऑफ़ फूड में वारेन बेलास्को ने कहा, "बहुत लोग उम्मीद जता रहे हैं कि उन्हें कभी भोजन के लिए कैप्सूल पर निर्भर नहीं होना होगा लेकिन अगर विज्ञान कोई विकल्प सामने लाता है तो आने वाली पीढ़ी उसे अपनाएगी ही."

हालांकि 1960 के बाद जिस तरह से अंतरिक्ष में इंसानों की रेस का सिलसिला शुरू हुआ, उसे देखते हुए कैप्सूल वाले भोजन को इस दिशा में विज्ञान का अगला महत्वपूर्ण क़दम माना जाने लगा.

ऐसा पूर्वानुमान लगाया जाने लगा कि अंतरिक्ष यात्रियों को भोजन एक तरह से कैप्सूल के फॉर्म में ही दिया जाएगा.

पृथ्वी पर ऐसी ही कोशिशें शुरू हो गईं और डी-हाइड्रेटिड और कन्डेंस्ड फूड एक तरह से कैप्सूल वाले खाने की ओर ही उठाए गए कदम थे.

कॉमिक्स में भी चर्चा

टीवी के आने और कोल्ड वार के डर से भी फूड सिक्योरिटी का मसला फिर से उभरने लगा. उदाहरण के लिए 'अवर न्यू एज़' नाम की साप्ताहिक कॉमिक स्ट्रिप दुनिया भर के 110 अख़बारों में 1958 से 1975 तक प्रकाशित हुई.

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इसके 1965 के एक अंक में दुनिया भर में भोजन के संकट का हल सिंथेटिक फूड को बताया गया था. इस कॉमिक स्ट्रीप के अलग अलग पैनल में अलग अलग दौर के भोजन को चित्रित किया गया था.

एक पैनल में 9000 साल पुराने जमाने का कार्टून था, जिसमें आदमी को शिकार करते हुए दिखाया गया था, दूसरे पैनल में सिंथेटिक फूड को आधुनिक खेती का अगला कदम बताया गया था.

इसके आखिरी पैल में बताया गया था कि रासायनिक फैक्ट्रियों में बनने वाले भोजन से दुनिया भर में कहीं भी होने वाली भोजन की कमी को पूरा किया जा सकेगा.

तब कॉफी का क्या होगा?

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1928 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति हर्बट हूवर के चुनाव जीतने की सबसे बड़ी वजह था उनका वादा- ''हर थाली में चिकेन.'' इसकी 1960 के दशक में प्रत्येक जेब में भोजन कैप्सूल देने से तुलना की जाने लगी.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डॉ मिल्टन ए ब्रिजिस ने 1936 में लिखा, "इंसान कभी भोजन के तौर पर कैप्सूल नहीं खाएँगे. कैप्सूल से उपयुक्त कैलोरी की मात्रा कभी मिल ही नहीं सकती है. कैप्सूल के ज़रिए विटामिन और मिनरल तो खाना संभव है, लेकिन जब तक आप असल खाना नहीं खाएँगे, आपको पर्याप्त कैलोरी मिल नहीं सकती हैं."

ऐसा प्रतीत होता है कि 'फ़ूड पिल' पर चर्चा जो भी हो, असलियत यही है.

1944 में मिसौरी स्थित विमेंस क्लब में आयोजित डिनर का नाम - 'वर्ष 2000' रखा गया. इसमें अलग कैप्सूल का मैन्यू रखा गया - टूटी-फ़्रूटी, मीट का ब्राउन पिल, मीठे का चॉकलेट पिल. लेकिन इस पार्टी की दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के बाद महिलाएँ ख़ुद को कॉफी और सैंडविच खाने से नहीं रोक पाईं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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