'यूलिया जैसे यूरोपीयों की हिंदी फ़िल्मों में रुचि?'

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डीडीएलजे (दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे) जब आई थी तब हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में रहने वाली यूलिया सिवाक पांच साल की थीं.

अब वो बुडापेस्ट विश्वविद्यालय के इंडोलॉजी विभाग की छात्रा हैं. पहले वो हिंदी फ़िल्मों के पोस्टर ताकती रहती थीं, फिर उन्होंने हिंदी पढ़ना इसलिए शुरू किया कि हिंदी फ़िल्मों को समझ सकें.

समझ

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यूलिया ख़ूब हिंदी फ़िल्में देखती हैं. लंबे समय तक चली उथल पुथल के कारण हंगेरियन ज़िंदगी पर उदासी की परछाई आसानी से महसूस की जा सकती है.

हंगरी के बारे में कहा जाता है कि वहां के लोग अपनी भाषा के सिवा और कुछ नहीं बोलते, अपने मुल्क के खाने के सिवा और कुछ नहीं चाहते.

यूलिया वहां की नई पीढ़ी की लड़की हैं. उन्हें हिंदी फ़िल्में इसलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि फ़िल्म के अंत में हीरो-हीरोइन मिल जाते हैं, मतलब सब कुछ अच्छा हो जाता है.

वह भारत को समझना चाहती हैं.

दिलचस्पी

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यूलिया से मेरी मुलाकात पोलैंड के क्राकोव शहर में आयोजित मॉड्रन हिंदी वर्कशाप-2015 में हुई जहां वो अपनी शिक्षिका मारिया नगेशे के साथ आई थीं.

वर्कशॉप में फ्रांस, इटली, जर्मनी, स्वीडन, स्विटज़रलैंड, रूस, हंगरी और भारत से आए युवाओं को हिंदी साहित्य के सहारे भारतीय जीवन का स्पर्श कराने की कोशिश कर रही थीं.

संवेदना, उच्चारण, अर्थबोध के संस्कारों और साहित्य के प्रति नज़रिए में अंतर के कारण दिलचस्प स्थितियां बनती थीं, कभी कार्यशाला में ठहाके लगते कभी सन्नाटा छा जाता था.

बॉलीवुड पश्चिम की नकल करने और फ़ार्मूला फ़िल्में बनाने के लिए बदनाम ज़रूर है, फिर भी यही फ़िल्में यहां सबसे पहले और सबसे अधिक लोगों तक पहुंचती हैं.

बॉलीवुड ही भारत के प्रति दिलचस्पी पैदा करने में अहम भूमिका निभाता है.

संवाद

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वारसॉ विश्वविद्यालय में साउथ एशियन स्टडीज की विभागाध्यक्ष, दानूता स्तासिक कहती हैं, "पोलैंड में बॉलीवुड फ़िल्मों के पहुंचने के बाद से हिंदी में दाख़िला लेने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी है. हिंदी हमारे लिए भारत की आत्मा तक पहुंचने का ज़रिए है.''

इटली के तूरीनो विश्वविद्यालय से हिंदी उपन्यास और उत्तर आधुनिकता पर शोध कर रही वेरोनिका गेरार्दी का कहना है, "मैं पहली बार भारत में बनारस गई तो मुझे वह बहुत सुंदर और दिलचस्प जगह लगी. भारत के बारे में अधिक जानने के लिए हिंदी पढ़ रही हूं, क्योंकि भाषा के बिना किसी जगह को अच्छी तरह जान पाना संभव नहीं है."

इसी विश्विद्यालय में हिंदी की प्रोफ़ेसर अलेसांद्रा कॉन्सेलारो ने बताया, "मैंने क्लासिकल भारत को जानने के लिए संस्कृत सीखी थी, लेकिन उसके ज़रिए वहां के आम लोगों से संवाद संभव नहीं था इसलिए हिंदी पढ़नी पड़ी. अब पढ़ा रही हूं."

मक़सद

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इस वर्कशॉप में बहुतेरे युवाओं से मेरी मुलाक़ात हुई जो फ़िल्मों के अलावा योग, महाभारत, अध्यात्म, दर्शन, पंचतंत्र और जातक कथाओं के सहारे पुराने भारत को जानना चाहते हैं.

उन्हें इस बात का गहरा अहसास है कि सिर्फ भौतिक तरक्की और तकनीकी विकास से ज़िंदगी नहीं चल सकती. शायद कई भीतर के खालीपन में संतोष और खुशी भरने के लिए भारत को समझना जरूरी मानते है.

वे इस दिशा में हिंदी के ज़रिए बढ़ रहे हैं, नतीज़ा क्या होगा- राम जाने !

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वर्कशॉप के आयोजक प्योत्र बोरेक का कहना है, "हमारा बड़ा मक़सद भारत के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाना है, इसके लिए हमने यूरोप के इंडोलॉजी विभागों के हिंदी के अलग-अलग विषयों पर काम करने वालों और हिंदी लेखकों को एक जगह इकट्ठा किया है."

क्रॉकोव की याग्येलोनियन यूनिवर्सिटी में प्योत्र बोरेक सत्रहवीं सदी के ब्रजभाषा के कवि भूषण पर शोध कर रहे हैं.

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