'हर साल आज़ादी का नया पैग़ाम कहाँ से लाएँ'

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ट्रैफ़िक सिग्नल पर टहलते जब्बू के छोटे छोटे हाथों में बहुत से छोटे छोटे तिरंगे थे. जैसे ही बत्ती लाल होती, जब्बू रुकने वाली गाड़ियों की तरफ़ दौड़ पड़ता.

"आज़ादी ले लो, सिर्फ़ दस रुपए में, दस रुपए में आज़ादी का तिरंगा, बस दस रुपए में..."

एक कार में बैठी चुन्नी मचल जाती है, "मम्मा! मुझे भी आज़ादी का झंडा लहराना है..."

मम्मा शीशा नीचा करके जब्बू को इशारा करती हैं, "ए बच्चे! इधर आना."

'मैं गांधी जी नहीं हूँ'

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जब्बू झट उन्हें एक तिरंगा पकड़ाते हुए कहता है, "आंटी जी एक और ले लो ना...आज तो ख़ुशी का दिन है. मैंने अपनी अम्मी और बहन से कहा है कि आज शाम तुम्हें आज़ादी की ख़ुशी में ढाबे पर भरपेट खाना खिलाऊँगा."

आंटी जी ने शीशा चढ़ाते हुए कहा, "बेटा! मैं गांधी जी नहीं हूँ." और सिग्नल फिर हरा हो गया.

जब्बू किनारे पर खड़ा बाजू से माथे का पसीना पोछते हुए फिर से हरी बत्ती लाल होने का इंतजार करने लगा.

जेल में आज़ादी का दिन

जेल में आज कैदियों को सुबह सुबह पाँच लाइनों में खड़ा कर दिया गया. जेलर साहब ने झंडा बुलंद किया. जैसे ही उसमें से गुलाब की पत्तियाँ गिरने लगीं, क़ैदियों और सिपाहियों ने चाँद-तारे वाले हरे झंडे को अटेंशन होकर सैल्यूट मारा.

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जेलर साहब ने माइक में हल्लो हल्लो टेस्टिंग करने के बाद कहा, साथियों हमारे लाखों बुज़ुर्गों ने जान की क़ुर्बानी दी, तब कहीं जाकर हमें आज़ादी का ये दिन नसीब हुआ.

सिपाहियों और क़ैदियों ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं. फिर जेलर साहब ने कहा, आज तमाम क़ैदियों को आज़ादी की ख़ुशी में सरकार की तरफ़ से खाने में पुलाव और क़बाब मिलेगा...असेंबली डिस्मिस.

क़ैदी अपनी अपनी खोलियों की तरफ़ लाइन बनाकर आहिस्ता आहिस्ता चल पड़े.

आज़ादी से क्या मिला?

मैंने मुख्यमंत्री जी के दफ़्तर फ़ोन करके उनके पीए से पूछा, भाई कौम के लिए स्वतंत्रता दिवस का संदेश कब तक भिजावाओगे, अख़बार की कॉपी भी प्रेस में आज जल्दी भेजनी है. पीए ने कहा, एक मिनट होल्ड कीजिए.

दो मिनट बाद पीए ने कहा, वुसत जी, मुख्यमंत्री जी कह रहे हैं कि पिछली बार का पैग़ाम ही छाप दें. हर साल नया पैगाम कहाँ से लाएँ? और फ़ोन बंद हो गया.

मैंने सफ़ेद बालों वाले ज़िया साहब के सामने माइक्रोफ़ोन ऑन करते हुए पूछा, आज़ादी ने आपको क्या दिया?

ज़िया साहब ने गला साफ़ करते हुए कहा, हमें अंग्रेजों और हिन्दुओं की ग़ुलामी से मुक्ति मिली. अपना आज़ाद वतन मिला. पिताजी एक जोड़ा कपड़े में ट्रेन की छत पर बैठकर यहाँ पहुंचे थे. आज हम देश के तीसरे बड़े चावल निर्यातक हैं. तो ये है आज़ादी का फल.

इतने में ज़िया साहब के मेज पर रखा इंटरकॉम बजा. ज़िया साहब ने मुझसे क्षमा माँगते हुए इंटरकॉम उठाया...हाँ मैंने कहा था कि न कि मैं मीटिंग में हूँ. हाँ, तो ठीक है न, शफ़ीक के हाथ टैक्स कलेक्टर के यहाँ हरा वाला पैकेट भिजवा दो और उसपर मार्कर से बड़ा बड़ा यौमे आज़ादी मुबारक ज़रूर लिखवा देना, भूलना नहीं. और प्लीज अब मुझे डिस्टर्ब न करना.

माफ़ी चाहता हूँ वुसत साहब, हाँ तो मैं कह रहा था अगर ये मुल्क न बनता तो बनिए तो हमें लूट कर खा ही जाते. क्या समझे? और मैं बस जी! जी! करता रहा.

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