बक़रीद पर बांग्लादेश में गायों की कमी

भारत से बांग्लादेश ले जाई जा रही गायें

बांग्लादेश सरकार ने अपने नागरिकों को भरोसा दिलाया है कि बक़रीद के मौक़े पर पर्याप्त गायों का इंतज़ाम किया जाएगा ताकि क़ुर्बानी करने में लोगों को दिक्कत न हो.

गायों को बांग्लादेश ले जाने पर लगी रोक को सख़्ती से लागू करने के भारत के फ़ैसले के बाद वहां गायों की कमी हो गई है.

मांस उद्योग और चमड़ा उद्योग पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. साथ ही बांग्लादेश की सरकार को आर्थिक नुक़सान भी हो रहा है.

सुनसान तबेला

भारत से गायों को बांग्लादेश ले जाने के लिए जिन सीमाओं का इस्तेमाल किया जाता है, उनमें सबसे महत्वपूर्ण जैसोर स्थित बेनापोल सीमा है.

मैं बीते दिनों बेनापोल के पुटखाली इलाक़े में गई थी. वहां पांच एकड़ में बना बड़ा तबेला बिल्कुल खाली पड़ा था.

छोटे-छोटे सैकड़ों घर और उन पर लगाया गया टिन का शेड. सीमा पार कराने के बाद गायों को इसी जगह थोड़ी देर के लिए रखा जाता है. आगे का सफ़र इसके बाद शुरू होता है.

Image caption सुनसान पड़ा है पुटखाली का खटाल.

आस पास के कई ज़िलों के गाय व्यापारी यहां आते हैं, गायें पसंद करते हैं, मोल भाव करते हैं. पर बीते एक-दो महीने से यहां एक भी गाय नहीं लाई गई.

पास ही ग्वालों के लिए बना घर भी सुनसान पड़ा है. बड़े तबेले के सामने ही छोटा सा एक होटल ज़रूर खुला हुआ है. यहां कुछ व्यापारी खा-पी रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं और किसी तरह समय काट रहे हैं.

लियाक़त अली पिछले दस दिन से यहां डेरा डाले हुए हैं. वे यहां गायें ख़रीद कर चटगांव के बाज़ार में बेचा करते थे. वे अब भी गायों का ही इंतज़ार कर रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “लगभग साल भर से घाटे में हूं. महाजनों से पैसे लेकर व्यापार कर रहा हूँ. लोग कहते हैं कि आज कल कुछ गायें यहां आएंगी, पर ऐसा हो नहीं रहा है.”

इच्छामती में स्पीड बोट

Image caption भारत-बांग्लादेश सीमा पर बहती हुई इच्छामती नदी.

जैसोर से बहती है इच्छामती नदी. इस नदी को पार कर ही भारत से गायें बांग्लादेश ले जाई जाती हैं. पर वहां सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) फ़ोर्स की गश्त बढ़ा दी गई है, नदी में स्पीड बोट भी उतार दी गई हैं.

बीएसएफ़ को कड़ी हिदायत दी गई है कि किसी भी सूरत मे गायें इस नदी को पार कर बांग्लादेश न पंहुचें.

गाय व्यापारियों का कहना है कि रोज़ाना दो हज़ार गायें पुटखाली लाई जाती थीं पर बीते नौ महीनों में यह संख्या कई गुना कम हो गई है.

हसन अली पुटखाली के बड़े व्यापारी हैं. वह कहते हैं, “ये तबेला देख रहे हैं न. यह गायों से पूरी तरह भरा रहता था. यहां कम से कम दो हज़ार गायें हमेशा रहती थीं. पर अब तो यह एकदम बंद हो चुका है.”

वह आगे कहते हैं, “बीच-बीच में किसी तरह चुपके चुपके गायें लाई जाती थीं. पर इनकी तादाद हफ़्ते में सौ-डेढ़ सौ से ज़्यादा नहीं होती थी. इसकी ख़बर मिली तो अधिकारियों ने इतनी कड़ाई कर दी कि वह भी बंद हो गया.”

गैरक़ानूनी व्यापार

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत से तक़रीबन 20 लाख गायें हर साल बांग्लादेश लाई जाती हैं. पर वहां सालाना 40 लाख गायों की ज़रूरत है.

इस तरह हर महीने लगभग दो लाख गायें बांग्लादेश पहुंचती हैं.

बांग्लादेश की एक संस्था सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले गाय व्यापार पर अध्ययन कर रही है.

