आप स्मार्टफ़ोन की लत के शिकार तो नहीं..

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नोमोफ़ोबिया या कहिए मोबाइल फ़ोन न होने का डर. इस डर के कारण होने वाले तीव्र तनाव के बारे में सालों से बात होती रही है.

लेकिन एशिया में स्मार्टफ़ोन की लत तेज़ी से बढ़ रही है. इसके आदी लोगों की उम्र भी कम होती जा रही है.

दिलचस्प बात ये है कि एशिया में ही सेल्फ़ी स्टिक और इमोजी का जन्म हुआ था.

दक्षिण कोरिया में एक हज़ार छात्रों पर किए गए सर्वे में पता चला कि 11-12 साल उम्र के 72 फ़ीसदी बच्चों के पास स्मार्टफ़ोन है जो रोज़ाना औसतन 5.4 घंटे फ़ोन पर बिताते हैं.

नतीजतन 25 फ़ीसदी बच्चे स्मार्टफ़ोन के आदी हो गए हैं.

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हादसे

एशिया में 2.5 अरब स्मार्टफ़ोन यूज़र हैं और यहाँ फ़ोन से संबंधित हादसों की ख़बरें आती रहती हैं.

ताइवान में एक पर्यटक फ़ोन पर फ़ेसबुक देखते हुए समंदर में गिरते गिरते बचाई गई. वहीं चीन में एक महिला फ़ोन पर देखते-देखते नाले में गिर गई.

सिंगापुर की आबादी भले ही 60 लाख हो लेकिन यहां प्रति व्यक्ति के हिसाब से स्मार्टफ़ोन सबसे ज़्यादा हैं.

फ़ोन की लत से जुड़ी चिंताओं को देखते हुए वहां डिजिटल एडिक्शन विशेषज्ञों और साइबर वेलनेस क्लिनिक का चलन बढ़ा हैं.

वहां एक अभियान चलाया जा रहा है ताकि डिजिटल एडिक्शन को मान्यता मिल सके.

एक साइबर वेलनेस सेंटर के मेडिकल निदेशक चोंग ई-जे कहते हैं, "युवाओं में परिपक्वता नहीं होती. वो नहीं समझ पाते है कि स्मार्टफोन को कितना इस्तेमाल करें. उनका अपने आप पर नियंत्रण नहीं होता है."

सिंगापुर में वॉट्सएप के ज़रिए होमवर्क देना सामान्य बात है.

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Image caption एशिया में बड़ी तादाद में लोग अपने खाने की तस्वीरें खींचते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं.

स्मार्टफ़ोन की लत

दक्षिण कोरिया में एक 19 वर्षीय छात्रा 2013 से नोमोफ़ोबिया का इलाज करवा रही है.

वे कहती हैं, "मेरा फ़ोन ही मेरी दुनिया बन गया. या मेरा ही एक और हिस्सा. जब मुझे लगता कि कहीं मेरा फ़ोन खो तो नहीं गया है, तो मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता या मेरे हथेलियों पर पसीना आ जाता था. इसलिए मैं कहीं भी उसके बिना नहीं जाती थी."

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Image caption एशिया में बच्चों में भी स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है.

दक्षिण कोरिया में हुए शोध से पता चला है कि जो लोग अपने स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल सोशल मीडिया के लिए करते हैं, उन्हें लत लगने की संभावना ज़्यादा होती है.

आज के दौर में स्मार्टफ़ोन न होने पर बच्चे या किशोर ख़ुद को दूसरों से कटा हुआ महसूस करते हैं.

एशिया में जहां बच्चों को बहुत ज़्यादा होमवर्क दिया जाता है, वहां फ़ोन दोस्तों के साथ जुड़े रहने का अहम ज़रिया होते हैं.

हंसी मज़ाक या आपस की बातें साझा करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए फ़ोन बेहद अहम हो जाता है.

लत के लक्षण
* बिना किसी वजह के अपने फ़ोन को चैक करते रहना.
* फ़ोन पास न होने की बात से ही परेशान और बेचैन हो जाना.
* सामाजिक संपर्क बनाने के बजाए फ़ोन पर ही व्यस्त रहना.
* आधी रात में उठकर अपना स्मार्टफ़ोन चैक करना.
* फ़ोन पर ज़्यादा वक़्त बिताने के कारण पढ़ाई या काम पर ध्यान न दे पाना.
* स्मार्टफ़ोन एप्लीकेशन या ईमेल अलर्ट के कारण आसानी से ध्यान भंग होना.
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Image caption भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों तक पहुँचने के लिए ख़ूब कर रहे हैं.

नियम

कई देशों ने स्मार्टफ़ोन के इस्तेमाल को लेकर नियम लागू करने शुरू कर दिए हैं.

दक्षिण कोरिया में किशोरों में स्मार्टफ़ोन के इस्तेमाल पर नज़र रखने के लिए बनाए गए एक ऐप्लीकेशन का काफ़ी विरोध हुआ है.

वहां 2011 में बच्चे के आधी रात के बाद ऑनलाइन गेम खेलने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी.

चीन दुनिया के उन पहले चुनिंदा देशों में हैं जिसने इंटरनेट की लत को एक विकृति घोषित किया. वहां इस लत से छुटकारा पाने के लिए सैन्य तर्ज पर क्लिनिक बनाए गए हैं.

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Image caption युवाओं के बीच स्मार्टफोन पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है.

मनोवैज्ञिनक थोमस ली कहते हैं कि बाक़ी देशों को भी ऐसे क़दम उठाने चाहिए और स्मार्टफ़ोन की लत को मानसिक बीमारी घोषित करना चाहिए.

ली कहते हैं, "मूड ठीक करने के लिए स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल भी ऐसा ही है जैसे ड्रग्स व्यवहार को प्रभावित करती हैं."

वे कहते हैं कि नशे के आदी व्यक्ति की तरह ही स्मार्टफ़ोन के आदी व्यक्ति में भी बेचैनी, घबराहट और ग़ुस्से जैसे लक्षण होंगे.

लेकिन इसके विरोधियों का तर्क है कि इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और ये आधुनिक समाज की ज़्यादा सोचने की प्रवृत्ति के कारण है.

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Image caption चीनी शहर चोंगकिंग में तो स्मार्टफ़ोन इस्तेमाल करने वालों के लिए अलग से फ़ुटपाथ बना दिया गया है.

सिंगापुर में मनोवैज्ञानिक की प्रोफ़ेसर मार्लीन ली का कहना है कि तकनीक से जुड़ी बीमारियां कोई नई बात नहीं हैं.

हालांकि मनोवैज्ञानिक एडरियन वांग ऐसी लत के लिए दवाई देने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि वो मानते हैं कि ये सामाजिक समस्या को बीमारी बनाने जैसा है.

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