पाकिस्तान में सआदत हसन मंटो पर फ़िल्म

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भारत-पाकिस्तान में समान रूप से मशहूर कहानीकार सआदत हसन मंटो पर पाकिस्तान में बनी एक फ़िल्म पिछले हफ़्ते रिलीज़ हुई है. यह फ़िल्म मंटो की कई कहानियों को लेकर बुनी गई है.

फ़िल्म के निर्देशक हैं सरमद सुल्तान ख़ूस्त. उन्होंने फ़िल्म में मंटो का किरदार भी निभाया है.

इस फ़िल्म को लेकर ख़ूस्त से बात की बीबीसी संवाददाता वुसअतुल्लाह ख़ान ने.

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यह फ़िल्म एक बहुत बड़े इंसान को श्रद्धांजलि तो है लेकिन कोई फ़िल्म केवल श्रद्धांजलि देने से तो चलती नहीं है. फ़िल्म बनाने में पैसा लगता है. पैसा वापस आने की भी उम्मीद होती है. इस फ़िल्म को बनाने में व्यावसायिक ज़रूरतों का कितना ध्यान रखा गया?

देखिए आज हम 2015 में हैं, आज लोग फ़िल्म के पुराने फ़ार्मूले को नकार चुके हैं. अगर आप उन्हें आइटम सॉंग दिखाते हैं, तो लोग उसपर ऐतराज़ जताते हुए कहते हैं कि आप हिंदुस्तान जैसी फ़िल्म क्यों बना रहे हैं. अगर आप उन्हें हार्ड कोर रियलिस्टिक फ़िल्म देते हैं तो कहेंगे आप ईरान जैसी फ़िल्म क्यों बना रहे हैं.

मंटो की ज़िंदगी में कही आइटम सांग फ़िट तो हो सकता था?

इमेज कॉपीरइट SHIRAZ HASSAN

यक़ीनन फ़िट हो सकता है. मंटो साहब की एक-एक कहानी में ऐसे-ऐसे आइटम मौजूद हैं. हम मंटो साहब के काम पर जब भी बात करते हैं हम उसे एक ख़ास तरह के शक्ल से मंसूब करते हैं. मुझे इस पर ऐतराज़ भी है. मंटो पर जब भी काम किया गया, उन्हें मेनस्ट्रीम में लाने की कोशिश भी कम की गईं. उनको ड्राइ रखा जाता है, चीजें ऐसी पिक की जाती हैं, जिससे कि एक दूरी बनी रहती है.

सेंसरशिप के अलावा मुझे लगता है कि सौंदर्यबोध का भी मामला है. एक लिखा हुआ शब्द और देखने वाली तस्वीर बिल्कुल एक जैसी नहीं हो सकती है. पैसा वापसी कि बात न तो निर्माता बहुत अधिक सोच रहे हैं और न यह बहुत अधिक महंगी फ़िल्म है.

दूसरी बात मुझे यह लगती है कि अगर मंटो साहब पर फ़िल्म बने और यह उम्मीद की जाए कि पैसा वापस आ जाएगा, तो मुझे लगता है कि यह मंटो साहब के साथ बहुत बड़ी ज़्यादती होगी.

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