इस संस्था के एक शोधकर्ता और कार्यकारी निदेशक मुस्तफ़ाज़ुर रहमान मानते हैं कि दोनों देशों के बीच गायों का व्यापार ग़ैरक़ानूनी ढंग से ही होता है.

बांग्लादेश में इसे क़ानूनी मान्यता देने की कोशिश की गई, पर भारत ने ऐसा कभी नहीं किया.

वह कहते हैं, “भारतीय सीमा पार कर बांग्लादेश पंहुचते ही ऐलान कर दिया जाता था कि इन गायों का कोई मालिक नहीं है. इसके बाद उन्हें इस तबेले में रखा जाता था.”

इसके बाद 500 टका चुकाने पर लाइसेंस मिल जाता था. इस लाइसेंस के सहारे इन गायों को आगे ले जाया जाता था.

बांग्लादेश सरकार को लाइसेंस फ़ीस से ही साल में तक़रीबन 900 करोड़ टका मिलते थे.

यह सब कुछ बंद हो चुका है और इसका असर पड़ रहा है पुटखाली और उसके लोगों पर.

मंहगा हुआ बीफ़

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यहां से 12 मील दूर बाघाछड़ा सातमाइल हाट इलाक़े का सबसे बड़ा हाट है. हर मंगलवार और शनिवार को यहां हाट लगता है.

हाट के असदउज्जमां कहते हैं, “यहां हर हाट को 20 हज़ार से 25 हज़ार गायें बिकती थीं. पर आज यहां आप दो-ढ़ाई हज़ार से ज़्यादा गाय नहीं देख सकते.”

गायों की कमी की वजह से व्यापारियों ने क़ीमत बढ़ा दी है. इसका नतीजा यह है कि दूर दराज़ के इलाक़ों के गाय व्यापारी ऊंची क़ीमत पर गाय नहीं खरीद सकते.

यदि वे इस क़ीमत पर गाय खरीदते भी हैं तो उपभोक्ता तक पंहुचते-पंहुचते मांस की क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है.

बांग्लादेश मांस व्यवसायी समिति के महासचिव रबीउल आलम का कहना है कि पहले यहां गाय के मांस की क़ीमत 270 से 280 टका प्रति किलो हुआ करती थी. पर अब यह बढ़ कर प्रति किलो 380 टका से 500 टका तक हो गई है.

उपभोक्ताओं में गुस्सा

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रबीउल ने बीबीसी से कहा, “पहले मैं एक मन वज़न की गाय अधिक से अधिक 12 हज़ार टका में खरीदता था. अब मुझे वही गाय 18 से 19 हज़ार टका में मिलती है. उसे आगे ले जाने का खर्च अलग. गाय ज़िबह करने के बाद दिन भर में ही उसका पूरा मांस बेचना होता है. खरीदारों को भी ऊंची क़ीमत अदा करनी होती है.”

गाय के मांस की कीमत आसामान छू रही है और ख़रीदारों में ज़बरदस्त गुस्सा है.

हाट के पास ही मांस के एक दुकान पर मैंने दो लोगों से बात की. एक ने कहा, “मैं छह महीने पहले तक पौने तीन सौ टका में एक किलो मांस खरीदता था. पर अब यह बढ़ कर चार सौ टका हो गया. यह मेरी औक़ात से बाहर की बात है. पहले जहां चार किलो मांस ख़रीदता था, अब दो किलो से ज़्यादा नहीं ख़रीद सकता.”

सिर्फ़ मांस की क़ीमत बढ़ रही हो, ऐसा नहीं है. बांग्लादेश के चमड़ा उद्योग पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

विकल्प खोजेगा बांग्लादेश

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मुस्तफ़ाज़ुर रहमान का कहना है कि ईद के मौके पर चमड़ा बाज़ार पर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

वे यह भी कहते हैं कि गायों के लिए भारत पर निर्भर रहने के बजाय इसका विकल्प खोजना ज़रूरी है.

रहमान ने कहा, “म्यांमार और मलेशिया से भी गायें ख़रीदी जा सकती हैं. गायें ही खरीदनी होगी, यह ज़रूरी नहीं, इसके बदले सीधे गोमांस भी ख़रीदा जा सकता है.”

कुछ दिन बाद ही बकरीद है. बांग्लादेश के पशु संपदा विभाग के मुताबिक़, सिर्फ़ बक़रीद के मौके पर ही 25 लाख गायों की क़ुर्बानी दी जाएगी.

सरकार ने भरोसा दिलाया है कि ज़रूरत के मुताबिक गायों व्यवस्था की जाएगी.

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