जिसे वक़्त न गिरा सका, आईएस ने उड़ा दिया

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सीरिया का पल्माइरा लाल रेत के बीच खजूर के पेड़ों की हरियाली और यूनानी शैली की विशाल इमारतों का प्राचीन शहर है, लेकिन अब ये शहर वहां इस्लामिक स्टेट का क़ब्ज़ा होने और एक प्राचीन मंदिर को उड़ा देने के कारण सुर्ख़ियों में है.

पुराने दौर में ये शहर सौदागरों की आरामगाह था और ओल्ड सिल्क रूट के कारोबार में ख़ास अहमियत रखता था.

रोमन साम्राज्य से पहले और फिर उसके दौर में पल्माइरा कारोबारी नगर और सभ्यता संस्कृति का आंगन बन कर उभरा.

डॉ अली ख़ान महमूदाबाद सीरिया के जानकार हैं और पल्माइरा जा चुके हैं.

ख़ान बताते हैं, "बहुत ही ख़ूबसूरत इलाक़ा है, धरती लाल है, खजूर के पेड़ हैं जिनसे हरियाली आती है, एक छोटा सा पहाड़ है जिस पर एक यहूदी शहज़ादे का क़िला था. उसका नाम था फखरूद्दीन अलनानी. यूरोप अफ़्रीका, अरब दुनिया, दक्षिण एशिया इन सब के लिए ये पूरा इलाक़ा एक चौराहे जैसा था, जब ज़मीन के रास्ते से कारोबार होता था तो वहां से काफ़िले गुज़रते थे."

धर्म बदला लेकिन मंदिर खड़ा रहा

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Image caption पल्माइरा की ध्वस्त इमारत

बीती 19 सदियों में वक्त के साथ बदलती राजनीति और भौगोलिक दशाओं की मार झेल कर भी पल्माइरा में जो कुछ ज़िंदा बचा रहा वो अब इस्लामिक स्टेट के हाथों ख़त्म हो रहा है.

इस बात पर अभी विवाद है कि बालाशमीन मंदिर एक महीने पहले बारूद से उड़ाया गया या पिछले दिनों ही, लेकिन 1000 से ज्यादा ऊंचे खंभों और विशाल मेहराबों वाले मंदिर का ज़्यादातर हिस्सा अब धूल में मिल चुका है, ये ख़बर पक्की है.

दुनिया भर के सैलानी उस धर्म से जुड़ी इमारत को देखने आते थे जिसके अस्तित्व के निशान ढूंढने के लिए कम से कम 1500 साल पीछे जाना होगा.

ईसाइयत और इस्लाम आने के बाद धर्म तो बदल गया लेकिन मंदिर खड़ा रहा.

डॉ अली ख़ान बताते हैं, "ये बालशमीन का मंदिर उत्तर पश्चिमी के यहूदी देवता का था. इस इलाक़े में एक ही ईश्वर को अलग अलग नामों से जाना जाता था. जो नाम बहुत मशहूर हुआ वो हज्जाद का था. बालशमीन दो सर्वोच्च देवताओं में एक थे. दूसरे देवता का नाम बेल था. ये देवता इस्लाम से पहले के युग के थे. इस पर अब भी विवाद है कि बालशमीन सूरज भगवान को कहा जाता था या फिर बारिश के देवता को.’’

बारूद बिछा दिया

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दो हज़ार साल पुरानी इमारत के अवशेषों को मिटाने के लिए इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने ढेर सारा बारूद ख़र्च किया आख़िर इन लोगों की इस ऐतिहासिक इमारत से क्या दुश्मनी है?

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं, ’’वो आतंक फैलाते हैं. सिर काट कर, औरतों को बेच कर, सिर काटने की तस्वीरें दिखा के. आतंक से इन्हें बहुत फ़ायदा हुआ है. हमेशा से ऐसी संस्थाएं जिन्हें समाज का बहुत समर्थन नहीं मिलता, जो चुनाव के ज़रिए जीत कर सत्ता में नहीं आते, वो आतंक और दहशत के जरिये सत्ता हासिल करते हैं."

आग़ा ने कहा, "पहले ये प्रयोग तालिबान ने किया, अब आईएस कर रहा है. उनके बड़े बड़े ग्रुप हैं जो सोशल मीडिया के जरिए उनकी बातों को फैला रहे हैं. यूरोप से लड़के लड़कियां उनके पास भर्ती होने रहे हैं.’’

इसी साल मई के महीने में जब इस्लामिक स्टेट ने पल्माइरा पर क़ब्ज़ा किया तभी से शहर के भविष्य को लेकर आशंकाएं उठने लगी थीं.

तालिबान ने सालों पहले बामियान में बुद्ध की विशाल मूर्तियों को मिटाने से जो सिलसिला शुरू किया वो अब इस्लामिक स्टेट के हाथों इराक़ी शहर मोसुल और निमरूद के विशाल म्यूज़ियम, लाइब्रेरी की तबाही के रूप में सामने आया.

युद्ध अपराध है

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संयुक्त राष्ट्र ने बालशमीन मंदिर को उड़ाना युद्ध अपराध माना है लेकिन जानकार इसे सिर्फ़ ताकत का प्रदर्शन या इस्लामी शुद्धता को लागू करने की सनक नहीं मानते.

क़मर आगा इसकी कारोबारी वजहें भी बताते हैं, ’’ये एक कारोबार भी बन गया है. बड़ी बड़ी इमारतें तो गिरा देते हैं लेकिन छोटी छोटी मूर्तियां और दूसरी चीजों को बचा लेते हैं. मोसुल और दूसरी जगहों पर हमने देखा कि ये उन्हें बेचते हैं. पैसे के लिए ये दूसरे काम भी करते हैं. नशीली दवाओं का कारोबार, महिलाओं को बेचना ये सब इसमें शामिल है.’’

चार दशक तक पल्माइरा के विशाल खंबों की ओट में रह कर उन्हें संवारते रहने वाले आर्कियोलॉजिस्ट खालिद अल असद का इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने सिर काट कर चौराहे पर टांग दिया लेकिन उन्होंने उन छोटी छोटी अनमोल मूर्तियों का पता नहीं बताया जो वहां से पहले ही हटा दी गई थीं.

यूनस्को की धरोहर

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Image caption पल्माइरा का एरियल व्यू

बालशमीन मंदिर को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहरों में शामिल किया था.

डॉ अली खान बताते हैं, "सीरिया में इस समय यूनेस्को की छह विश्व धरोहर हैं जिन में से पांच को वहां चल रही जंग और गृह युद्ध के कारण नुकसान उठाना पड़ा है. इनमें अलेप्पो का क़िला भी एक है. बालशमीन मंदिर जैसे बहुत कम ऐसे नमूने बचे हैं जिनसे गुजरे ज़माने के धर्म और समय को जाना जा सकता है.’’

बालशमीन के मंदिर को देखने हर साल डेढ़ लाख से ज्यादा सैलानी यहां पहुंचते हैं.

इस्लामिक स्टेट के शासन में कोई यहां आने का जोखिम तो यूं भी नहीं उठाएगा, लेकिन अगर कोई भटकता राही यहां पहुंच गया तो उसे सन्नाटों के गुबार में दम तोड़ रही विरासत की आख़िरी सांसों की चीख तो सुनाई देगी ही.

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