'फ़ौज के होते कोई सीमा कैसे पार कर सकता है'

पाकिस्तान के जमात-ए-इस्लामी के नेता सिराज़ु उल हक़ इमेज कॉपीरइट AFP

जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान के प्रमुख सिराजुल हक़ का कहना है कि कश्मीर को भारत से आज़ाद होना चाहिए और फिर उसके बाद कश्मीरियों को ये अधिकार मिलना चाहिए कि वो किसके साथ रहना चाहते हैं.

लंदन में बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से एक ख़ास मुलाक़ात में सिराजुल हक़ ने ये बातें कहीं. इस बातचीत में उन्होंने कश्मीर के अलावा कई अन्य मुद्दों पर टिप्पणी की.

पढ़ें उसी बातचीत के कुछ अंश.

जब यह कहा जाता है कि पाकिस्तान से सीमा पार कर लोग भारत पहुंच रहे हैं, तो मुझे विश्वास नहीं होता है, क्योंकि सीमा पर आठ लाख भारतीय सैनिक तैनात हैं. इतनी सेना की मौजूदगी में कोई सीमा कैसे पार कर सकता है.

मीडिया में धरना-प्रदर्शनों की जो ख़बरें आती हैं, उनमें भाग लेने वाले वहां के स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले नौजवान हैं. वहाँ की माँएं और बहनें हैं, 86 साल के सैयद अली शाह गिलानी और आसिया अंद्राबी हैं, जो कि एक औरत हैं. क्या भारत का लोकतंत्र और निज़ाम इतना कमज़ोर है कि उसे एक 86 साल के बुज़ुर्ग और एक महिला से ख़तरा महसूस हो रहा है.

भारत के नेताओं ने ख़ुद यह बात मानी है कि संयुक्त राष्ट्र के नियमों के तहत जनमत संग्रह कराया जाए. संयुक्त राष्ट्र ने अभी कोई और फ़ैसला नहीं किया है. ऐसे में क्या संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में भारत का यह दायित्व नहीं है कि वह अपने वादे पर अमल करे.

आज़ाद कश्मीर

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मेरा यह मानना है कि कश्मीर को हिंदुस्तान से आज़ाद होना चाहिए और कश्मिरियों को यह हक़ मिलना चाहिए कि वह यह तय करें कि वो पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं या भारत के साथ रहना चाहते हैं.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर अतीत की बातों को भूलकर ज़मीनी रवैया अख़्तियार करते हैं, वो क्षेत्र में शांति स्थापित करने में कामयाब हो जाते हैं तो इससे दोनों देशों का भविष्य रोशन हो सकता है.

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नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से कई बार सीमा पर हमले हुए हैं. उन्होंने कई बार बहुत ज़्यादा भड़काऊ बयान दिए हैं. अब वो बातचीत से भी हट गए हैं. उनके इस रवैये से क्षेत्र की शांति को ख़तरा है.

मेरे लिए शांति का अर्थ ख़ून-ख़राबे के ख़ात्मे से है. कश्मीर में ख़ून ख़राबा हो रहा है, जहां एक छोटे से इलाक़े में आठ लाख सैनिकों की तैनाती की गई है. जहां के लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. जहां के हज़ारों नौजवान जेलों में बंद हैं. जहां के नेता या तो नज़रबंद कर दिए गए हैं या भूमिगत रहकर काम कर रहे हैं. जहां लोग रोज़ मारे जा रहे हैं. मुझे लगता है कि ये सभी बातें तरक़्क़ी के रास्ते का रोड़ा हैं.

(बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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