एक पत्रकार की 21 हज़ार मील की पैदल यात्रा

इमेज कॉपीरइट John Stanmeyer National Geographic

पॉल सालोपेक 21 हज़ार मील की पैदल यात्रा कर रहे हैं. सात साल की प्रोजेक्ट के तहत वो दो साल का सफ़र पूरा कर चुके हैं.

उनका मिशन है अफ़्रीका से मनुष्य के पलायन के रास्ते पर सफ़र करते हुए इथियोपिया से दक्षिण अमरीका के टियेरा डेल फ़िगो तक पैदल जाना.

दुनिया भर में इस साल जिन लोगों की यात्रा को अहम माना जा रहा है, उनमें पॉल भी शामिल हैं.

दरअसल दो बार पत्रकारिता के लिए पुलित्ज़र जीत चुके सालोपेक, अफ़्रीका में शिकागो ट्रिब्यून के विदेश संवाददाता रह चुके हैं और अब एक नायाब प्रयोग कर रहे हैं.

वो मानते हैं कि आज अत्यंत तेज़ से दी जा रही ख़बरों की दुनिया में शोर तो बहुत है लेकिन ठोस जानकारी कम है.

वो 'स्लो जर्नलिज़्म' के इस प्रयोग के तहत पैदल चलते हुए, लोगों से मिलते और उनके साथ समय बिताते हुए, उनकी कहानियाँ दर्ज कर रहे हैं.

पॉल नेशनल ज्योग्राफिक के फ़ैलो हैं और उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए नाइट फाउंडेशन, पुलित्ज़र सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग से सपॉन्सरशिप मिली है. इसके अलावा हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ एजुकेशन का प्रोजेक्ट ज़ीरो रिसर्च सेंटर भी उनकी यात्रा के अनुभवों को स्कूली छात्रों के साथ साझा कर रहा है.

आउट ऑफ़ ईडेन प्रोजेक्ट

पॉल सालोपेक कहते हैं कि वो पैदल चल कर दुनिया देखने को ख़ास बात नहीं मानते क्योंकि हमारे पूर्वज शिकार के लिए हर साल करीब 2500 मील का सफ़र तो तय करते ही थे.

पॉल बताते हैं कि जब वे छह साल के थे, तब उनके पिता ने अमरीकी सरकार की नौकरी छोड़ दी थी और परिवार सहित सेंट्रल मैक्सिको के छोटे से शहर में बस गए थे.

इमेज कॉपीरइट John Stanmeyer National Geographic

अब 52 साल के पॉल अपनी यात्रा के दौरान जो रिपोर्ट लिखते हैं, वो आउट ऑफ़ ईडेन प्रोजेक्ट के नाम से इंटरनेट पर छप रही हैं.

जब बीबीसी ट्रैवल ने पॉल से बात की तब वे पूर्वी तुर्की तक पहुंच गए थे. अपनी यात्रा के बारे में पॉल कहते हैं कि वो एक विदेश संवाददाता हैं जो पैदल चल कर अपनी रिपोर्टिंग कर रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि पॉल को पैदल ही रिपोर्टिंग करने का विचार कैसे आया?

पत्रकारिता ने दिखाया रास्ता

पॉल कहते हैं, "ये बस एक विचार था, कोई यूरेका मूमेंट जैसा मसला नहीं था. मैं पत्रकार के तौर पर लगातार यात्राएं करता रहा हूं. हालाँकि मैंने पढ़ाई जीव विज्ञान में की थी पर मैं 20 साल की उम्र से यात्रा कर रहा हूं."

वैसे पॉल 30 साल की उम्र तक पत्रकारिता में नहीं थे. कभी मछली पालन तो कभी नाव पर काम किया करते थे. वे कसाई के सहायक भी रह चुके हैं. उन्होंने डोनट की दुकान पर भी काम किया है.

ऐसे में पत्रकारिता में उनका आना इत्तेफ़ाक ही था. वे जिस महिला के किराएदार थे, वो एक अख़बार में काम करती थीं और बस वहीं से पत्रकारिता में दिलचस्पी शुरू हो गई.

पॉल ने दस साल अफ़्रीका से रिपोर्टिंग करने के अलावा लातिनी अमरीका और सेंट्रल एशिया से भी रिपोर्टिंग की है.

अपनी इस यात्रा की शुरुआत के बारे में पॉल बताते हैं कि उन्होंने दो साल पहले इथियोपिया में इसके बारे में सोचा था.

2009 की आर्थिक मंदी के दौरान उनके अख़बार ने विदेश डेस्क बंद कर दिया और पहले एक किताब पर काम करने के बाद पॉल अपनी यात्रा के आइडिया को अंजाम देने में जुट गए.

