बेडरूम से बाज़ार तक, हर जगह हैं धर्म के 'दुश्मन'

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अमरीका में ईसाइयत ख़तरे में है. कुछ उसी तरह जैसे पिछले कुछ वर्षों से भारत में हिंदुत्व और पिछले 60-65 सालों से पाकिस्तान में इस्लाम ख़तरे में है.

और ख़ास बात ये है कि तीनों ही जगह ये ख़तरा बाहर वालों से नहीं अंदरवालों से है.

अमरीका में लिबरल लोगों से, भारत में सेक्यूलर लोगों से और पाकिस्तान में हुक्मरानों का मूड ख़राब हो तो हर राह चलता इंसान रातों-रात इस्लाम का दुश्मन करार दिया जा सकता है.

लेकिन अमरीका में चुनावी मौसम चल रहा है इसलिए यहां ईसाइयत पर ख़तरा कुछ ज़्यादा बढ़ गया है. बेडरूम, ऑफ़िस, बाज़ार, स्कूल, अस्पताल हर जगह यह दुश्मन छिपे हुए हैं.

और अब ईसाइयत के इन दुश्मनों से निपटने के लिए लोग बगावत पर उतर रहे हैं.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि समलैंगिक शादियों को भी क़ानूनी दर्जा दिया जाना चाहिए और ऐसी शादियों की रजिस्ट्रेशन दनादन शुरू हो गई.

लाइसेंस देने से इनकार

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Image caption किम डेविस

लेकिन केंटकी राज्य में किम डेविस नाम की एक महिला अधिकारी ने एक समलैंगिक जोड़े को शादी का लाइसेंस देने से इंकार कर दिया.

महिला अधिकारी के अनुसार उनका धर्म और उनका ज़मीर इसकी इजाज़त नहीं दे रहा था.

बात अदालत तक पहुंची और अदालत का हुक्म न मानने की वजह से किम डेविस को छह दिन के लिए जेल की ब्रेड खानी पड़ी.

बात उन 17-18 रिपब्लिकन उम्मीदवारों के कानों तक भी पहुंची जो व्हाइट हाउस की कुर्सी तक पहुंचने के लिए इन दिनों जहां भी कोई कंधा नज़र आ जाए वहां चढ़ने को तैयार हैं.

उन्हीं में से एक हैं माइक हकबी जो अरकांसा राज्य के गर्वनर रह चुके हैं, पार्ट-टाइम पादरी भी हैं और फ़ॉक्स न्यूज़ चैनल पर एक-दो शो भी कर चुके हैं.

उन्होंने डेविस को छुड़वाने के लिए तो कुछ ख़ास नहीं किया लेकिन जब वो जेल से छूटीं तो बाजे-गाजे के साथ जेल के बाहर पहुंच गए और उनके सम्मान में एक रैली कर डाली.

उनके बगल में खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाईं और कहा कि इस देश में धार्मिक आज़ादी खत्म हो रही है और इसलिए ज़रूरत है उनके जैसे उम्मीदवार को व्हाइट हाउस भेजा जाए.

धर्म पर सियासत

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Image caption टेड क्रूज़

रैली की ख़बर एक दूसरे उम्मीदवार टेड क्रूज़ तक भी पहुंची और आव देखा न ताव वो भी बिन बुलाए पहुंच गए वहां किम डेविस के साथ तस्वीर खिंचवाने.

अब लोग जुटाए हकबी साहब ने, पैसा खर्च किया हकबी साहब ने और मलाई में हिस्सा मांगने आ गए टेड क्रूज़ तो ज़ाहिर है हकबी को ग़ुस्सा आना ही था.

उनके सिक्योरिटी वालों ने क्रूज़ को रैली से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

मरता क्या न करता, बिचारे क्रूज़ साहब बगल के खेत में खड़े टीवी वालों के सामने ईसाइयत के बचाव में दलीलें बघारने लगे.

एक टीवी ऐंकर ने अपने शो में सवाल उठाया कि अगर किसी मुसलमान ने अपने धर्म का हवाला देते हुए कोई सरकारी हुक्म मानने से इंकार कर दिया होता तो भी क्या ये उम्मीदवार धार्मिक आज़ादी की बात कर रहे होते?

ये टीवी वाले भी न, क्या-क्या अनाप-शनाप सवाल पूछते रहते हैं?

वैसे बातों बातों में ये भी पता चला किम डेविस ख़ुद चार बार शादी कर चुकी हैं और उसके बाद उन्होंने धर्म का झंडा उठाया है. अब तक वो खुद को डेमोक्रैट कहती रही हैं.

एक पत्रिका ने लिखा कि जैसे ही वो धर्म की शरण में गईं कि भगवान ने उन्हें एक डिलीट बटन थमा दिया जिसको दबाते ही उनके सारे पुराने पाप धुल गए.

यही नहीं जेल जाने के बाद तो शायद उनके सर के पीछे वो पीली वाली रौशनी भी नज़र आ रही है जो आमतौर पर महात्माओं के सिर पर तस्वीरों में दिखाई जाती है.

"साइंस को कूड़े में डाला"

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Image caption बेन कारसन

और यही वजह है कि सभी रिपब्लिकन उम्मीदवार उस रौशनी में नहाने के लिए बेताब हैं. बेचारे ईसा मसीह भी परेशान हो रहे होंगे कि इन 18 में से किसके सिर पर हाथ रखें?

सभी उनके नाम की माला जप रहे हैं. एक डॉक्टर साहब हैं बेन कारसन जो उम्मीदवारी की रेस में दूसरे नंबर पर चल रहे हैं.

जाने-माने डॉक्टर हैं, सिर से जुड़े दो जुड़वां बच्चों का ऑपरेशन करके उन्होंने दुनिया भर में नाम कमाया लेकिन जब बात धर्म की आती है तो साइंस को कूड़े के डिब्बे में फेंककर कहते हैं कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत बकवास है. जो भी किया है वो भगवान ने.

अब बेचारे माइक हकबी साहब ने जब किम डेविस का स्वागत करने के लिए गाजे-बाजे का इंतज़ाम किया तो उन्होंने वर्ष 1982 के सबसे कामयाब रॉकबैंड का जोश भरा गाना “आई ऑफ़ दी टाइगर” का इस्तेमाल किया जिससे दूसरों में भी जोश आए.

अब उस रॉकबैंड ने हकबी की क्लास ले डाली है कि किससे पूछकर इस तरह की रैली में उनके गाने का इस्तेमाल किया गया. बेचारे हकबी बगलें झांक रहे हैं.

धर्म की तो किसी को परवाह ही नहीं रह गई है. क्या होगा दुनिया का?

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