दुनिया को चौंकाने वाले 5 यात्रियों का सफ़र

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बीबीसी ट्रैवल ने इस साल दुनिया को चौंकाने वाले यात्रियों की विस्तार से बात की है. अलग-अलग मकसद से कई लोग अजीबोगरीब सफ़र कर रहे हैं.

इन सबकी कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इन सबमें एक बात समान है वो है यात्रा का रोमांच.

ऐसे ही पांच लोगों के सफ़र को बीबीसी ट्रैवल ने यहाँ पेश किया है. इनमें से कोई बीते 40 साल से सफ़र ही कर रहा है, तो कोई बिना मोटर वाले वाहन से दुनिया भर की सैर कर चुका है. कोई पैदल ही एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के सफ़र पर है.

इतना ही नहीं, एक महिला तो साइकिल से ही दक्षिण ध्रुव तक पहुंच गईं. आख़िर कौन हैं ये लोग और क्या हैं इनकी कहानियां.

डोनल्ड पेरिश, 193 देश, 841 जगह

अमरीका के डोनल्ड मॉल्टबाइ पेरिश जूनियर दुनिया के हर भौगोलिक क्षेत्र की यात्रा कर चुके हैं. वो लिस्ट बहुत लंबी है जहाँ पेरिश गए हैं.

अमरीका के 50 राज्य, फ्रांस के 27 इलाके, चीन के 32 प्रांत, रूस के 83 राजनीतिक सबडिविजन, भारत के 28 राज्य, अर्जेंटीना के 23 प्रांत, जर्मनी के 16 राज्य, इटली के 20 इलाके, स्पेन के 19 सामुदायिक स्वायत्ता वाले इलाके और कई अन्य जगहें.

(विस्तार से पढ़ें- 70 साल की उम्र में भी जारी है सफ़र)

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लेकिन उनका देश दुनिया की यात्राएं करने का शगल अब भी खत्म नहीं हुआ. वे बताते हैं, "मैंने तय किया कि मैं हर जगह जाऊंगा. लेकिन हर जगह से क्या मतलब होता है, इसलिए मैंने पहले अमरीका के ही 50 राज्यों को चुना, फिर 193 देशों को."

दुनिया भर के ट्रैवलर्स के लोकप्रिय ट्रैवलर सेंचुरी क्लब के मुताबिक पृथ्वी में हर जगह घूमने का मतलब है 324 देशों या इलाक़ों की सैर करना, जो हर जगह को समेट लेते हैं. वहीं दूसरे क्लब मोस्ट ट्रैवल्ड पीपल के मुताबिक ऐसी जगहों की संख्या 875 है जबकि द बेस्ट ट्रैवल्ड के मुताबिक दुनिया को 1281 जगहों में बांटा जा सकता है.

मोस्ट ट्रैवल्ड पीपल साइट ने 70 साल के पेरिश को दुनिया में सबसे ज्यादा यात्रा करने वाले शख्स के तौर पर चुना है. वे इस साइट की 875 जगहों की सूची में 841 जगहों पर जा चुके हैं.

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यह सब उन्होंने तब कर लिया, जब ना तो वे बहुत धनी आदमी हैं, ना ही ट्रैवलिंग सेल्समैन और ना ही किसी कंपनी ने उन्हें इस काम पर लगा रखा है. बावजूद इसके, वे बीते 40 सालों से अपनी आमदनी से बचत कर घूमते रहे, दुनिया देखते रहे.

मारिया लिजरस्टाम, साइकिल से दक्षिण ध्रुव तक का सफ़र

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चार साल पहले तक मारिया लिजरस्टाम के पास उनकी कामयाबी को दर्शाने के लिए सब कुछ था. आकर्षक नौकरी, कंपनी की ओर से कार, टेम्स नदी के किनारे लंदन में ख़ूबसूरत अपार्टमेंट और एक बहुत अच्छा व रिश्तों को लेकर गंभीर ब्वॉय फ्रेंड. ख़ूबसूरत मारिया के पास वो सब था, जिसके लोग सपने देखते हैं.

लेकिन मारिया ख़ुश नहीं थीं. 31 साल की उम्र में उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. कंपनी की कार लौटा दी. अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ रिश्ता तोड़ लिया. अपने मां-बाप के पास वापस लौट गईं.

ये सब मारिया ने किया ताकि जीवन में कुछ नया हो. मारिया बताती हैं, "करियर में रोमांच था. जब मैंने इस्तीफ़ा दिया तब मैं एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी की बिज़नेस डेवलपमेंट प्रमुख थी. लेकिन मुझे लगने लगा था कि जीवन में और कुछ होना चाहिए."

(विस्तार से पढ़ें- दक्षिण ध्रुव तक पहुंचने वाली महिला)

मारिया ने इसके बाद 23 दिनों में पूरा न्यूज़ीलैंड साइकिल से नाप डाला. इसके बाद अपनी एडवेंचर स्पोर्ट्स कंपनी शुरू की. देखते-देखते वह दक्षिण ध्रुव पर साइकिल के जरिए पहुंचने वाली पहली महिला बन गईं. इस मुकाम तक पहुंचने में उन्होंने दो पुरुषों को पछाड़ दिया.

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मारिया बताती हैं कि उनका दोनों से किसी प्रतियोगिता का कोई इरादा नहीं था. वह बताती हैं, "उन लोगों ने तीन या चार सप्ताह पहले अपना अभियान शुरू किया और मेरे अभियान के खत्म होने के कुछ सप्ताह बाद दक्षिण ध्रुव तक पहुंच पाए."

मारिया लिजरस्टाम को दक्षिण ध्रुव तक पहुंचने के लिए 634 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी जबकि स्पेनिश और अमरीकी यात्री को करीब एक हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी.