हालांकि इस दौरान जब पैदल चलना संभव नहीं होता है तो वे मोटर पर भी सफर करते हैं. इसके बारे में वो अपने पाठकों को जानकारी देते हैं.

इस दौरान उन्होंने कभी हवाई यात्रा नहीं की है. अपनी यात्रा के दौरान उन्हें गाइड और दुभाषिए की मदद भी लेनी पड़ती है. उनकी मदद से उनकी यात्रा में संस्कृति और लैंडस्केप के पहलू भी जुड़ जाते हैं.

इसराइल: जवान ने गोली चलाई

इमेज कॉपीरइट John Stanmeyer National Geographic

पॉल की योजना 2020 तक दक्षिण अमरीका तक पहुंचने की है. यानी, उन्हें कुछ साल और पैदल चलना होगा.

इतनी लंबी यात्रा के लिए पॉल ने कोई ख़ास ट्रेनिंग नहीं ली है. ग़ौरतलब है कि जहाँ अन्य देशों में उन्हें घूमने के लिए कई साथी मिल गए, सऊदी अरब में उन्होंने 700 किलोमीटर का सफ़र केवल एक ही साथी के साथ तय किया क्योंकि उसके अलावा कोई भी पॉल के साथ चलने को राज़ी नहीं हुआ.

अपनी इस यात्रा के दौरान पॉल सोमालिया नहीं गए और ईरान भी नहीं गए. इसकी वजह बताते हुए पॉल कहते हैं कि ईरान ने उन्हें वीज़ा नहीं दिया.

इस यात्रा के दौरान उन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा.

वे कहते हैं कि चाहे वो उत्तरी यूरोप हो या फिर उत्तरी अमरीका, हर जगह कार आपको 'मेनस्ट्रीम सोसायटी' का हिस्सा बनाती है. पैदल चलने वाले लोगों को अधिकतर लोग गंभीरता से नहीं लेते.

इसराइली सुरक्षा बल के जवानों ने उन पर फ़ायरिंग कर दी थी. पॉल कहते हैं संवेदनशील इलाकों से पैदल गुजरना दोहरे ख़तरे का सबब है. ऐसे में वे ख़तरों से बचने की कोशिश करते हैं.

पॉल कहते हैं पैदल चलने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि लोग आपको ख़तरों के बारे में बता देते हैं.

तुर्की में बंदूकधारियों ने धर लिया

इसी तरह पूर्वी तुर्की में वो एक छोटे से कस्बे पातनोस में पहुँचे जहाँ कोई ख़ास आर्थिक गतिविधि नहीं है, और न ही कोई ऐतिहासिक महत्व की चीज़ है.

इस यात्रा के दौरान अनेक बार उन्हें रात में इलाक़े की मस्जिद में ही रहने की जगह मिलती रही है.

लेकिन उस शाम जब वो एक साथी के साथ पहाड़ियों में घूमकर नीचे नदी के पास पहुँचे और मस्जिद में शरण मांगी तो उन्हें धमकी मिली- 'यहाँ से भाग जाओ.' जब उन्होंने बाहर परिसर के आसपास तंबू लगाना चाहा, तो उससे भी मना कर दिया गया.

दरअसल वो कुर्दों का इलाक़ा था लेकिन वहाँ ख़ासी गुटबाज़ी है और गोलियां चलना आम बात है. पॉल कहते हैं, "वो रात तो हमने सड़क पर गुज़ारी लेकिन अगली सुबह जब अगरी नदी की ओर बढ़े तो क्लैशनिकोव लिए तीन लोगों ने घेर लिया और ऐसा लगा कि गोली चला देंगे."

दरअसल वो बाग़ी थे जिन्हें तुर्कों ने कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के साथ लड़ने के लिए मना लिया था. काफ़ी मुश्किल से पॉल और उनके साथी ने इन बाग़ियों के समझाकर अपनी जान बचाई. बाद में अगली शाम जब एक और कस्बे में पहुँचे तो स्थानीय निवासियों ने चाय और पारंपरिक खाने के साथ उनका स्वागत किया.

इमेज कॉपीरइट John Stanmeyer National Geographic

सालों तक पैदल चलने के बाद सामान्य जीवन में वे वापसी कर पाएंगे?

ये पूछे जाने पर पॉल कहते हैं कि वे छह साल की उम्र से सफर ही कर रहे हैं, लेकिन इस यात्रा के पूरा होने के बाद वे क्या करेंगे, इस बारे में उन्होंने सोचा ही नहीं है.

पॉल कहते हैं कि वो यात्रा को तभी कामयाब मानेंगे जब वो अपने अनुभवों और लोगों की कहानियों को आम पाठक तक बेहतरीन ढंग से पहुंचा पाएंगे.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार