अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव पर ईरान डील की छाया

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Image caption राष्ट्रपति ओबामा ईरानी डील को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं

अमरीका के नेतृत्व में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को लेकर वाशिंगटन में राजनीतिक रस्साकशी काफ़ी तेज़ हो चुकी है.

जहां एक तरफ़ ये लगने लगा है कि राष्ट्रपति ओबामा इस समझौते को लागू करने में शायद कामयाब हो जाएं, वहीं दूसरी तरफ़ इसके विरोधी इसे खारिज करने के लिए पूरी ताक़त से जुट गए हैं.

बुधवार को रिपबलिकन पार्टी के एक धड़े ने समझौते का विरोध करने के लिए कैपिटल हिल के बाहर एक रैली आयोजित की जिसमें राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में आगे चल रहे डॉनल्ड ट्रंप भी मौजूद थे.

जब वो भाषण देने उतरे तो उनके पीछे बज रहा था अमरीकी रॉक बैंड R.E.M का गाना It’s the end of the world यानि दुनिया खत्म होने जा रही है.

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रैली में ट्रंप समेत सभी नेताओं का पैगाम भी यही था कि ईरान के साथ हुआ ये समझौता इसराइल के साथ-साथ दुनिया को खत्म कर देगा.

ट्रंप ने अपने चिरपरिचत अंदाज़ में ओबामा प्रशासन पर पर निशाना साधते हुए कहा कि इस समझौते का नेतृत्व बहुत ही बेवकूफ़ क़िस्म के लोगों ने किया है.

निशाने पर ओबामा

कांग्रेस को 17 सितंबर तक ये फ़ैसला करना है कि वो इस समझौते को मंज़ूर करेंगे या नहीं और रैली में मौजूद नेताओं की कोशिश थी उन डेमौक्रैट सेनेटरों पर दबाव बनाने की जो इसके हक़ में है.

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राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में शामिल सेनेटर टेड क्रूज़ का कहना था कि ये समझौता इसरायली और अमरीकियों के क़त्लेआम का रास्ता खोल देगा.

उनका कहना था, “इस समझौते से सौ अरब डॉलर से ज़्यादा की राशि ईरान और उसके नेता अयातोल्ला खमेनई के हाथों में पहुंचेगी. इस पैसे से वो हमास, हिज़बुल्ला और दूसरे इस्लामी जिहादी ताक़तों की मदद करेंगे और ये आतंकवादी उस पैसे से अमरीकियों और इसरायलियों का क़त्ल करेंगे.”

उसी रैली से कुछ दूर कैपिटल हिल के ही बाहर अपने पारंपरिक काले कोट और यहूदी टोपी किप्पा पहने हुए सौ से ज़्यादा यहूदी रबाई भी जुटे थे और उनका कहना था कि ये समझौता इसराइल के वजूद को ख़तरे में डाल रहा है.

गहमागहमी

वाशिंगटन के थिंक टैंक्स में भी इन दिनों ख़ासी गहमागहमी है.

समझौते के हक़ में और उसके ख़िलाफ़ बोलनेवालों का तांता लगा हुआ है और अब जबकि ये तय है कि ईरान अमरीकी चुनाव में भी बड़ा मुद्दा बन सकता है तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी इन मंचों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

डेमौक्रैटिक पार्टी की उम्मीदवारी की रेस में सबसे आगे चल रही हिलेरी क्लिंटन ने इस समझौते का पूरी तरह से समर्थन किया लेकिन साथ ही कहा कि वो ईरान पर पैनी नज़र रखेंगी.

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उनका कहना था, “हमें इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि ईरान अगले राष्ट्रपति का पूरी तरह से इम्तिहान लेगा. वो देखना चाहेंगे कि वो किस हद तक समझौते को तोड़-मरोड़ सकते हैं. लेकिन अगर मैं व्हाइट हाऊस में पहुंची तो मैं ऐसा नहीं होने दूंगी.”

लेकिन राष्ट्रपति ओबामा अब से डेढ़ साल बाद की नहीं अगले हफ़्ते की सोच रहे हैं जब कांग्रेस में इस समझौते पर फ़ैसला होना है. कांग्रेस के दोनों ही सदनों में रिपब्लिकंस बहुमत में हैं लेकिन ओबामा कह चुके हैं कि अगर कांग्रेस इस समझौते को खारिज करती है तो वो अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करेंगे.

वोट का खेल

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कांग्रेस उनके वीटो पावर को तोड़ न सके इसके लिए उन्होंने अब तक 42 डेमौक्रैट सेनेटरों का समर्थन हासिल कर लिया है जबकि ज़रूरत सिर्फ़ 34 की थी.

अब व्हाइट हाउस कोशिश में है कि सेनेट के फ़िलिबस्टर क़ानून का फ़ायदा उठाकर इस प्रस्ताव पर वोटिंग ही न होने दी जाए. इस फ़िलिबस्टर क़ानून को रोकने के लिए रिपबलिकंस को सेनेट में कम से कम से 60 वोट चाहिए लेकिन उनके पास सिर्फ़ 54 वोट हैं.

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इस समझौते के तहत ईरान अगले दस से पंद्रह साल तक बम बनाने के लायक यूरेनियम संवर्धन नहीं कर सकेगा और उसके बदले में उसे आर्थिक प्रतिबंधों से छुटकारा मिल जाएगा. साथ ही अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक जब चाहें उन संयंत्रों का निरीक्षण कर सकते हैं. लेकिन कई ऐसे ठिकाने भी हैं जहां निरीक्षण करने के लिए अंतरराष्ट्रीय टीम को 24 दिनों तक इंतज़ार करना पड़ सकता है और समझौते के विरोधियों का कहना है कि इसकी आड़ में ईरान बड़े आराम से परमाणु बम बनाने के लायक यूरेनियम पैदा कर सकता है.

जुलाई में जब इस समझौते पर सहमति बनी थी तब अमरीकी जनता भी इसके समर्थन में थी लेकिन ताज़ा सर्वेक्षणों के मुताबिक वो समर्थन भी अब घट रहा है.

कांग्रेस में ये समझौता मंज़ूर हो या नहीं, विश्लेषकों का कहना है कि इस दशक में ये अमरीकी विदेश नीति का सबसे अहम फ़ैसला होगा और इतिहास में जब भी राष्ट्रपति ओबामा को याद किया जाएगा, उनकी विरासत में ईरान के साथ हुए समझौते का ज़िक्र ज़रूर होगा.

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