परमाणु हथियार हैं, तो शांति है: पाक मीडिया

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परमाणु हथियार बनाने की नीति जारी रखने का पाकिस्तान का फ़ैसला पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बीते हफ़्ते ख़ासा चर्चा का विषय रहा.

‘जंग’ ने पाकिस्तान की ‘न्यूक्लियर कमांड एंड कंट्रोल अथॉरिटी’ के इस बयान को तवज्जो दी है कि दक्षिण एशिया में पारंपरिक हथियारों के बढ़ते असंतुलन को देखते हुए पाकिस्तान छोटे और अधिक प्रभावी परमाणु हथियार बनाने की नीति को जारी रखेगा.

अख़बार ने जहां भारत की तरह पाकिस्तान को असैन्य परमाणु तकनीक देने और उसे परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बनाने की पैरवी की है, वहीं परमाणु हथियारों को क्षेत्र में शांति के लिए अहम बताया है.

‘जंग’ लिखता है कि पाकिस्तान शांतिप्रिय देश है लेकिन कमज़ोर बिल्कुल नहीं, क्योंकि कमज़ोर देश उन देशों का आसानी से निशाना बन जाते हैं जो क्षेत्र में अपना दबदबा क़ायम करना चाहते हैं.

अख़बार की राय है कि पाकिस्तान के परमाणु ताक़त बनने के बाद ही ये संभव हो पाया है कि दक्षिण एशिया जंग से बचा हुआ है.

हथियारों की दौड़

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वहीं रोज़नामा ‘दुनिया’ लिखता है कि भारत ने ही क्षेत्र में पहले पारंपरिक हथियार की और फिर परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू की.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान को भारत की तैयारियों के जवाब में अपनी रक्षा ताक़त को बढ़ाना पड़ा ताकि दोनों देशों के बीच शक्ति संतुलन बना रहे और भारत को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आक्रामकता दिखाने का मौक़ा न मिले.

वहीं ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि भारत के जंगी जुनून को बढ़ाने में दुनिया की बड़ी ताक़तों का भी हाथ है, जो अपने हथियार बेचने और व्यापारिक हितों के लिए क्षेत्र में तनाव को बरक़रार रखना चाहते हैं.

ऐसे में, अख़बार की भारत और पाकिस्तान को नसीहत है कि वो अपने संसाधनों को हथियारों की तैयारी की भेंट न चढ़ाएं, बल्कि इन्हें क्षेत्र में ग़रीबी, अज्ञानता, अशिक्षा और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं से निपटने में लगाएं.

पाक-रूस रक्षा सौदा

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वहीं ‘नवा-ए-वक़्त’ ने पाकिस्तान और रूस के बीच हुए रक्षा समझौते पर संपादकीय लिखा है जिसके तहत रूस पाकिस्तान को एमआई-35 एम हेलिकॉप्टरों के अलावा आधुनिक एसयू-35 लड़ाकू विमान भी देगा.

अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान ने अपनी विदेश नीति को पहले से ज़्यादा लचीला बना कर भारत की नींद उड़ा दी है.

अख़बार लिखता है कि रूस से आधुनिक लड़ाकू विमान मिलने से क्षेत्र में शक्ति संतुलन क़ायम होगा और पाकिस्तान का रक्षा तंत्र मज़बूत होगा.

वहीं दैनिक ‘पाकिस्तान’ ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर संपादकीय लिखा है जिसमें उर्दू को तुरंत पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा के तौर पर लागू करने को कहा गया है.

अख़बार कहता है कि संवैधानिक रूप से, उर्दू को सरकारी भाषा के तौर पर लागू करने की मुद्दत 1988 में पूरी हो चुकी है, लेकिन अब तक इस बारे में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई.

अख़बार की राय है कि अंग्रेज़ी सीखने, बोलने और इसे इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम अपनी राष्ट्रीय भाषा को छोड़ दें.

चुनावी बिगुल

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रुख़ भारत का करें तो ‘जदीद ख़बर’ का संपादकीय है- बिहार में चुनावी बिगुल.

अख़बार लिखता है कि बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए सेक्युलर गठबंधन को वक़्त का तक़ाज़ा बताया जा रहा था लेकिन पीएम मोदी की चुनावी रणनीति के सामने गठबंधन को सेक्युलर वोटों का विभाजन रोकने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी.

अख़बार की राय है कि नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच सियासी दुश्मनी आगे चलकर बिहार की सूरते हाल को बिगाड़ दे तो इससे ज़्यादा अफ़सोसनाक कुछ नहीं होगा.

जैन समुदाय के त्योहार ‘पर्यूषण’ को देखते हुए मांस की ब्रिकी पर रोक को लेकर जारी विवाद पर ‘हमारा समाज’ का संपादकीय है- खाने पर सियासत.

अख़बार की राय है कि देश को कुछ अर्से से जिस तरह सांप्रदायिक रंग में रंगने की कोशिश हो रही है, मांस की ब्रिकी पर रोक भी उसी सिलसिले की कड़ी लगती है.

अख़बार लिखता है कि हक़ीक़त ये है कि गोश्त खाने वालों में ग़ैर-मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या है और यही नहीं, मांस का निर्यात करने वाली देश की छह सबसे बड़ी कंपनियों में से चार के मालिक ग़ैर-मुस्लिम हैं.

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