तीसरी बार घटाया गया युआन का मूल्य

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मंगलवार को युआन की क़ीमत 1.9 प्रतिशत कम करने के बाद, चीन के सेंट्रल बैंक ने बुधवार को फिर मुद्रा के मूल्य को एक प्रतिशत घटा दिया.

बुधवार के फ़ैसले के बाद एक अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले युआन की क़ीमत 6.33 पर पहुंच गई.

ताज़ा फैसले के बाद एशियाई बाज़ारों में हलचल और बढ़ गई है.

दो दिनों में हुई गिरावट के साथ युआन पिछले दो दशक में डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर आ गया है.

चीनी सरकार ने इसे निर्यात को बढ़ावा देने वाला क़दम बताया है. चीनी अर्थव्यव्यवस्था फ़िलहाल कमज़ोर दौर से गुज़र रही है.

निर्यात में गिरावट

पिछले सप्ताह के अंत में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार जुलाई में चीन के निर्यात में पहले के मुक़ाबले क़रीब आठ प्रतिशत की कमी आई है.

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वहीं जुलाई में औद्योगिक उत्पादन भी पिछले साल के मुकाबले छह प्रतिशत ही बढ़ा जो कि उम्मीद से कम था.

चीन के वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी ज़ैंग युज़हॉन्ग ने कहा, "''मुझे लगता है कि व्यापार और निवेश पर अभी इसका बहुत साफ असर नहीं दिखेगा. मेरा मानना है कि पहले की तरह युआन की कीमत में की गई कमी निर्यात को बढ़ावा देने में मदद करेंगे.''

माना जा रहा है कि चीन के इस क़दम से वैश्विक स्तर पर मुद्रा को अवमूल्यन का दौर शुरू हो जाएगा.

अमरीका ने चीन के इस क़दम की आलोचना की है. अमरीकी शेयर बाज़ारों में इस कारण से भारी गिरावट देखी गई.

लेकिन चीन के इस क़दम का चीनी निर्यातकों ख़ासकर टेक्सटाइल और कार कंपनियों को फायदा होगा.

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बड़ा बदलाव नहीं

अर्थशास्त्री जियोफ लुइस कहते हैं, ''जो भी बदलाव हुए हैं उसे बहुत ही बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. यह बहुत बड़ा अवमूल्यन नहीं है, कम से कम एक अर्थशास्त्री की नज़र से तो नहीं. प्रमुख मुद्राएं इससे भी ज़्यादा के दर से रोज़ घटती—बढ़ती हैं. मुश्किल केवल यह है कि हमें युआन के स्थिर रहने की आदत पड़ गई है.''

अमरीका और अन्य देशों की सरकारों को शिकायत रही है कि चीन युआन के मूल्य को जानबूझ कर कम रखता है ताकि उसे निर्यात में फ़ायदा हो.

लेकिन इससे विदेशी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को घाटा उठाना पड़ता है. पश्चिमी देश मांग करते रहे हैं कि चीन युआन की दर बाज़ार से तय होने दे.

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भारत पर असर

भारत अपने पड़ोसी चीन से हर साल लगभग 60 अरब डॉलर का आयात चीन से करता है.

मुद्रा के अवमूल्यन के बाद अब उन कंपनियों को थोड़ा कम पैसा देना होगा जो चीन से सामान खरीदती हैं. भारत में इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनियां चीन से बड़ी मात्रा में पुर्जे आयातित करती हैं. इसलिए भारत के आयातक अब मूल्यन से ख़ुश ही होंगे.

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका फ़ायदा ग्राहकों को शायद ही मिल पाए.

लेकिन ऐसे कई अन्य क्षेत्र भी जिनमें भारतीय निर्यातक चीन से प्रतिद्वंदिता करते हैं.

भारत के कपड़ा निर्माता और कैमिकल उत्पादकों को अब वैश्विक बाज़ार में चीन से ज़्यादा चुनौती मिल सकती है.

ये भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि भारत का निर्यात पिछले सात महीनों से लगातार गिर रहा है.

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