'भारत में आर्थिक मंदी नहीं आ रही है'

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चीन के शेयर बाज़ार के धराशाई होने और चीनी केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के बाद बहुत से लोगों के मन में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.

एक देश जो इस मुश्किल घड़ी में भी मजबूती से खड़ा लगता है वह है भारत. हालिया वित्तीय संकट से देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का श्रेय आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन को दिया जाता है.

वो कहते हैं कि भारत चीन से आने वाली मंदी से मुक्त नहीं है.

बीबीसी की एशिया बिज़नेस रिपोर्टर करिश्मा वासवानी ने उनसे पूछा कि क्या चीनी अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर नहीं देखा जा रहा है?

'97 जैसा संकट नहीं'

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इस पर वो कहते हैं, ' स्टॉक मार्केट आगे की ओर देख कर चलता है. मुझे लगता है कि उन्हें चीन की आर्थिक रफ़्तार में सुस्ती नज़र आई है. लोगों ने इसी पर प्रतिक्रिया की है.''

मुझे लगता है कि इसके बहुत से कारण हैं और वह सभी चीन के भविष्य को नहीं दर्शा रहे. उनकी सात फ़ीसदी वृद्धि दर के साथ बहुत से लोगों को यह ठीक ही लगता है.''

उन्होंने कहा कि अब तक मैंने जो देखा है उसके बाद यह कहने का कोई मज़बूत आधार नहीं है कि हम 1997 जैसे बड़े आर्थिक संकट के कगार पर हैं.

पिछले कुछ सालों में जो कमज़ोरियां विकसित हुई हैं, हमें उन पर नज़र रखनी चाहिए और उनसे सीधा मुकाबला करना चाहिए.

अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव

अभी तक यह साफ़ नहीं है कि आंकड़े क्या कह रहे हैं क्योंकि इनका सामने आना अभी बाकी है.

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लेकिन चीन एक बड़ा देश है जो विश्व की अर्थव्यवस्था में काफ़ी महत्वपूर्ण बन गया है. आज दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई गड़बड़ होती है तो पूरी दुनिया पर उसका कुछ न कुछ असर पड़ता है.

यह असर पहले वित्त बाज़ार पर पड़ता है और उसके बाद व्यापार पर. इसलिए इसे लेकर सबको चिंतित होना चाहिए.

मुझे लगता है जो भी हो रहा है उसे चीन से जोड़ने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए. विश्व अर्थव्यवस्था में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जिनके बारे में चिंता की जानी चाहिए.

इनमें यह भी शामिल है कि दरें कब सामान्य होती हैं - फ़ेडरल रिज़र्व यह करने वाला पहला बड़ा संस्थान हो सकता है. तो सवाल यह भी है कि ऐसा कब होगा.

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बहुत से बाज़ारों के स्तर पर भी सवाल हैं कि क्या वो बहुत ज़्यादा ऊंचाई पर पहुंच गए हैं?

चीन की जगह भारत?

भारत चीन के मुकाबले आकार में एक चौथाई या 1/5 है.

ऐसे में अगर हम विकास दर के मामले में चीन से आगे भी निकल जाएं तो भी इसका मात्रात्मक असर बहुत समय तक बहुत कम रहेगा.

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