जुलाई-अगस्त में अस्पताल जाना है ख़तरनाक?

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पश्चिमी देशों, ख़ास तौर पर अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा में ऐसी अफ़वाहें हैं कि जुलाई-अगस्त में बीमार होने और अस्पताल जाने से बचना चाहिए.

लोगों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया कि यदि जीवित रहना चाहते हो तो इस बात को गंभीरता से लो, अस्पताल में दाख़िल ही मत हो.

ब्रिटेन में तो मेडिकल ड्रामा - 'कार्डिएक अरेस्ट' बना जिसमें स्टाफ़ जुलाई-अगस्त को 'किलिंग सीज़न' कहता है.

अमरीका में इसे 'जुलाई इफ़ेक्ट' कहते हैं. बड़ा सवाल तो यह है कि क्या इन धारणाओं का कोई मेडिकल आधार या कोई पुख़्ता सबूत भी है?

मरने वालों की संख्या बढ़ती है

ऐसे कुछ अध्ययन हैं जो पहली नज़र में जुलाई-अगस्त में रिस्क ज़्यादा होने के दावों को बल तो देते हैं.

अमरीका के नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च ने 1993 से 2001 के दौरान 700 अस्पतालों का अध्ययन किया है.

इस अध्ययन में पाया गया कि जुलाई और अगस्त में देश के बड़े टीचिंग अस्पतालों में मरने वालों की संख्या में 4 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हो जाती है.

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इसका मतलब हर ऐसे अस्पताल में सामान्य के मुक़ाबले 8 से 13 मौतें अधिक होती हैं.

ये भी पाया गया कि इस दौरान मरीज़ों को अस्पताल में ज़्यादा वक़्त बिताना पड़ता है. लेकिन अगले छह महीने में हालात सुधरते दिखते हैं.

डॉक्टरों की नई पौध

दुनिया में ज़्यादातर जगह जुलाई और अगस्त में डॉक्टरों की नई पौध पढ़ाई ख़त्म करके कामकाजी दुनिया में शामिल होती है.

अमरीका में नए डॉक्टरों की नियुक्ति का यही समय होता है, इसी के साथ सैकड़ों डॉक्टरों को नई ज़िम्मेदारियां और प्रोमोशन मिलता है.

ब्रिटेन में अगस्त के पहले सप्ताह में ऐसा होता है. मतलब यह है कि एक तरफ़ नए डॉक्टर काम संभालते हैं और दूसरी ओर इसी वक़्त अस्पतालों में मृत्यु दर बढ़ जाती है.

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इन ख़बरों के बाद ही अफ़वाहों ने जन्म लिया कि जीवित रहना है तो अगस्त में बीमार मत पड़ना और अस्पताल में तो क़त्तई दाख़िल मत होना.

ट्रेनी डॉक्टरों पर सवाल

अध्ययन के बाद ऐसे निष्कर्ष भी निकाले जाने लगे कि क्या नए डॉक्टरों की ग़लतियों की वजह से भी अधिक मरीज़ों की मौत होती है?

ऐसा भी कहा जाने लगा कि जब नए डॉक्टरों का अनुभव बढ़ता है तो मौत की संख्या में कमी होती है.

लेकिन क्या यह कहना उचित होगा कि सभी अस्पतालों में जुलाई-अगस्त के दौरान ऐसा ख़तरा बढ़ जाता है?

ऐसे आंकड़े मिले हैं कि जिन अस्पतालों में नए डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिया जाता है, वहां ये ख़तरा ज़्यादा है.

हालांकि यह भी देखा गया कि जहां नए डॉक्टरों की निगरानी करने के लिए सीनियर डॉक्टर मौजूद होते हैं, वहां ऐसा ख़तरा नहीं होता है.

लेकिन हर अध्ययन के नतीजे ऐसे नहीं हैं. एक अध्ययन पांच साल तक कैलिफ़ोर्निया के दो अस्पतालों का भी हुआ.

इसमें जुलाई-अगस्त में मरीज़ों की मौत की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं देखी गई, लेकिन मरीज़ों में 'प्रीवेंटेबल कांप्लिकेशन,' यानी जो मामले उलझने से बच सकते थे, उनमें वृद्धि ज़रूर देखी गई.

क्यों होता है ख़तरा?

इसके अलावा कुछ और अध्ययन भी हुए हैं.

1998 से 2007 के बीच अमरीका के दो प्रशिक्षण देने वाले अस्पतालों में 4000 मरीज़ों की एपेंडिक्स की सर्जरी हुई, आपात स्थिति में.

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जुलाई और अगस्त में हुए ऑपरेशनों में ख़तरा ज़्यादा रहा हो, ऐसी बात सामने नहीं आई.

कनाडाई अस्पतालों में हुए एक अध्ययन में देखा गया है कि बच्चों के स्पाइनल कॉड में ट्यूब्स लगाने के जुलाई और अगस्त को छोड़कर दूसरे महीनों में हुए ऑपरेशन में कम मुश्किलें आईं.

ऐसे में इन दोनों महीनों में डॉक्टरों की निगरानी की ज़रूरत ज़्यादा महसूस होती है.

कुछ और अध्ययनों के मुताबिक़ भी जुलाई-अगस्त में अस्पताल में भर्ती होने की अफ़वाह निराधार लगती है.

लेकिन एक अध्ययन ऐसा भी है जो चिंता को बढ़ाने वाला है.

डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने वाले एक अस्पताल में देखा गया गया है कि इन महीनों में होने वाली सर्जरी में मरने वालों की संख्या साल के दूसरे महीनों की औसत से ज़्यादा है.

हालांकि इस अध्ययन से यह पता नहीं चलता है कि ट्रेनी डॉक्टरों की वजह से ये मौतें हुई हैं या किसी और वजह से.

एक सच्चाई ये भी है कि पश्चिमी देशों में जुलाई और अगस्त के दौरान ज़्यादातर सीनियर डॉक्टर छुट्टियों पर रहते हैं.

क्या है सच्चाई?

वैसे जुलाई और अगस्त में होने वाले ऑपरेशन में ये भी देखा गया है कि बाक़ी महीनों के मुक़ाबले में औसतन 8 मिनट ज़्यादा समय लगता है.

यह ख़तरनाक तो नहीं है लेकिन यह ज़रूर दर्शाता है कि ऑपरेशन की प्रक्रिया में उन्हें कुछ संघर्ष तो करना पड़ा.

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या फिर ऐसा भी हो सकता है कि डॉक्टर नए हैं और वे सब कुछ ठीक करने के लिए ज़्यादा वक़्त ले रहे हैं.

इस अध्ययन में यह देखा गया है कि जाड़े के मौसम में मरने की संख्या बढ़ जाती है. हालांकि इसकी तमाम वजहें भी हैं.

जाड़े के मौसम में ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. आस पड़ोस में ज़्यादा वायरस और बैक्टीरिया मौजूद होते हैं. इसकी वजह से भी अस्पताल में मृत्यु दर बढ़ जाती है.

अमूमन दिसंबर में जनवरी-फ़रवरी से ज़्यादा मौतें होती हैं, तो कारण क्या हो सकता है.

अमरीका और यूरोप में एक वजह तो यह भी हो सकती है कि क्रिसमस के चलते ज़्यादातर डॉक्टर छुट्टियों पर होते हैं.

तो क्या जुलाई और अगस्त महीने में अस्पताल में हो रही ज़्यादा मौतों का कारण भी ऐसा ही तो नहीं है?

पहली नज़र में यह हो सकता है कि नए डॉक्टरों की मौजूदगी से ऐसा हो रहा हो.

लेकिन 25 साल के दौरान के मृत्यु प्रमाण पत्रों के अध्ययन से एक बात साफ़ हुई - ग़लत दवा देने और सही दवा की ग़लत डोज़ देने से ज़्यादा मौतें हुई हैं.

अध्ययन पर सवाल

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अनुसंधान वालों के मुताबिक़ जुलाई महीने में ग़लत दवा देने से अस्पतालों में 10 फ़ीसदी ज़्यादा मौतें होती है.

हम ये नहीं जानते कि ये दवाएं नए डॉक्टरों ने ही लिखी थीं. इस अध्ययन की शुरुआत 1979 में हुई थी, तब से लेकर अब तक अस्पतालों में काफ़ी कुछ बदल चुका है.

लंदन के इंपीरियल कॉलेज की एक टीम ने 2000 से 2008 के दौरान ब्रिटेन के 175 अस्पतालों में अपातकालीन विभागों में भर्ती हुए लोगों की मौतों का अध्ययन किया. इस अध्ययन में भी देखा गया कि जिस दिन ट्रेनी डॉक्टरों ने अपना काम शुरू किया उस दिन 6 फ़ीसदी ज़्यादा मौतें हुईं.

हालांकि ये अध्ययन भी हमें यह नहीं बताता है कि ऐसा क्यों हुआ. नए डॉक्टरों पर इसका दोष नहीं दिया जा सकता. हम ये भी नहीं जानते कि ये मौतें कैसे हुईं, ऐसे में ये बताना भी मुश्किल है कि अगर अनुभवी डॉक्टर ने इलाज किया होता तो क्या होता?

बहरहाल, ज़्यादातर अध्ययन ये साबित नहीं करते कि जुलाई और अगस्त में ही ज़्यादा मौतें होती हैं. अस्पतालों में आजकल अत्याधुनिक सुविधाएं होती हैं, ऐसे में इसे 'किलिंग सीज़न' भी नहीं कहा जा सकता और एक बात तो स्पष्ट है ही, कि आप कब बीमार पड़ें, इसका चयन आप नहीं कर सकते.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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