जब मां ने बच्ची को तस्कर को सौंपा

सीरियाई बच्ची माया

सीरिया छोड़कर यूरोप जा रहे लोगों को तस्करों पर अमूमन भरोसा करना पड़ता है.

पर यह काफ़ी ख़तरनाक होता है और कई बार लोगों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

सीरियाई नागरिक ज़िज़ित की गाड़ी पर हमला हुआ और उन्हें गोली का निशाना बनाया गया तो उन्होंने मजबूरी में ही सही, देश छोड़ने का फ़ैसला कर लिया.

वे राजधानी दमिश्क के एक अस्पताल में डॉक्टर थीं. पर इस्लामिक स्टेट के किसी आदमी ने उनसे संपर्क कर कहा कि वह उनके लिए काम करें. उनके मना कर पर उन्हें धमकी दी गई.

अंत में उन्होंने अपनी बेटी माया के लिए देश छोड़ने का फ़ैसला कर लिया.

फ़ोन से भेजी तस्वीर

वे एक तस्कर से मिलीं. अबू शहाब नाम के उस आदमी ने उन्हें 4,000 यूरो के बदले ब्राज़ील का नकली पासपोर्ट देने की पेशकश की. पर दिक्कत यह थी कि मां और बेटी एक साथ सफ़र नहीं कर सकती थीं.

इसकी वजह यह थी कि उनके बच्चे को किसी यूरोपीय नागरिक के साथ ही जाना था जो सुरक्षा कर्मचारियों से वहां की भाषा में बात कर सके. उस तस्कर ने कहा कि वे अपने साथ माया को ले जाएंगे और उन्हें अपनी बेटी बताएंगे. वे ऐसा दिखावा करेंगे मानो अपनी बेटी के साथ अपने देश जा रहे हों.

ज़िज़ित को यह योजना बिल्कुल नापसंद थी, पर उनके पास कोई चारा नहीं था.

उन्होंने अंत में माया का सामान पैक किया और बेहद भारी मन से अपने कलेजे के टुकड़े को उस आदमी के हवाले कर दिया, जिसे पहले से जानती तक नहीं थीं.

अजनबी के हवाले बच्ची

ज़िज़ित कहती हैं, "माया बहुत रोई, वह किसी अजनबी के साथ जाना नहीं चाहती थी. उस शख़्स ने माया को मिठाई और चॉकलेट वगैरह दीं ताकि वह उससे घुलमिल जाए. पर माया ने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया. वह रोती रही और वह मानव तस्कर उसे अपने साथ ले गया."

हवाई अड्डे पर ज़िज़ित के काग़ज़ात नकली पाए गए और उन्हें सुरक्षा कर्मियों ने वहीं रोक दिया. पर माया सुरक्षा घेरा पारकर मानव तस्कर के साश निकल गई. ज़िज़ित ने पाया कि उसकी बेटी सीमा पार कर नए देश में दाख़िल हो चुकी है और वह इस पार खड़ी हैं.

उन्होंने कहा, "मैं बदहवास थी. मैंने ख़तरा मोल लिया, अपनी बेटी को देश के बाहर निकाल ले गई और वह अब मुझसे एकदम दूर जा चुकी थी. वह जिसके साथ गई, मुझे उसका असली नाम तक नहीं मालूम था, क्योंकि मानव तस्कर हमेशा छद्म नाम का इस्तेमाल करते हैं."

पर अबू शहाब ने इटली के किसी होटल से उन्हें फ़ोन किया. ज़िज़ित उस पर खूब चिल्लाईं. पर शहाब ने उनसे कहा, "आप शांत हो जाएं. मैं भी इंसान हूं, मुझे बच्चों से प्यार है, चिंता न करें."

उस आदमी ने माया को नहलाया-धुलाया और खिलाया-पिलाया.

अनजान देश, अनजान आदमी

उसने अपने मोबाइल फ़ोन से माया की तस्वीर खींची और उसे ज़िज़ित को भेजा. फ़ोन पर बेटी की तस्वीर देख ज़िज़ित को थोड़ी तसल्ली हुई.

ज़िज़ित हसना नाम की एक महिला को जानती थी, जो जर्मनी में रहती थी. उन्होंने एक बार हसना का इलाज किया था. ज़िज़ित ने हसना से आग्रह किया कि वह किसी तरह उस बच्ची को अपने पास ले आएं.

शहाब बच्ची को लेकर गए और जर्मनी में उस महिला के घर के बाहर छोड़ दिया. हसना के बच्चे माया को अपने घर ले गए.

इसके बाद माया की देखभाल हसना ने ही की. वे उसकी तस्वीर रोज़ाना ज़िज़ित को भेजती रहीं, ताकि उन्हें अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर कोई आशंका न हो.

ज़िज़ित किसी तरह जर्मनी पहुंच गईं. अब वे अपनी बेटी के साथ डॉर्टमुंड शहर में रहती हैं.

ज़िज़ित कहती हैं, "यदि कोई मुझसे पूछे कि क्या उसे इस तरह सफ़र करना चाहिए, तो मैं कहूंगी, हरगिज़ नहीं. अपने ही देश में रहिए, पर मेरी तरह यात्रा बिल्कुल मत करिए. अपनी बेटी को खोने से बेहतर मर जाना है."

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