जेसन लुइस, बिन मोटर दुनिया की सैर

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जेसन लुइस एक दिन अचानक लंदन के अपने घर से निकल पड़े. मकसद था दुनिया की सैर. लेकिन ये सैर कई मायनों में अलग थी. पहली बात तो यही थी कि वे बिना किसी मोटर वाले वाहन से सफ़र करने वाले थे. दूसरी यह कि तब उनकी जेब में महज़ 319.20 पाउंड थे.

तेरह साल के लंबे सफ़र में साइकिल से चलते हुए, पैदल चलते हुए और नाव से सफर करते हुए जेसन लुइस ने 37 देशों में करीब 46,505 मील की यात्रा पूरी की. इस सफ़र के लिए उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया.

जेसन अपनी इस यात्रा के बारे में कहते हैं, "मैं ये देखना चाहता था कि मैं अपने बारे में क्या सीख सकता हूं."

उन्होंने अपनी इस यात्रा के दौरान दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया. उन्हें इस दौरान 37 देशों के 900 स्कूलों में बोलने का मौका भी मिला.

जब बीबीसी ट्रैवल्स की टीम ने उनसे मुलाकात की तो उन्होंने आने वाले समय में अपने नए मिशन की जानकारी दी. अब वे दुनिया भर की आदिम जनजातीय समुदाय को नजदीक से देखना चाहते हैं.

(विस्तार से पढ़ें- जेसन लुइस की कहानी)

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दोबारा किन जगहों पर जाना चाहेंगे, ये पूछने पर जेसन कहते हैं, "इंडोनेशिया और उत्तरी सूडान. मुझे ये दोनों जगह खूब पसंद आईं."

अब जेसन लुइस 49 साल के हो चुके हैं. उनके दोस्त नौकरियों पर लग चुके हैं, शादियां हो चुकी हैं, सबके परिवार बस चुके हैं लेकिन लुइस को अपने फ़ैसले पर कोई अफ़सोस नहीं है.

जिमी नेल्सन, 35 आदिवासी समूहों पर काम

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ब्रितानी नागरिक 46 साल के जिमी नेल्सन पिछले चार साल से दुनिया के आदिवासियों के बीच घूम रहे हैं और उनकी तस्वीरें खींच रहे हैं.

सालों साल ऐसा करते रहना कैसे संभव है? और क्या इसे कोई करियर कह सकता है? वो उन विदेशी पर्यटकों या फ़ोटोग्राफ़रों की तरह नहीं हैं जो आदिवासियों की फोटो लेकर उस गांव से पहली बस से बाहर निकल जाते हैं.

जिमी नेल्सन आदिवासियों के बीच वक्त गुजारते हैं, उनकी संस्कृति को समझने का प्रयास करते हैं, उनके रीति-रिवाज़ और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का काम कर रहे हैं.

(विस्तार से पढ़ें- 35 आदिवासी समुदाय के बीच रहने का अनुभव)

जिमी पेशेवर फोटोग्राफ़र हैं और वे अपने विंटेज 4 गुणा 5 प्लेट कैमरे के साथ दुनिया भर की यात्रा करके आदिवासी समुदाय की तस्वीर खींचते हैं.

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करीब पांच साल पहले डिजिटल फोटोग्राफी का दौर शुरू होने के बाद जिमी को लगा कि हर हाथ में कैमरा होने के कारण, पेशे के तौर पर फोटोग्राफ़ी तो खत्म हो जाएगा, लिहाजा किसी एक क्षेत्र में स्पेशलाइज़ेशन हासिल करनी चाहिए.

इस पर विचार करते हुए जिमी ने उन संस्कृतियों और आदिवासी समुदायों पर काम करने का फ़ैसला किया जो तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं. अपने प्रोजेक्ट के लिए वे 35 अलग अलग आदिवासी समुदाय की संस्कृतियों पर काम कर रहे हैं.

पॉल सालोपेक, 21 हज़ार मील की पैदल यात्रा

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पॉल सालोपेक 21 हज़ार मील की पैदल यात्रा कर रहे हैं. सात साल की प्रोजेक्ट के तहत वो दो साल का सफ़र पूरा कर चुके हैं. उनका मिशन है अफ़्रीका से मनुष्य के पलायन के रास्ते पर सफ़र करते हुए इथियोपिया से दक्षिण अमरीका के टियेरा डेल फ़िगो तक पैदल जाना.

दरअसल दो बार पत्रकारिता के लिए पुलित्ज़र जीत चुके सालोपेक, अफ़्रीका में शिकागो ट्रिब्यून के विदेश संवाददाता रह चुके हैं और अब एक नायाब प्रयोग कर रहे हैं. वो मानते हैं कि आज की अत्यंत तेज़ ख़बरों की दुनिया में शोर तो बहुत है लेकिन ठोस जानकारी कम है.

वो 'स्लो जर्नलिज़्म' के इस प्रयोग के तहत पैदल चलते हुए, लोगों से मिलते और उनके साथ समय बिताते हुए, उनकी कहानियाँ दर्ज कर रहे हैं.

(विस्तार से पढ़ें- पत्रकार की 21 हज़ार मील की पैदल यात्रा)

पॉल नेशनल ज्योग्राफिक के फ़ैलो हैं. उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए नाइट फाउंडेशन, पुलित्ज़र सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग से सपॉन्सरशिप मिली है.

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52 साल के पॉल अपनी यात्रा के दौरान जो रिपोर्ट लिखते हैं, वो आउट ऑफ़ ईडेन प्रोजेक्ट के नाम से इंटरनेट पर छप रही हैं.

पॉल की योजना 2020 तक दक्षिण अमरीका तक पहुंचने की है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.

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