शराब पीने वाले मुसलमान को 80 कोड़े की सज़ा

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पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी के लिए शराब पीना ग़ैरक़ानूनी है. इसका मतलब है कि देश के 96 प्रतिशत लोगों को जो आधिकारिक रूप से मुसलमान हैं, उन्हें शराब नहीं पीनी चाहिए.

शराब पीने वाले मुसलमानों के लिए इसकी सज़ा 80 कोड़े है. हालांकि यह सख़्ती से लागू नहीं होती.

शराबखोरी पाकिस्तान की बढ़ती हुई समस्या है.

नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर पाकिस्तानी अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि पिछले पांच साल में शराबखोरी से जुड़ी बीमारियों में 10 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

'पियो बोतल खाली होने तक'

पाकिस्तान में ब्रूअरी भी हैं जो आधिकारिक रूप से ग़ैर-मुसलमानों या फिर निर्यात के लिए शराब बनाती हैं.

Image caption शराबी रहे ताहिर अहमद अब दूसरों को शराब छुड़वाने में मदद करते हैं.

एक पूर्व शराबी, ताहिर अहमद अब 'थेरेपी वर्क्स' के नाम से एक सुधार संस्था चलाते हैं. वे इस समस्या में 'स्पष्ट बढ़ोत्तरी' देखते हैं.

छह साल पहले जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब शराबी कम से कम 20 साल के होते थे लेकिन अब 14 साल के भी बच्चे भी शराब के आदी मिलते हैं.

वह कहते हैं, "बदक़िस्मती से पाकिस्तान में शराब मज़े के लिए नहीं पी जाती. यह बचने और राहत पाने का एक रास्ता है. इसका मतलब है कि तब तक पियो जब तक बोतल खाली न हो जाए."

अफ़वाह है कि कुछ वरिष्ठ नेता भी शराब पीते हैं और हाई-सोसाइटी पार्टी में शराब पेश भी की जाती है. हालांकि कैमरे के आगे कभी नहीं.

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लेकिन इससे प्रभावित सब होते हैं. पिछले महीने कराची में कम से कम 12 लोग घर में बनी ज़हरीली शराब पीकर मर गए.

महिलाओं की मुश्किल

शराब पीने वाली महिलाओं के लिए मुश्किल और ज़्यादा है.

लाहौर की सारा (बदला हुआ नाम) का पांच साल पहले 33 साल की उम्र में जब तलाक हुआ, तब उनके दो किशोर उम्र के बच्चे थे.

तलाक़ के बाद वह शराब की गिरफ़्त में आ गईं, लेकिन पाकिस्तान में एक महिला के लिए इससे छूटने की कोशिश आसान नहीं है.

वह कहती हैं, "आदमी तो कह सकते हैं कि 'हां मुझे यह समस्या है' लेकिन महिलाओं के लिए तो यह हौवा है. कोई महिला कभी भी खड़े होकर नहीं कह सकती कि मुझे यह समस्या है और मुझे मदद की ज़रूरत है. यह स्वीकार नहीं किया जाएगा."

Image caption यूसुफ़ अहमद भी शराब के आदी थे लेकिन सख़्ती से शराब छुड़ाने वाले एक केंद्र की मदद से उन्हें इससे निजात मिल गई.

नौ महीने पहले आखिरकार उन्हें घर पर ही दवाएं और इलाज मिलना संभव हो पाया. अब उनकी हालत सुधर रही है.

शराब से पैदा हुई दिक्कतें दूर करने के लिए कई क्लीनिक और संस्थाएं तो काम कर ही रही हैं, मीडिया भी अपनी भूमिका निभा रहा है.

'हां, मैं सुन रहा हूं'

कराची के रेडियो 191 एफ़एम पर मनोचिकित्सक-प्रसारणकर्ता डॉक्टर फ़ैसल माम्सा हर गुरुवार और शुक्रवार को हर तरह की सामाजिक वर्जनाओं पर फ़ोन कॉल लेते हैं.

इनमें शराबखोरी भी शामिल है. वह अंग्रेज़ी और उर्दू में फ़ोन करने वालों से बात करते हैं. फ़ोन आता है तो वह नरम आवाज़ में बोलते हैं, "जी बोलिए, मैं सुन रहा हूं."

माम्सा कहते हैं कि रेडियो की पहचान ज़ाहिर न करने की ख़ूबी इसे आदर्श बनाती है.

Image caption फ़ैसल माम्सा (दाएं) रेडियो पर लोगों की समस्या सुनकर उन्हें सलाह देते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे उनके नामों से मतलब नहीं है. अगर वह दिक्कत के बारे में बात कर रहे हैं तो सिर्फ़ वही नहीं हैं जिन्हें इससे फ़ायदा हो रहा है. जो भी रेडियो सुन रहा है, इस बारे में सुन रहा है. असल बात यह है कि दिक्कत पर बात की जा रही है."

पाकिस्तान के आधिकारिक रूप से 'ड्राइ' होने की स्थिति निकट भविष्य में बदलने की कोई गुंजाइश नहीं है. लेकिन फिर भी डॉक्टरों और अधिकारियों के अनुसार शराबखोरी की दिक्कत बढ़ ही रही है.

कम से कम अब शराबी अपनी दिक्कतों के बारे में बात करने के लिए ज़्यादा बाहर आ रहे हैं और उनमें से कुछ इससे छुटकारा भी पा रहे हैं.

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